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देश की अर्थव्यवस्था को तगड़ा झटका देगा SC का फैसला

Tue, 26 Aug 2014 07:52 AM IST
Updated Tue, 26 Aug 2014 07:52 AM IST
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Country economy may majorly Affected by supreme court decision

सुप्रीम कोर्ट की ओर से 1993 और 2010 के बीच 218 कोयला खदानों के आवंटन को गैरकानूनी करार देना मोदी सरकार के लिए भारी परेशानी का सबब बन सकता है।

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मौजूदा सरकार कोयला खदान आवंटन की नई प्रक्रिया तय करने में लगी है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से इस मामले में अब उसके लिए फौरी कदम उठाना जरूरी हो जाएगा।
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अगर सुप्रीम कोर्ट 1 सितंबर को इन कोयला खदानों का आवंटन रद्द करने का फैसला सुनाता है तो बिजली सेक्टर के लिए बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा और इसका सीधा असर स्टील, सीमेंट और दूसरे उद्योगों पर पड़ेगा।
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जाहिर है पहले से ही सुस्त चल रही इकोनॉमी के लिए यह बेहद घातक होगा। अगर सुप्रीम कोर्ट ने कोयला खदानों का आवंटन रद्द कर दिया तो रिलायंस पावर, जिंदल स्टील एंड पावर, हिंडाल्को, भूषण स्टील, आईएसटी स्टील, जेएलडी यवतमाल एनर्जी जैसी कई कंपनियों को करारा झटका लगेगा।

कोयला मंत्री पीयूष गोयल ने इस पूरे मामले में कहा कि सरकार फैसले का इंतजार कर रही है। सरकार इसे मंजूर करेगी और इसके असर से पैदा किसी भी स्थिति से निपटने के लिए तुरंत कदम उठाएगी।

देश में पैदा होगा कोयला संकट

Country economy may majorly Affected by supreme court decision

दरअसल ज्यादातर कोयला खदानों से तमाम वजहों से उत्पादन शुरू नहीं हो सका है। लिहाजा कंपनियों की ओर से लगाया गया पैसा फंस सकता है।

कोयला मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ‘कोर्ट के फैसले से न सिर्फ कंपनियों का निवेश प्रभावित होगा बल्कि बिजली समेत तमाम उद्योगों के लिए कोयला संकट पैदा हो सकता है।

ऐसी स्थिति में सरकार को थर्मल पावर प्लांट की जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़ी मात्रा में कोयला आयात करना पड़ सकता है।’

कोयला खदान आवंटन मामले में सुप्रीम कोर्ट के रुख पर प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए कोयला मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि सरकार फैसले का इंतजार कर रही है।

सरकार इसे मंजूर करेगी और इसके असर से पैदा किसी भी स्थिति से निपटने के लिए तुरंत कदम उठाएगी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले बाद इस क्षेत्र में छाए अनिश्चय के बादल छंट जाएंगे और इससे अर्थव्यवस्था में रफ्तार की नई शुरुआत हो सकती है।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि स्क्रीनिंग कमेटी ने 1990 से 2010 के बीच कोयला खदान आवंटन की जो प्रक्रिया अपनाई, वे पारदर्शी नहीं थी।

इसके तहत आवंटन में कई मनमाने फैसले लिए गए। चीफ जस्टिस आर.एम. लोढ़ा की बेंच ने इस मामले में अपने फैसले में आवंटन की शर्तों को गलत करार दिया।

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