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अमेरिका यात्रा से पहले ही विवादों में घिरे मनमोहन

Fri, 20 Sep 2013 01:51 AM IST
अमर उजाला, दिल्ली
अमर उजाला, दिल्ली Updated Fri, 20 Sep 2013 01:51 AM IST
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controversy over nuclear liability law

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अमेरिका यात्रा से पहले ही देश में बड़ा राजनीतिक विवाद उठ खड़ा हुआ है।

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विवाद का कारण बना है परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में न्यूक्लियर पावर कार्पोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआईएल) और अमेरिकी कंपनी वेस्टिंगहाउस कोर के बीच संभावित करार।

कहा जा रहा है कि संभावित करार में परमाणु आपदा कानून को शिथिल करते हुए अमेरिकी कंपनी को क्षतिपूर्ति संबंधी नियमों से छूट देने की तैयारी कर ली गई है। इस आशय की रिपोर्ट सामने आते ही विपक्ष की त्योरियां चढ़ गई हैं।
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विपक्ष ने साफ कर दिया कि अगर इस तरह का कोई समझौता होता है, तो इसे सरकार का गैरकानूनी कृत्य माना जाएगा।

हालांकि विवाद बढ़ने के बाद सरकार ने सफाई पेश करते हुए कहा है कि फिलहाल इस करार पर अंतिम फैसला नहीं हुआ है।

परमाणु आपदा कानून में क्षतिपूर्ति संबंधी प्रावधानों को शिथिल करने के लिए सरकार पर लगातार अमेरिकी दबाव डाला जा रहा था।

खुद अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा, उपराष्ट्रपति जो बिडेन और विदेश मंत्री जॉन केरी ने अपनी भारत यात्रा में क्षतिपूर्ति संबंधी नियमों में ढील देने का अनुरोध किया था।
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वर्ष 2008 में भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते पर राजनीतिक बवंडर के बीच संसद की सहमति की मुहर तो लग गई थी, मगर वर्ष 2010 में विपक्ष के भारी दबाव में सरकार को परमाणु आपदा कानून में क्षतिपूर्ति के संबंध में कड़े प्रावधान की व्यवस्था करनी पड़ी।

इस कानून के क्षतिपूर्ति संबंधी उपबंध 17 में परमाणु हादसा होने पर रिएक्टर आपूर्ति करने वाले कंपनियों की न केवल जवाबदेही तय की गई, बल्कि यह भी तय किया गया कि ऐसी स्थिति में क्षतिपूर्ति और मुआवजे का बड़ा हिस्सा परमाणु रिएक्टर आपूर्ति करने वाली कंपनियों को देना होगा। कानून के तहत क्षतिपूर्ति की रकम तय करने का अधिकार एनपीसीआईएल को दिया गया।

इसके बाद भारत में परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में रूस और फ्रांस की कंपनियों ने तो समझौता किया, मगर अमेरिका की कंपनियों ने लगातार नियम को शिथिल करने की मांग और दबाव बनाना जारी रखा। वर्ष 2011 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अमेरिका यात्रा के दौरान भी इस आशय की मांग की गई थी।

इसी बीच यह जानकारी सामने आई कि ऊर्जा क्षेत्र में अमेरिकी कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिए सरकार परमाणु आपदा कानून को शिथिल करने के लिए तैयार हो गई है।

प्रधानमंत्री की अगले सप्ताह हो रही अमेरिका यात्रा के दौरान एनपीसीआईएल और अमेरिकी कंपनी वेस्टिंगहाउस कोर के बीच होने वाले करार में भारत इस कानून के शिथिल करने पर सहमत हो गया है।

इस आशय का खुलासा तब हुआ जब परमाणु ऊर्जा विभाग ने इस संबंध में अटार्नी जनरल जीई वाहनवती से राय मांगी।

अपनी राय में अटार्नी जनरल ने कहा कि दुर्घटना की स्थिति में क्षतिपूर्ति की जिम्मेदारी आपूर्तिकर्ता की नहीं बल्कि न्यूक्लियर प्लांट ऑपरेटर की होगी।

बहरहाल इस मामले में उपजे भारी विवाद के बाद विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा कि भारत को ऊर्जा की जरूरत है, मगर भारत यह करार अपनी शर्तों पर करेगा।

उन्होंने कहा कि इस संबंध में दोनों ही पक्षों के अपने अपने बिंदु हैं। सभी बिंदुओं पर विमर्श के बाद उचित निर्णय लिया जाएगा।

हालांकि प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री वी नारायणसामी ने संसद में पारित कानून के परे जा कर करार करने की संभावना से इंकार किया।

विदेश मंत्रालय ने भी एक बयान जारी कर कहा कि करार करते समय भारतीय कानून के किसी तरह के उल्लंघन का कोई सवाल नहीं है।

क्या है मामला
न्यूक्लियर पावर कारपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (एनपीसीआईएल) और अमेरिका की वेस्टिंगहाउस इलेक्ट्रिक कंपनी में प्रस्तावित समझौते को लेकर सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति विचार करेगी।

रिपोर्टों के मुताबिक इस समझौते में अमेरिकी कंपनी के लिए किसी परमाणु हादसे की स्थिति में उसकी जवाबदेही तय करने वाले प्रावधानों को कानून से हटते हुए कुछ नरम किया जा सकता है।


यदि सरकार अमेरिकी दबाव के आगे झुक जाती है और परमाणु समझौते के प्रावधानों को नरम करने की डील कर लेती है तो उसका यह फैसला गैरकानूनी और देशहित के खिलाफ होगा।--प्रकाश करात, माकपा

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