फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   controversy between thakerays

किसे होगा ठाकरे बंधुओं की जंग का फायदा?

Thu, 03 Apr 2014 01:10 PM IST
Updated Thu, 03 Apr 2014 01:10 PM IST
विज्ञापन
controversy between thakerays

सभी पौराणिक कथाओं, चाहे वो भारतीय हों या ग्रीक उनमें भाई-भाई के बीच संघर्ष रहा है और अक्सर वह विकृत होता गया है। न केवल मुग़लों बल्कि मराठों ने भी इस परंपरा को ज़िंदा रखा है। बार-बार यह सिद्ध हुआ है कि ख़ून पानी से गाढ़ा नहीं है।

विज्ञापन


महाराष्ट्र के प्रसिद्ध परिवार के दो चचेरे भाई आजकल एक दूसरे से लड़ने में लगे हैं। सौभाग्य से हम एक लोकतंत्र में रहते हैं, इसलिए हॉलीवुड की किसी फ़िल्म की तरह उद्धव और राज को नंगी तलवारें लिए हुए आमने-सामने आते नहीं देख रहे हैं।
विज्ञापन


लेकिन मीडिया ख़ासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया इसे आधुनिक महाभारत के रूप में पेश कर रहा है। महाभारत में भाइयों ने ही एक विनाशकारी युद्ध लड़ा था, लेकिन ठाकरे भाइयों की यह लड़ाई एक घटिया टीवी धारावाहिक के पुनर्निर्माण की तरह है।

विज्ञापन
विज्ञापन

विरासत की लड़ाई में उलझे

controversy between thakerays

वास्तव में दांव पर मुद्दा क्या है? असली शिव सेना, जो उद्धव ठाकरे को विरासत में मिली थी और जिसे उसके संस्थापक बाला साहेब ठाकरे का आशीर्वाद हासिल था, उसे चेचेरे भाई राज ठाकरे से चुनौती मिल रही है।

वह न केवल विरासत पर अपना दावा जता रहे हैं, बल्कि संगठन का असली वारिस भी बता रहे हैं। 'सेना' का शाब्दिक अर्थ योद्धाओं का दल होता है। इसलिए महाभारत या ग्रीक योद्धाओं के रूपक का गलत प्रयोग नहीं हुआ है।

राज ठाकरे ने भी अपनी सेना का नाम महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) रखा है, लेकिन इन दोनों सेनाओं का उद्देश्य बुनियादी रूप से अलग-अलग नहीं है। दोनों सेनाएं मराठी पहचान को बढ़ावा देना चाहती हैं। हालांकि दोनों ने अभी यह साफ़ नहीं किया है कि वह इसे करेंगी कैसे?

विरासत का दावा

controversy between thakerays

दोनों भाइयों के समानांतर संगठन फल-फूल रहे हैं। इस साल जून में शिव सेना की स्थापना के 68 साल पूरे हो जाएंगे, जबकि महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना केवल आठ साल पुरानी है।

जब शिव सेना की स्थापना हुई थी तो उद्धव केवल आठ साल के थे और शेर की गर्जना के प्रतीक थे। शिव सेना ने जब मुंबई में दहाड़ना शुरू किया था, उसके दो साल बाद राज ठाकरे का जन्म हुआ। उद्धव राज से आठ साल बड़े हैं।

बाला साहेब का बेटा होने के नाते वह 'पिताश्री' की विरासत पर दावा करते हैं। उनके पिता ने भी उन्हें ही अपना उत्तराधिकारी बनाया था और सैनिकों से कहा था कि वह इस बात का संकल्प लें कि उद्धव के आदेशों का पालन करेंगे।

राज का भी दावा मजबूत

controversy between thakerays

राज ठाकरे, उद्धव ठाकरे से पहले ही सक्रिय हो गए थे। उन्होंने युवाओं को संगठित कर पार्टी की युवा शाखा का गठन किया था। राज से बड़ा होने के बाद भी उद्धव बहुत बाद में राजनीति में सक्रिय हुए। इसलिए सड़क पर संघर्ष के आधार पर राज ठाकरे ने वरिष्ठता का दावा किया।

वहीं, उद्धव ने अपनी आयु के आधार पर वरिष्ठता का दावा किया। उद्धव को धीर-गंभीर के रूप में देखा गया तो राज को उग्र व्यक्ति के रूप में। उद्धव को असली शिव सेना के मुख्य कार्यकारी के रूप में सम्मान मिला। वहीं राज को एक साहसी और प्रवर्तक के रूप में देखा गया।

उद्धव के पास पिछले 68 साल में तैयार किए गए शाखाओं का एक नेटवर्क था, वहीं राज ने उतावले और विद्रोही युवाओं का समर्थन होने का दावा किया। असली संगठन में उद्धव के पास भी युवा थे, लेकिन वह महत्वाकांक्षी थे।

अजीबो-गरीब समझौते की कोशिश

controversy between thakerays

अन्य युवा जो शिव सेना से बंधकर रहना चाहते थे, उन्हें लगा कि एमएनएस में उनके लिए राजनीतिक अवसर होंगे। राज बहुत अधिक मीडिया प्रेमी हैं, तो उद्धव को नेटवर्क प्रिय है। उनके पास एक अतिरिक्त फ़ायदा यह है कि उनका भाजपा के साथ गठबंधन है।

इस सौदे में हारने वाली भाजपा या नरेंद्र मोदी हैं। इस मसीहा ने गांधीनगर से रिमोट कंट्रोल के ज़रिए इन दोनों सेनाओं के बीच मेल-मिलाप कराने की कोशिश की। लेकिन मोदी को इस बात का अहसास नहीं हुआ कि ख़ून पानी से गाढ़ा नहीं है।

इसलिए एक अजीब से समझौते पर काम हुआ, लेकिन एमएनएस ने इसे मानने से इनकार कर दिया। अब ऐसा लग रहा है कि उद्धव भी नहीं चाहते हैं कि एमएनएस से समझौता हो।

भाजपा को कितना फायदा

controversy between thakerays

राज ठाकरे ने उन सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिए हैं, जहां से शिव सेना चुनाव लड़ रही है और उन सीटों को छोड़ दिया जहां से भाजपा चुनाव लड़ रही है। यह शायद भाजपा (या मोदी) को फ़ायदा पहुंचाए।

राज ठाकरे ने यह भी घोषणा की है कि अगर उनके उम्मीदवार जीते तो वे प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी का समर्थन करेंगे। इस तरह राज एनडीए और मोदी के लिए वोट काट रहे हैं। भाई-भाई की यह लड़ाई (हालांकि मौखिक ही है) दो चचेरे भाइयों की सत्ता में ख़ासकर राज्य में हिस्सेदारी की लड़ाई बनती जा रही है।

राज ठाकरे का दावा है कि वह मोदी के ज्यादा वफ़ादार हैं, क्योंकि एनएनएस ने ही सबसे पहले मोदी की शक्ति को पहचाना था और उद्धव ने ऐसा तब किया, जब मसीहा को प्रधानमंत्री पद का आधिकारिक उम्मीदवार घोषित कर दिया गया।

कही न हो जाए दुखांत

controversy between thakerays

यह अभी भी छाया युद्ध बना हुआ है और 16 मई तक जारी रहेगा। दिलचस्प यह है कि आरएसएस और भाजपा में नरेंद्र मोदी के खिलाफ आवाज़ें उठने लगी हैं और शिव सेना और एमएनएस मोदीत्व के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शाने में लगी हुई हैं।

अगर नरेंद्र मोदी सरकार बनाने के लिए जरूरी संख्या नहीं ला पाए तो क्या होगा? और अगर एमएनएस को भी एक-दो से ज़्यादा सीटें नहीं मिलीं तो क्या होगा?

यह अब तक साफ़ नहीं हुआ है कि अंतिम बाजी किसके हाथ लगेगी। उस समय जनता ही होगी जो इस राजनीतिक प्रहसन का आनंद उठाएगी, लेकिन इस प्रहसन में दुखांत बनने की भी संभावना है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed