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सीमा के प्रहरी नहीं कर पा रहे अपनी रक्षा

Sun, 21 Jul 2013 10:27 AM IST
गोपेश्वर/प्रमोद सेमवाल
गोपेश्वर/प्रमोद सेमवाल Updated Sun, 21 Jul 2013 10:27 AM IST
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Contributed to protecting the country today are not able to defend themselves

कभी ये ग्रामीण भारतीय सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर देश की रक्षा में योगदान देते थे। हालात ने पस्त बना दिया है। आपदा के चलते अपनी ही रक्षा करने में खुद को नाकाम पा रहे हैं। इसलिए मजबूरी में अब पलायन चाहते हैं।

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ऐसे लोगों को रोकना सरकार, शासन-प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती है। चीन सीमा से लगे चमोली जनपद को हाल की त्रासदी ने झकझोर कर रख दिया है। जनपद के दो सीमांत गांव बह गए और कई गांव भूस्खलन से तहस-नहस हो गए हैं। नीती, माणा, उर्गम और जोशीमठ घाटियों के ग्रामीण किसी न किसी रूप में आपदा की मार झेल रहे हैं।
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यहां किसी के आवासीय भवन तो किसी के खेत-खलिहान नष्ट हो गए हैं। जहां कहीं कुछ भूमि बची भी है वह न भवन बनाने लायक है, न ही काश्तकारी करने के लायक। अब इन क्षेत्रों के ग्रामीण अपने पैतृक गांवों को छोड़कर निचले क्षेत्रों में ही बसने की योजना बना रहे हैं। कई ग्रामीणों ने आगामी वर्ष से निचले क्षेत्रों में ही रहने का मन भी बना लिया है।
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अलग-थलग पड़े नीती और माणा
बात करें नीती व माणा घाटी की तो यहां मलारी और लामबगड़ के आगे पिछले एक माह से सीमा से जुड़ी सड़कें अवरुद्ध पड़ी हुई है। जिससे घाटी के नीती, गमशाली, बांपा, कैलाशपुर, मेहरगांव और फरकिया गांवों के ग्रामीण अब निचले क्षेत्रों की ओर रुख करने का मन बना रहे हैं।

यही स्थिति उर्गम घाटी की भी बनी हुई है। यहां से चीन की हवाई दूरी मात्र 5 से 7 किमी है। यहां बड़गिंडा, देवग्राम, बांसा, गीरा, उर्गम, कलगोठ, डुमक में कई आवासीय भवन अब रहने लायक नहीं रह गए हैं। जिससे ग्रामीण अब अपने पैतृक घरों को छोड़ने के लिए विवश हो गए हैं।

भ्यूंडार और पुलना गांव भी सीमांत क्षेत्र से जुडे़ हुए हैं। यहां 93 परिवार सड़क पर आ गए हैं। यह भी चीन सीमा से लगा हुआ क्षेत्र है। यहां ऋषिकेश-माणा राष्ट्रीय राजमार्ग भी कई जगहों पर अवरुद्ध पड़ा हुआ है। हाईवे धंस रहा है। जिससे सेना के भारी वाहन व जरुरी सामग्री को सीमा क्षेत्र में ले जाने के लिए भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

केस-एक
माणा के करीब 30 फीसदी ग्रामीणों ने भूस्खलन व आपदा की डर से आगामी वर्ष से अपने शीतकालीन गांवों में ही रहने का मन बना लिया है। माणा के ग्रामीण छह माह माणा और शीतकाल में छह माह तक गोपेश्वर के आसपास के क्षेत्रों में प्रवास करते हैं। पूर्व ग्राम प्रधान पीतांबर मोल्फा इन दिनों आपदा से घबराए ग्रामीणों को ढांढस बंधा रहे हैं।

बकौल मोल्फा यदि केंद्र व राज्य सरकारों ने सीमांत गांवों की सुध नहीं ली तो वह दिन दूर नहीं जब ये गांव वीरान पड़ जाएंगे। माणा गांव के ग्रामीण बदरीनाथ व अपने अराध्य देव घंटाकर्ण की पूजा-अर्चना के चलते यहां पहुंचते हैं। ग्रामीण यहां काश्तकारी व ऊन के व्यापार से अपनी आजीविका चलाते हैं, लेकिन आपदा के मारे ग्रामीण अब अपने शीतकालीन क्षेत्रों में ही रहने को मजबूर हो गए हैं।

केस-दो
नीती घाटी के संजय राणा और राहुल सिंह इन दिनों देहरादून में घर के लिए भूमि तलाश रहे हैं। इनके साथ ही कई अन्य ग्रामीण भी ऐसे हैं। जो निचले क्षेत्रों में बसने का मन बना चुके हैं। मलारी गांव के देव सिंह राणा का कहना है कि मलारी-नीती सड़क पिछले एक माह से अवरुद्ध पड़ी हुई है।


सीमांत क्षेत्रों के ग्रामीण अपने शीतकालीन गांवों में लौटने लगे हैं। यदि आपदा की ऐसी ही मार पड़ती रही तो सीमांत क्षेत्र के गांव के गांव खाली पड़ जाएंगे।

यह है सीमांत क्षेत्रों की स्थिति
-बिजली, सड़क, स्वास्थ्य, पेयजल के बुरे हाल।
-पर्यटन, तीर्थाटन पर आधारित आजीविका की कमर टूटी।
-देश-विदेश के पर्यटकों को ठहरने तक की व्यवस्था नहीं।
-जोशीमठ-नीती सड़क कई जगहों पर बनी जानलेवा।
-नौनिहालों की पढ़ाई के लिए निचले क्षेत्रों में पलायन।

सीमांत गांवों के लिए ये चीजें जरूरी
-सड़कें हर वक्त चाक-चौबंद हो।
-स्वास्थ्य, शिक्षा की बेहतर व्यवस्था हो।
-पर्यटन से जोड़कर यहां सुविधाएं बढ़ें।
-क्षेत्र में संचार सेवा का विस्तार हो।
-युवाओं को रोजगार में विशेष छूट मिले।

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