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मोदी vs नीतीशः मुकाबले के ये छह दांव

Mon, 18 Mar 2013 08:24 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क Updated Mon, 18 Mar 2013 08:24 PM IST
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contest between modi and nitish possible in loksabha elections

अब तक प्रधानमंत्री पद के लिए अकेले ही ताल ठोंक रहे नरेंद्र मोदी को रविवार की रैली के बाद नीतीश कुमार ने संकेत दे दिए हैं कि वे उनके साथ बराबरी की टक्कर में हैं।

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2014 में 'मोदी बनाम राहुल' के मुकाबले का इंतजार कर रहे लोगों का 'मोदी बनाम नीतीश' का मुकाबला देखने को मिल सकता है।

लोकसभा चुनावों में दोनों के बीच इन दांवों पर हो सकता है मुकाबला-

1-राजनीति

नरेंद्र मोदी और नीतीश उम्र में तो लगभग बराबर ही हैं लेकिन राजनीतिक अनुभव के मामले में कतई मेल नहीं खाते। दोनों की राजनीतिक पाठशालाएं अलग रही हैं और तरीके भी।
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नीतीश ने राजनीति का ककहरा छात्र जीवन से ही पढ़ा। भारत में समाजवादी आंदोलन के कद्दावर नेता जय प्रकाश नारायण, चौधरी चरण सिंह और कर्पूरी ठाकुर नीतीश के गुरु रहे हैं, जबकि नरेंद्र मोदी ने राजनीति के दाव-पेंच राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की शाखाओं में सीखे। वे लंबे समय तक संघ के प्रचारक रहे।
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नीतीश 1974 से 1977 तक जेपी आंदोलन में भी सक्रिय रहे। उन्होंने 1980 में पहली बार बिहार विधानसभा का चुनाव लड़ा, हालांकि इसमें उन्हें हार का सामना करना पड़ा। नीतीश 1985 में पहली बार बिहार विधानसभा के लिए चुने गए, जबकि 1989 में उन्होंने लोकसभा का चुनाव जीता।

1989 में ही वह जनता दल के महासचिव भी चुने गए। 1989 में ही वह केंद्र की विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार में कृषि राज्यमंत्री बने।

1998 से 2004 तक केंद्र की राजग सरकार में उन्होंने रेलवे और कृषि समेत कई मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली।

नरेंद्र मोदी '90 के दशक में भाजपा द्वारा आयोजित सोमनाथ और अयोध्या की रथयात्राओं के बाद चर्चा में आए। इन यात्राओं में उन्होंने भाजपा के कद्दावर नेता लालकृष्ण आडवाणी के सारथी की भूमिका निभाई।

1995 में मोदी को भाजपा का नेशनल सेक्रेटरी चुना गया, जबकि 1998 में वह पार्टी के महासचिव चुने गए। 2001 में उन्होंने गुजरात की कमान संभाली और पहली बार विधानसभा का चुनाव लड़ा।

गुजरात में नरेंद्र मोदी अब तक भाजपा को तीन बार सत्ता में वापस ला चुके हैं।

नीतीश 2005 में पहली बार राष्ट्रीय जनता दल को हराकर बिहार की सत्ता पर काबिज हुए थे। बिहार में वह जदयू-भाजपा गठबंधन को दो बार सत्ता दिला चुके हैं।

2-मेरा विकास बनाम तेरा विकास


रविवार की रैली में नीतीश ने लोकसभा चुनावों के मद्देनजर विकसित बनाम पिछडे़ राज्यों की नई राजनीति शुरू करने की कोशिश की।

दरअसल नीतीश कुमार ओर नरेंद्र मोदी, दोनों की ही छवि अपने-अपने राज्यों मे विकास पुरुष की रही है। मोदी भी अपने कार्यकाल में गुजरात में विकास का दावा करते रहे हैं और नीतीश ने भी बिहार में विकास के प्रयास किए हैं।

हालांकि मोदी को विरासत में एक विकसित और धनाढ्य राज्य मिला है, जबकि बिहार हमेशा से ही 'बीमारू' राज्यों का हिस्सा रहा है।

मोदी ने गुजरात में निवेश बढ़ाने के लिए 'वाइब्रेंट गुजरात' जैसे सम्मेलन की शुरुआत की है। अब तक के आंकड़ों के लिहाज से देखें तो इन सम्मेलनो से गुजरात में निवेश बहुत ज्यादा बढ़ा नहीं है। विशेषज्ञ गुजरात के निवेश को बहुत आश्चर्य से नहीं देखते।

जबकि 2012 में बिहार ने गुजरात को पीछे छोड़ते हुए 13.1 फीसदी की दर से विकास किया था। इसके बावजूद नीतीश विकास की जगह राज्य के पिछड़ेपन को उजागर कर राजनीति करना चाहती हैं।

3-गठबंधन की खींचतान


2014 लोकसभा में सत्ता में काबिज होने के लिए यूपीए और एनडीए, दोनों मौजूदा गठबंधनों को नए साथियों की तलाश करनी पड़ सकती है।

एनडीए की बात करें तो भाजपा की ओर से नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में उभर रहे हैं। हालांकि गठबंधन की राजनीति में उनकी पूछ कम है। राजग के मौजूदा सहयोगी अकाली दल ने मोदी के पक्ष में अपनी राय दी ही लेकिन शिवसेना खुलकर सुषमा का समर्थन किया है।

लोकसभा चुनावों में मौजूदा सहयोगियों से काम भी नहीं चलने वाला है। चुनावों के बाद नए सहयोगियों की जरूरत पड़ती है तो मोदी इस मामले में नुकसान में रहेंगे।

उनकी छवि अन्य दलों में स्वीकार्य नहीं है। जयललिता जरूर उनके शपथ ग्रहण में शामिल हो चुकी हैं लेकिन लोकसभा चुनावों के बाद उनकी क्या भूमिका होगी ये कहना मुश्किल है।

नीतीश इस मामले में फायदे में है। आज भी केंद्र की राजनीति में उनकी छवि स्वीकार्य बनी हुई है। वे ममता बनर्जी, नवीन पटनायक और चंद्रा बाबू जैसे नेताओं को राजग से जोड़ने की क्षमता रखते हैं।

4-सेक्यूलर छवि

नीतीश कुमार पिछले 15 सालों से केंद्र में भाजपा के सहयोगी हैं, इसके बाद भी उन्होंने अब तक अपनी सेक्यूलर छवि बरकरार रखी है। बिहार विधानसभा चुनावों में मुस्लिम वोटों का बड़ा हिस्सा जदयू के पक्ष में ही है।

जबकि गुजरात दंगों का साया अब भी मोदी के सर पर मंडरा रहा है। मोदी अब राजनीतिक मंचों और मीडिया के बीच गुजरात दंगों पर बातचीत करने से बचते हैं।

गुजरात के बाहर मोदी के ये छवि भाजपा के लिए हमेशा ही रोड़ा रही है। अभी यह प्रमाण मिलना शेष है कि मोदी गुजरात से बाहर मतदाताओं को रिझा सकते हैं।

5-पार्टी की अंदरुनी राजनीति

हाल ही में दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में मोदी से पूछा गया, 'आपको दिल्ली आने से भाजपा में कौन रोक रहा है।' मोदी ने हंसकर जवाब दिया, 'मैं तो दिल्ली में बैठा हुआ हूं, मुझे कौन रोक सकता है।'

मोदी भले ही हंसकर जवाब दे रहें हों लेकिन ये उन्हें भी पता है कि उनके प्रधानमंत्री बनने की राह में उनकी पार्टी के भीतर ही कई रोड़े हैं।

अगर मोदी गुजरात में भाजपा सत्ता में वापस ला चुके है, तो शिवराज सिंह चौहान मध्यप्रदेश में और रमन सिंह छत्तीसगढ़ में यह काम कर चुके हैं।

सुषमा स्वराज और अरुण जेटली भी भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद पर कई बार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपनी दावेदारी ठोंक चुके हैं। ऐसे में मोदी के लिए दिल्ली की राह कतई आसान नहीं है।

नीतीश इस मामले में बेहतर स्थिति में हैं। जदयू में फिलहाल एक भी नेता उनके कद का नहीं है। पार्टी के अध्यक्ष शरद यादव ने भी खुद को पीछे खींचकर नीतीश को ही एक तरह से पार्टी की कमान सौंप रखी है।

6-पाला बदलने की गुंजाइश

रामलीला मैदान में रविवार को दिए भाषण में नीतीश ने कहा, 'अपनी तरक्की के लिए हम न दाएं देखेंगे न बाएं, हम सामने देखेंगे।'

ये इस बात का संकेत है कि उन्होंने 2014 के लिए अपने सभी विकल्प खुले रखे हैं। ऐसे में ये पूरी संभावना है कि नीतीश लोकसभा चुनावों के बाद पाला बदल सकते हैं। वह एनडीए को छोड़कर यूपीए में भी जा सकते हैं।


जिस प्रकार उन्होंने विकसित बनाम पिछड़ा का दांव खेला है, इससे ये भी लग रहा है कि नीतीश तीसरे मोर्चे के गठन में भी अहम भूमिका निभा सकते हैं।

रविवार को उन्होंने 2014 में ‘किंग मेकर’ बनने के इरादा जाहिर करते हुए कहा कि केंद्र में अगली सरकार के गठन में वे अहम भूमिका निभाएंगे।

हालांकि नरेंद्र मोदी के लिए ये एक असहज स्थिति है। वह भाजपा के नेता हैं और केंद्र की राजनीति में वह किसी और के साथ नहीं जा सकती, ऐसे में एनडीए के साथ रहकर उसे ही ताकतवर बनाना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी।

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