पाक से भारत आ रहे हथियार गायब
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कैबिनेट सचिवालय और गृह मंत्रालय ने आईबी और रॉ के खास अधिकारियों को हथियारों के एक लापता जखीरे को खोजने की जिम्मेदारी दी है। पिछले महीने के आखिरी सप्ताह में बांग्लादेश के रास्ते देश में दाखिल हथियारों की यह खेप एजेंसियों के रडार से अचानक गायब हो गई थी।
चुनाव के मद्देनजर फरवरी महीने में समुद्री रास्तों से हथियार, मादक पदार्थ और नकली नोटों की तस्करी संबंधी गृह मंत्रालय की चेतावनी के बावजूद एजेंसियों के हाथों इस संवेदनशील मामले के फिसलने से खुफिया हलकों में खलबली मची हुई है।
उच्च पदस्थ सरकारी सूत्रों ने अमर उजाला को बताया है कि यह जखीरा मार्च के आखिरी हफ्ते में एक मालवाहक जहाज में छुपाकर पाकिस्तान के कराची पोर्ट से बांग्लादेश के कुतुबदिया पोर्ट पर पहुंचाया गया।
पाक से बांग्लादेश के रास्ते भेजा गया था भारत
एजेंसियों को पता चल चुका था कि पद्मा नामक जहाज से खतरनाक हथियारों की यह खेप बांग्लादेश पोर्ट पर उतरी है। एजेंसी कुछ दिनों तक खेप पर नजर गड़ाए उसे देश की सीमा में दाखिल होने का इंतजार करती रही।
मगर बांग्लादेश के जेस्सौर के बाद यह खेप अचानक ओझल हो गई। एजेंसियों को अंदेशा है कि यह पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद से लगी सीमा से होते हुए भारत में दाखिल हो चुकी है।
इस मामले में भारत-बांग्लादेश सीमा पर तैनात सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के खुफिया विंग जी-ब्रांच की मदद भी ली जा रही है। सूत्रों ने बताया कि पद्मा जहाज की कंपनी के लोगों से गहन पूछताछ भी की गई है। हालांकि सूत्र मामले को काफी संवेदनशील बताते हुए इससे संबंधित पूरी जानकारी नहीं दे रहे।
भारत विरोधी कार्रवाई में इस्तेमाल होंगे हथियार
एजेंसियों को यह अंदाजा नहीं लग पाया है कि जखीरे में कौन से और कितने खतरनाक हथियार थे। खुफिया अधिकारियों के एक तबके का मानना है कि यह हथियार भारत विरोधी कार्रवाई में लगे पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई ने नक्सलियों को मजबूती देने के मकसद से भेजा है।
लेकिन सूत्रों के मुताबिक नक्सलियों को पाकिस्तान से सीधे तौर हथियार मिलने की अब तक कोई खुफिया सूचना नहीं है। नक्सलियों के ज्यादातर हथियार पुलिस और अर्धसैनिक बलों से ही लूटे हुए होते हैं।
हालांकि चीन की कुछ एजेंसियां और उत्तर-पूर्व के उग्रवादी गुटों की सांठगांठ से नक्सलियों को संचार और उससे संबंधित उपकरणों के मुहैया कराए जाने की बात भी सामने आई है। सूत्रों के मुताबिक चिंता का सबब यही है कि एजेंसियों को हथियार के इस जखीरे के गंतव्य का कुछ भी पता नहीं है।