इन 11 कदमों का इस्तेमाल कर फूंकी जा सकती है कांग्रेस में जान
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कांग्रेस भारत की सबसे पुरानी पार्टी है। वह सबसे बड़ी पार्टियों में है और उसकी जड़ें गहरी हैं। लेकिन कांग्रेस को पहचान देने वालों ने शायद ही कल्पना की होगी कि यह संघर्ष की जगह राज करने वाली पार्टी बन जाएगी।
महात्मा गांधी तो चाहते थे कि आजादी मिलने के साथ कांग्रेस का काम पूरा हुआ और उसे दफ्न कर दिया जाना चाहिए। लेकिन आजादी के बाद पार्टी ने नई किस्म की कांग्रेस - सत्ता के गिर्द पनपने वाली कांग्रेस - का ही रूप अख्तियार किया। बहरहाल, नए भारत को आकार देने का श्रेय भी इसी कांग्रेस को रहा।
पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने विकास का जो रास्ता अपनाया, उस पर बाद में सवाल भी खड़े हुए हैं। लेकिन ऐसा हमेशा और प्रगति की हर राह में होता है। उनके बाद के नेताओं ने पार्टी में कितना योगदान दिया, उसको लेकर एक उलझी हुई तस्वीर सामने आती है।
इंदिरा की देन है कांग्रेस में आलाकमान संस्कृति
नेहरू के बाद कांग्रेस की सबसे बड़ी नेता उनकी बेटी इंदिरा गांधी हुईं, भले ही प्रधानमंत्री के नाते लालबहादुर शास्त्री ने अपने सीमित कार्यकाल के बावजूद प्रतिष्ठा ज्यादा अर्जित की।
श्रीमती गांधी के नाम पर हमें परमाणु विस्फोट से लेकर बैंक राष्ट्रीयकरण जैसी कई उपलब्धियां ख्याल आती हैं। जो सबसे बड़ी घटनाएँ उन उपलब्धियों पर हावी साबित हुईं, वे थीं युद्ध और आपातकाल। वे कांग्रेस की सर्वशक्तिमान नेता बनीं, जैसा उन्होंने चाहा, किया।
कांग्रेस में आला कमान संस्कृति इंदिरा गांधी की देन है। इस संस्कृति ने कांग्रेस को बांधे भी रखा, उसी ने पार्टी को तानाशाही की ओर धकेला। अगर पार्टी के लोकतंत्र को इंदिरा गांधी अपनी जेब में न रखतीं तो न आपातकाल होता, न पंजाब समस्या का सैनिक उपचार, न उनकी त्रासद हत्या। राजीव गांधी को तो आकस्मिक तौर पर सत्ता मिली। उनके बाद छह प्रधानमंत्री देश को मिले, जिनमें कांग्रेस के एक नरसिम्हा राव थे। उन्होंने परिवारवाद को पीठ दिखाई और अपना राज किया।
सत्ता से 14 बरस दूर रही कांग्रेस
सत्ता का सुख चौदह बरस तक नेहरू खानदान से रूठा रहा। साल 2004 में वह लौटा, कांग्रेस ने फिर इंदिरा गांधी की बहू सोनिया गांधी की ओर देखा। सोनिया गांधी को सत्ता मिल सकती थी, लेकिन बड़ी चतुराई से वे सत्ता हांकने वाली बन गईं। वफादार मनमोहन सिंह को जिम्मेदारी सौंपी गई, जिन्होंने कभी नरसिम्हा राव की मानिंद 'दगा' नहीं किया।
इस बीच, सोनिया गांधी ने बेटे राहुल गांधी को नेतृत्व संभालने के लिए तैयार कर लिया। निस्संदेह अब भी इस परिवार का दबदबा कांग्रेस में कायम है। यह बात दुर्भाग्य की भी हो सकती है और कांग्रेस के लिए सौभाग्य की भी कि वही ताकत उसे बाँध और हाँक सकती है, भले वह उतनी लोकतांत्रिक न जान पड़ती हो। फिलहाल, पूरी पार्टी परिवार की पार्टी होकर रह गई है।
राहुल गांधी के साथ उनकी बहन भी पार्टी गतिविधियों में रुचि लेती दिखाई देती हैं। उनके जीजा भी चुनाव में सक्रिय रहते हैं और धनोपार्जन के विवादों में भी। सत्ता से बाहर रहकर पार्टी की कमान सँभालते हुए परिवारवाद का इस तरह पोषण तो न नेहरू के समय हुआ, न इंदिरा गांधी के जमाने में। इस नजरिये से कांग्रेस के लिए सोनिया गांधी का दौर सबसे बुरा साबित हुआ है।
इन 11 उपायों को इस्तेमाल कर सत्ता पर पहुंच सकती है कांग्रेस
ऐसे में कांग्रेस को नए साल में इन बातों का ख्याल रखना होगा।
परिवार से मुक्ति - परिवार से जुड़े रहते हुए भी इससे मुक्ति पाई जा सकती है। यह आसान नहीं है, लेकिन परिवार को साथ रखते हुए इसके रास्ते तलाशने होंगे। परिवार की पार्टी पर समूचे कब्जे वाली स्थिति को बदलने की जरूरत है। आज परिवार जैसा चाहता है, सोचता और कहता है, पूरी पार्टी वैसा कर रही है। यह बेहतर स्थिति नहीं है। राज्यों के जनाधार वाले नेता भी आलाकमान के सामने अपनी बात नहीं कह पा रहे हैं।
राहुल गांधी की भूमिका- राहुल गांधी पार्टी का जिम्मा संभाल सकते हैं। उपाध्यक्ष के नाते यह मौका उन्हें मिलना चाहिए। लेकिन उन्हें आतंरिक लोकतंत्र को तरजीह देनी होगी। सत्ता का मौका सामने हो तो योग्यता को अहमियत देनी होगी, सोनिया गांधी की खड़ाऊं सत्ता नीति हमेशा कामयाब नहीं होगी। पार्टी में दूसरी पंक्ति के नेता हर हाल में तैयार रहने चाहिए।
पार्टी काडर पर ध्यान- कांग्रेस मूल रूप से काडर आधारित पार्टी रही है। लेकिन इसके अलग-अलग संगठनों की जान अब सूख चुकी है। मजदूरों, युवाओं और स्त्रियों के बीच काम करने वाले संगठनों को फिर से मजबूत करने की जरूरत है। सेवा दल तो लगता है, खत्म ही हो चला है।
भ्रष्टाचार के मुद्दे- मनमोहन सिंह के शासन काल में एक से बढ़कर एक घोटाले देखने को मिले। हालांकि वे खुद ईमानदार नेता हैं, लेकिन वे अपनी मर्जी से काम नहीं कर पा रहे थे, इसका जिक्र उनके सलाहकार रहे संजय बारू ने अपनी किताब में भी किया है। यहां तक कि राबर्ट वाड्रा पर भ्रष्ट आचरण से संपत्ति बनाने के गंभीर आरोप लगे। उन्हें विशिष्ट हैसियत और सुविधाएं हासिल थीं। यह सब सत्ता का दुरुपयोग ही था। राहुल गांधी को ऐसी चीजों से दूरी दिखानी होगी।
ये उपायों कांग्रेस को फिर पहुंचाएंगे सत्ता पर
धर्मनिरपेक्षता- कांग्रेस को विभिन्न धर्मों और तबकों से समर्थन मिलता रहा है। अल्पसंख्यक समाज कांग्रेस को अपना खैरख्वाह मानता आया है। कांग्रेस की धर्मनिरपेक्ष छवि उसकी बड़ी ताकत रही है। लेकिन उसमें जो कमजोरियां आ चुकी हैं, उन्हें दूर करना होगा। मुस्लिम, सिख और ईसाई विभिन्न मौकों पर कांग्रेस के अप्रत्याशित रवैये - मसलन पंजाब में ऑपरेशन ब्लू स्टार और 1984 के दंगे - से सिख खफा हुए हैं। हालंकि वे अब भी उससे पूरी तरह छिटके नहीं हैं, क्योंकि पार्टी की धर्मनिरपेक्ष पहचान बनी हुई है। इसे फिर से मजबूती देनी चाहिए।
दलितों पर पकड़- दलित मतदाता पहले कांग्रेस के वोट बैंक कहलाते थे, लेकिन वह विराट समुदाय कांग्रेस से लगभग छिटक गया है। इसके कारणों पर कांग्रेस को सोचना चाहिए। संगठन में समुदाय की भूमिका नीति-निर्धारक समूह में दिखाई पड़नी चाहिए।
बुज़ुर्ग करें मार्गदर्शन- पार्टी के अंदर उम्रदराज नेताओं की भरमार है। इनमें कुछ तो केवल मार्गदर्शन का काम कर रहे हैं, तो उन्हें मार्गदर्शक की जिम्मेदारी दे देनी चाहिए; राजकाज से वे अब दूर रहें। पर यह काम अपमानजनक ढंग से नहीं होना चाहिए, जैसे भाजपा में हुआ है। उनके अनुभव को साथ लेकर चलने की जरूरत है।
युवा टीम- कांग्रेस में नए चेहरों का आना जरूरी है। युवा वर्ग देशभर में नेतृत्व की जिम्मेदारी संभालता नजर आना चाहिए। राहुल गांधी ने नई टीम का वादा किया था। थोड़ी कोशिश उन्होंने की भी, लेकिन लगता है कि उन्होंने बाद में हथियार डाल दिया। वरिष्ठ लोगों के सहयोग से उन्हें नई पीढ़ी की नई कांग्रेस बनाने की कोशिश करनी चाहिए। पेशेवर लोगों को भी आगे बढ़ाने की जरूरत है। नेहरू के जमाने में पार्टी वैज्ञानिक, साहित्यकार, कृषक आदि देखे जा सकते थे, उनका वास्तविक सम्मान था।
विपक्ष के प्रति साफ रणनीति अपनाने की जरूरत
उत्तर भारत पर फोकस- उत्तर भारत के जिन राज्यों में कांग्रेस बेहद मजबूत मानी जाती थी, वहां वह खोखली हो रही है। वहां अपनी पूरी ताकत झोंकनी होगी। बैसाखी पर चलना कांग्रेस की फितरत नहीं बनना चाहिए।
दक्षिण भारत पर जोर- राजीव गांधी की हत्या के बाद से कांग्रेस का ध्यान दक्षिण भारत की ओर कम हो गया है। अखिल भारतीय कांग्रेस उत्तर भारत में सिमट कर क्यों रहे? वे शायद अब सोच ही नहीं पा रहे कि दक्षिण भारत भी उनका इलाका रहा है।
विपक्ष का विरोध- विपक्ष के नाते विरोध की रणनीति को भी पार्टी में स्पष्ट होना चाहिए। केवल विरोध के लिए विरोध करना ठीक तरीका नहीं। संसद का बहिष्कार राहुल गांधी का अपरिपक्व फैसला था। नरेंद्र मोदी नवाज शरीफ से अचानक मिलने गए, जिस तरह से पठानकोट के हमले के बावजूद उन्होंने पाकिस्तान से बात की, कांग्रेस उसका विरोध क्यों कर रही है? यह तो कांग्रेस की नीति पर ही चल रही है। भारतीय जनता पार्टी भी कांग्रेस का ऐसे ही विरोध करती थी, लेकिन कांग्रेस का तरीक़ा अनुभवी पार्टी के नाते परिपक्व होना चाहिए।