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कांग्रेस में भगदड़, मोदी की 'मौजा ही मौजा'

Sat, 01 Mar 2014 06:34 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली Updated Sat, 01 Mar 2014 06:34 PM IST
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congress in problem, partners running towards modi before elections

कांग्रेस को इस बात का इल्म पहले से था कि आगामी लोकसभा चुनाव अपने साथ कड़ी चुनौती ला रहे हैं और उसे सत्ता विरोधी लहर के सामने डटकर खड़ा होना होगा।

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भ्रष्टाचार और महंगाई के अलावा कुशासन ऐसा मुद्दा था, जिसे हथियार बनाकर विरोधी कांग्रेस की तरफ उछाल रहे थे और उसे दलीलें तैयार करनी थी, ताकि हमलों से बचा जा सके।
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लेकिन अब कांग्रेस मुश्किल में है। डूबते जहाज की कहानी सभी जानते हैं और कांग्रेस का हश्र अब कुछ वैसा ही दिख रहा है, क्योंकि उसके साथ हर वक्त में खड़े रहने की कसमें खाने वाले राजनीतिक दल अब भाग रहे हैं। और भागकर उस कुनबे में जा रहे हैं, जो कांग्रेस का धुर विरोधी है।
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उदितराज, पासवान से शुरू हुआ खेल

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भाजपा और उसके पीएम पद के दावेदार नरेंद्र मोदी के लिए यह बड़ी कामयाबी है कि हाल तक उससे दूरी बनाने वाले दलित नेता उसकी तरफ खिंचे चले आ रहे हैं। जस्टिस पार्टी के उदित राज भले वोट ज्यादा न दिला सकें, लेकिन प्रतीकात्मक रूप से अहम हैं।

इसके बाद भाजपा ने‌ बिहार में बड़ा शिकार किया। कांग्रेस और लालू यादव के बार-बार नजरअंदाज करने और ज्यादा भाव न देने से खफा लोक जनशक्ति पार्टी के रामविलास पासवान ने भगवा परिवार में शामिल होना मुनासिब समझा और यह भी साफ कर दिया कि उन्हें मोदी की पीएम दावेदारी पर जरा भी ऐतराज नहीं है।

जब यह सब हो रहा था, कांग्रेस और आरजेडी कह रही थी कि पासवान सही नहीं कर रहे और उन्हें उम्मीद है कि गलती का अहसास कर वह लौट आएंगे, क्योंकि देश को साम्प्रदायिक ताकत से बचाना है। लेकिन भाजपा ने जो पासा फेंका, पासवान उसे नजरअंदाज नहीं कर पाए।

करुणानिधि को मोदी में दिखा अपना दोस्त

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यह खबर अभी अखबार के पहले पन्ने से भीतर गई नहीं थी कि एक और खबर आई। इस बार भाजपा को दक्षित भारत से खुशखबरी मिली। मोदी की करीबी एआईएडीएमके प्रमुख जे जयललिता के वाम दलों के पाले में जाने से भगवा दल निराश था, लेकिन अब राहत मिली।

हाल तक कांग्रेस के साथ खड़ी डीएमके का मन बदल गया। पार्टी सुप्रीमो एम करुणानिधि ने पाला बदलने का फैसला कर लिया। उन्होंने भाजपा के पीएम उम्मीदवार और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर एक ऐसा बयान दिया है जिसके सियासी गलियारों में कई मतलब निकाले जा रहे हैं। और मतलब निकले भी क्यों ना, देश की सबसे बड़ी पंचायत का चुनाव जो नजदीक है।

करुणानिधि ने भाजपा के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को कठोर परिश्रमी और अच्छा मित्र करार दिया है। मोदी की इस तारीफ को चुनाव से पहले भाजपा को द्रमुक के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। करुणानिधि ने यह बात तमिल के एक बड़े दैनिक अखबार दिनामलार को दिए इंटरव्यू में कही है। लेकिन संदेश दिल्ली तक पहुंच गया है।

लालू गठबंधन छोड़ लठबंधन को तैयार

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बहरहाल, करुणानिधि की चोट शायद कांग्रेस सह ले, लेकिन उसे दो और साथियों से बेरुखी का सामना करना पड़ सकता है। जिस दल के साथ मिलकर एलजेपी को किनारे कर दिया गया था, वहीं लालू यादव अब तल्‍खी से बात करने लगे हैं।

लालू का कहना है कि उन्होंने कांग्रेस के लिए बिहार में 11 लोकसभा सीट छोड़ी हैं। जाहिर है, इतनी कम सीट पर कांग्रेस को ऐतराज हो सकता है और वो लालटेन छोड़कर नीतीश कुमार का हाथ थाम सकती है। राहुल गांधी पहले से चाहते थे कि नीतीश से हाथ मिला लिया जाए।

लालू ने कहा, "अब गठबंधन नहीं, लठबंधन होगा।" जाहिर है, यह एक मजाकिया नेता का चुटीला अंदाज नहीं, बल्कि कम शब्दों में कहा गया गंभीर सियासी संदेश है। ऐसा कहा जा रहा है कि कांग्रेस-आरजेडी का गठबंधन टूटने जा रहा है। जब तक दोनों में से एक नहीं झुकेगा, इस रिश्ते के आगे बढ़ने की उम्मीद कम है।

जाट रिजर्वेशन पर अजित लगा सकते हैं वाट

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बिहार से पश्चिमी उत्तर प्रदेश की तरफ आएं, तो वहां भी कांग्रेस के लिए बुरी खबर इंतजार कर रही है। आचार संहिता की तलवार लटकने का डर और जाट आरक्षण में देरी ने राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह और कांग्रेस के कई जाट नेताओं की बेचैनी बढ़ा दी।

एजेंडे में जाट रिजर्वेशन न होने के कारण अजित सिंह शुक्रवार को कैबिनेट की मीटिंग में शामिल नहीं हुए। उन्होंने एक मार्च को अमरोहा में प्रस्तावित रैली भी स्थगित कर दी।

कुछ और नेताओं के साथ मिलकर बनाए गए दबाव के बाद जाट आरक्षण को लेकर देर शाम ग्रुप ऑफ मिनिस्टर की बैठक हुई। आचार संहिता लगने से पहले जाटों को आरक्षण देने पर फैसला नहीं हुआ तो चौधरी अजित सिंह यूपीए से नाता तोड़ सकते हैं। यूपीए में शामिल होते वक्त उन्होंने जाट आरक्षण के मुद्दे को सबसे महत्वपूर्ण बताया था। उन्हें मंत्री बने करीब दो साल हो गए लेकिन अभी तक आरक्षण पर कोई निर्णय नहीं हो सका।

पासवान खींच सकते हैं और साथी

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इसके अलावा एक कहानी यह भी बुनी जा रही है कि रामविलास पासवान खुद भाजपा के साथ मिल गए हैं, लेकिन वह आगे भी फायदा पहुंचा सकते हैं। वह टीआरएस प्रमुख के चंद्रशेखर राव के दोस्त बताए जाते हैं, ऐसे में हाल तक कांग्रेस से गलबहियां कर रही तेलंगाना राष्ट्र समिति अगर चुनाव बाद भाजपा से हाथ मिला ले, तो कोई हैरानी नहीं होगी।

इसके अलावा वह बीजू जनता दल के नवीन पटनायक को भी मोदी के पाले में ला सकते हैं, जिन्होंने संकेतों में साफ कर दिया है कि वह तीसरे मोर्चे में कोई खास दिलचस्पी नहीं रखते।

दरअसल, भाजपा को यह अंदाजा है कि लोकसभा चुनावों से पहले राजनीतिक दलों की अपनी मजबूरियां हैं, जिसके कारण वे खुलकर मोदी के साथ नहीं आ सकते, लेकिन एक बार चुनाव निपट जाएं, तो कई पार्टियां मन बदलने में जरा वक्‍त नहीं लगाएंगी। सारा खेल सत्ता का जो है।

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