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कांग्रेस के खिलाफ पहली बाजी हारे स्वामी
नई दिल्ली/ब्यूरो
Updated Wed, 07 Nov 2012 12:00 AM IST
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नेशनल हेराल्ड अखबार को कर्ज देने के मामले में कांग्रेस और गांधी परिवार पर अपने आरोपों से सियासी पारा चढ़ाने वाले जनता पार्टी नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी कांग्रेस के खिलाफ अपनी पहली बाजी हार गए हैं। चुनाव अयोग ने कांग्रेस पार्टी की मान्यता रद्द किए जाने की मांग वाली स्वामी की याचिका खारिज कर दी है।
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आयोग ने स्वामी को भेजे अपने पत्र में स्पष्ट किया है कि नियमों के तहत स्वामी के आरोपों के आधार पर कांग्रेस पार्टी की मान्यता रद्द करने का मामला नहीं बनता है। आयोग केवल चुनाव के दौरान आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन होने पर ही किसी पार्टी की मान्यता रद्द कर सकता है।
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चुनाव आयोग के इस फैसले को स्वामी की ओर से अदालत में चुनौती दिए जाने के संकेत हैं। गौरतलब है कि स्वामी ने बीते शनिवार को निर्वाचन आयोग में याचिका दाखिल की थी कि कांग्रेस पार्टी ने नियमों के विरुद्ध नेशनल हेराल्ड अखबार की प्रकाशक कंपनी एसोसिएटेड जर्नल्स को पार्टी के फंड से 90 करोड़ रुपये का असुरक्षित ऋण दिया।
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आयकर के नियमों के तहत टैक्स में छूट प्राप्त करने वाले राजनैतिक दल किसी व्यावसायिक संस्था व कंपनी को पार्टी फंड से ऋण नहीं दे सकते हैं। यही नहीं स्वामी ने यह भी आरोप लगाया था कि एसोसिएटेड जर्नल्स कंपनी की संपत्ति जिस यंग इंडियन को बेची गई है वह कंपनी सोनिया गांधी व राहुल गांधी की है। राहुल ने पिछले चुनाव में इस कंपनी में अपनी हिस्सेदारी का खुलासा नहीं किया था। इस आधार पर वे राहुल के खिलाफ भी कार्रवाई चाहते हैं।
निर्वाचन आयोग ने अपने जवाब में कहा कि वर्ष 1991 में बनाए गए आदर्श आचार संहिता के नियमों के तहत चुनाव की अधिसूचना के दौरान किसी दल द्वारा किया गया ऐसा कोई कार्य जो निर्वाचन की प्रक्रिया को प्रभावित करता हो अथवा संहिता का उल्लंघन करता हो उसी मामले में राजनीतिक दलों के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान है। स्वामी ने अपने आवेदन में जिस पैराग्राफ 16ए का जिक्र किया है उसके तहत यह स्पष्ट नहीं किया है कि कांग्रेस के निजी कंपनी को फंड देने से कैसे चुनाव आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन का मामला बनता है।
आयोग ने स्वामी की उस शिकायत को भी निराधार बताया है जिसमें उन्होंने कुछ समाचार पत्रों के हवाले से आरोप लगाया था कि आयोग के फैसले की जानकारी 3 व 4 नवंबर को ही कांग्रेस को कुछ अधिकारियों ने गुपचुप दे दी थी। आयोग ने कहा कि आपकी शिकायत पर 3 अथवा 4 नवंबर को कोई फैसला ही नहीं लिया गया था तो शिकायत का सवाल ही नहीं उठता है। आयोग ने अखबारों में छपी खबरों को संज्ञान में लेने से मना कर दिया।