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हिमालय की जगह कभी लहराता था समुद्र
प्रवेश कुमारी/देहरादून
Updated Wed, 31 Oct 2012 07:30 AM IST
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जिस हिमालय की खूबसूरती पर आप नाज करते हैं, वहां कभी समुद्र लहराता था। वाडिया हिमालयन भू-विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों को इस बात के पुख्ता सुबूत मिले हैं।
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उत्तराखंड में चकराता के पास देवबन पर्वत पर मिले एल्गी फासिल्स (शैवाल) और रीढ़ विहीन जीव कोनोफाइटॉन गारजेनिकम, कुसिएला कुसिएंसिस, कोलोनेला कोलुम्नेरिस, बाइकैलियो नोवा जैसे साइनोबैक्टीरिया पाए गए हैं, जो अब समुद्री इलाकों की पहचान हैं।
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ये जिस फारमेशन पर पाए गए हैं, उसकी संरचना 1.1 मिलियन से लेकर 8 मिलियन साल पुरानी है।
यह वैसी ही है, जैसी यह साइनो बैक्टीरिया मैरीन लाइमस्टोन से प्रकाश संश्लेषण की क्रिया कर बनाते हैं। यही मिलियन साल पहले यहां पहाड़ की जगह समुद्र होने की बात की गवाही देते हैं।
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वैज्ञानिकों की मानें तो इस क्षेत्र में मिलने वाली संरचना उस वक्त समुद्र के बेहद छिछला रहे होने के संकेत देते हैं।
इस तरह के जीव और चट्टानों की संरचना न केवल उत्तराखंड बल्कि निचले हिमालय के ऊपरी क्रोल फारमेशन यानी हिमाचल, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश में भी पाए गए हैं।
इन जर्नलों में हुआ प्रकाशन
‘माइक्रोबियल डायवर्सिटी इन मेसो-नियोप्रोटेरोजोइक फार्मेशंस, विद पर्टिकुलर रिफ्रेंस टू द हिमालयाज’ नाम से यह पेपर हिमालयन जियोलाजी जर्नल और जर्नल आफ नेपाल जियोलाजिकल सोसाइटी, काठमांडू में भी प्रकाशित हुआ है।
ऑस्ट्रेलिया में भी यही क्रम
सेंट्रल ऑस्ट्रेलिया में भी साइनोबैक्टीरिया के इसी तरह की संरचना का निर्माण करने की बात सामने आई है। वहां भी जीवन क्रम पर से पर्दे उठाने के लिए वैज्ञानिक इसी दिशा में काम पर जुटे हैं।
‘हर नई खोज पुराने शोध को एक नया आधार दे देती है। अपने हिमालय की संरचना को लेकर कार्य अभी जारी है। कई नए आयाम सामने आने बाकी हैं’।
--डा. वीसी तिवारी, वरिष्ठ वैज्ञानिक, वाडिया हिमालयन भू-विज्ञान संस्थान