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खुर्शीद के ट्रस्ट के खिलाफ पहले भी मिली थीं शिकायतें
योगेंद्र बघेल/कन्नौज
Updated Thu, 11 Oct 2012 02:01 PM IST
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केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद के डॉ. जाकिर हुसैन मेमोरियल ट्रस्ट का एक और कारनामा दो साल बाद उजागर हुआ है। ट्रस्ट ने तहसीलदार और जिला विकलांग कल्याण अधिकारी के जाली हस्ताक्षरों से 240 विकलांगों की उपकरण राशि हथियाने की कोशिश की थी, लेकिन छानबीन में मामला पकड़ गया था। ताजा स्टिंग ऑपरेशन चर्चाओं में आने के बाद इस मामले का खुलासा हुआ है। अब जिलाधिकारी डॉ. आदर्श सिंह मामले की नए सिरे से जांच कराने जा रहे हैं।
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केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद डॉ. जाकिर हुसैन मेमोरियल ट्रस्ट के चेयरमैन और उनकी पत्नी लुईस खुर्शीद प्रोजेक्ट डाइरेक्टर हैं। पिछले दिनों जैसे ही ट्रस्ट की करतूतों का एक स्टिंग ऑपरेशन में खुलासा हुआ, यहां के अधिकारी भी ट्रस्ट से संबंधित फाइलें पलटने लगे हैं।
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जिला पिछड़ा वर्ग कल्याण अधिकारी यश कुमार वर्मा ने बताया कि वर्ष 2009-10 में विकलांग उपकरण बांटने के नाम पर हुई ट्रस्ट की जालसाजी के दौरान पीके त्रिपाठी जिला पिछड़ा वर्ग कल्याण अधिकारी थे। विकलांग कल्याण विभाग के निदेशक ने जब 28 जून, 2011 को जांच के लिए दस फीसदी विकलांग उपकरण लाभार्थियों की सूची जांच के लिए भेजी तो चार्ज हमारे पास था। उस सूची के अनुसार, कुल 240 विकलांग लाभार्थियों को उपकरण बांटने के नाम पर फर्जीवाड़े की कोशिश हुई।
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यश कुमार वर्मा ने बताया कि 12 जुलाई, 2011 को उन्हें और तत्कालीन तहसीलदार को छानबीन में सूची पर अंकित उनके हस्ताक्षर जाली पाए गए थे। उस समय विकलांग कल्याण निदेशक ने यह भी जानना चाहा था कि ट्रस्ट ने जिस शिविर में 240 विकलांगों को उपकरण बांटने का दावा किया है, उसकी जानकारी जिलाधिकारी को दी गई या नहीं। क्या उस कार्यक्रम की कवरेज स्थानीय समाचारपत्रों में प्रकाशित हुई है। 21 जुलाई को निदेशक को पत्र भेजकर ट्रस्ट के पूरे फर्जीवाड़े से अवगत करा दिया गया था। जिलाधिकारी डॉ. आदर्श सिंह ने बताया कि अब मामले की नए सिरे से जांच कराई जाएगी।
फर्रुखाबाद में भी हुए थे जाली हस्ताक्षर
डॉ. जाकिर हुसैन मेमोरियल ट्रस्ट मामले की एक शिकायत एटा से की गई थी। उस मामले की जांच में भी अधिकारियों के हस्ताक्षर जाली पाए गए थे। 29 मई, 2010 को तहसील कायमगंज में शिविर लगाकर विकलांगों को उपकरण बांटे गए थे। लाभार्थियों की सूची पर तत्कालीन सीएमओ डॉ. पीके पोरवार और तत्कालीन तहसीलदार मोहन सिंह के हस्ताक्षरों की जांच की गई थी। विकलांग कल्याण निदेशक ने सूची सत्यापन के लिए जिला प्रशासन के पास भेजी। तत्कालीन जिला विकलांग कल्याण अधिकारी रामअनुराग वर्मा ने जांच में दोनों अफसरों के हस्ताक्षर फर्जी बताए थे, जिसकी रिपोर्ट जिलाधिकारी के माध्यम से शासन को भेज दी गई थी।