खत्म हो सकती है मुस्लिमों की एक पुरानी परंपरा
मौखिक, एकतरफा या तीन बार तलाक बोलने से पति-पत्नी के संबंध को खत्म करने की मुस्लिम समुदाय की परंपरा पर पूरी तरह से पाबंदी होनी चाहिए। इसकी वजह से शादीशुदा जीवन में हमेशा अस्थिरता और तलाक का भय बना रहता है। वहीं पत्नी की उम्र जाने बगैर पति के जरिए किये गये दुष्कर्म को अपराध मानकर उसपर कार्रवाई होनी चाहिए।
मई 2013 में गठित उच्च स्तरीय समिति ने ऐसी कई महत्वपूर्ण सिफारिश अपनी हालिया रिपोर्ट में शामिल कर महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को सौंप दी है। पंजाब युनिवर्सिटी की पूर्व प्रोफेसर डॉ पैम राजपूत की अध्यक्षता में गठित समिति ने स्टेटस ऑफ वुमन नाम से तैयार किये गए रिपोर्ट में शादी और तलाक के मामले में हिंदू लॉ, मुस्लिम लॉ में बदलाव का सुझाव दिया है।
वहीं सभी धर्म में विवाह पंजीकरण अनिवार्य बनाने की सिफारिश की गई है। यूपीए दो सरकार ने अपने कार्यकाल के आखिरी साल में इस समिति का गठन किया था। हालांकि कई इस्लामिक देशों में तीन बार तलाक बोलने से शादी को तोड़ने की परंपरा खत्म हो चुकी है। लेकिन भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ में यह अब भी मान्य है।
पुरुषों की संपत्ति नहीं है महिला
लंबे समय से मुस्लिम महिला संगठन कानून में सुधार की गुहार लगा रही हैं। एसएमएस, फेसबुक या स्काइप पर तीन दफा तलाक बोलकर महिलाओं को छोड़ने के मामले मुस्लिम समुदाय में तेजी से बढ़े हैं। लेकिन इस पर गौर नहीं किया जा रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि महिलाएं पुरूषों की संपत्ति नहीं है।
इसलिए पत्नी के साथ जबरदस्ती नहीं होनी चाहिए। समिति ने कहा है कि शादीशुदा जिंदगी के बदतर हाल में पहुंचने का वास्ता किसी भी तलाक का आधार नहीं होना चाहिए। सभी जाति में विवाह के लिए एक समान आयु सुनिश्चित होनी चाहिए। तो दूसरी ओर ऑनर किलिंग के संबंध में समिति ने राष्ट्रीय महिला आयोग और तमाम महिला संगठनों की सिफारिश के आधार पर अलग से एक कानून बनाने की सिफारिश की है।
खाप पंचायत के निर्णयों से ऑनर किलिंग की घटनाएं बढ़ने के साथ ऐसे प्रयासों को बल मिलता है। इसलिए आपराधिक धारा के तहत ऐसे मामलों में कड़े दंड का प्रावधान होना चाहिए। समिति ने मुस्लिम महिलाओं के पिछड़ेपन और उन पर हिंसा के मामलों को संज्ञान में लेते हुए उनके लिए अलग से एक आयोग के गठन की सिफारिश भी की है।
लेकिन इनका कहना है कि तब्दीली की जरुरत नहीं
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने इस समिति की सिफारिशों को गंभीरता से लेते हुए संबंधित मंत्रालयों के साथ बैठक करने का निर्णय लिया है। ताकि सिफारिशों को अमलीजामा पहनाने में मदद मिल सके। मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि समिति की सिफारिशें कई दूसरे मंत्रालयों से भी संबंधित है।
इसलिए सभी संबंधित पक्षकारों, राज्य सरकार, विभागों के साथ बातचीत के बाद ही कोई ठोस कदम उठने की उम्मीद की जा सकती है। वहीं इस सिफारिश पर कई प्रतक्रियाएं सामने आ रही हैं। बरेली के मौलाना तसलीम रजा खां, का कहना है कि मुस्लिम लॉ में कोई तब्दीली की जरूरत नहीं है। यह कुरआन की रोशनी में बना है।
तलाक का जहां तक सवाल है यह अच्छी चीज नहीं है। औरत को समझाने के लिए एक बार भी तलाक दी जा सकती है। इसके बाद फिर औरत को मर्द खुद ही अपने निकाह में ले सकता है। दूसरी बार तलाक कहने पर दोबारा निकाह करना होगा। तीसरी बार वह तलाक दे देता है तो रिश्ता खत्म हो ही जाएगा।
देवबंद को भी नहीं कबूल है सिफारिश
वहीं मौलाना आसिफ देवबंदी का कहना है कि तलाक की नौबत ही नहीं आनी चाहिए। अगर आ भी जाए तो महिला को डराने-धमकाने के लिए एक बार दी जाए। इसके बाद दोनों में फिर बोलचाल हो जाती है तो तलाक खत्म हो जाती है। तीन महीने दस दिन पत्नी से नहीं बोला तो तलाक हो जाती है।
एक महीने बाद फिर तलाक दी जा सकती है।मुफ्ती मोहम्मद सलीम नूरी ने कहा कि एक साथ तीन तलाक देना इस्लाम के एतबार से भी गलत है। अगर किसी ने कह दिया तो हो जाएगी। शरीयत के तलाक इद्दत आदि से संबंधित जितने भी दिशा निर्देश और कानून हैं, सब बिल्कुल साफ सुथरे हैं।
उसमें किसी संशोधन की कोई आवश्यकता नहीं है। हां इतना जरूर है कि इन कानूनों से मुस्लिम समुदाय को आगाह कराया जाए। देवबंद भी इस सिफारिश की खिलाफत पर उतर आई है।
देवबंद को नहीं कबूल है सिफारिश
तलाक. तलाक..तलाक...। इन तीन लफ्जों को उच्च स्तरीय कमेटी द्वारा गलत करारते हुए खत्म करने की सिफारिश पर दारुल उलूम और देवबंदी उलेमा ने कड़ा ऐतराज जताया है। प्रतिक्रिया जताई कि कमेटी को यह हक नहीं कि वह मजहबी मामले में किसी तरह का हस्तक्षेप करे।
विश्वविख्यात इस्लामिक शिक्षण संस्था दारुल उलूम के मोहतमिम मौलाना अबुल कासिम नोमानी बनारसी ने कहा कि हिंदुस्तान का कानून सब धर्मों को अपने अंदाज में रहने की आजादी देता है। उसी की बुनियाद पर तमाम धर्मों में इबादतों के तरीके मौजूद हैं। उसी को आधार बनाकर इस देश में तमाम धर्मों के लोग अपनी संस्थाएं और इबादतगाहें बनाए हुए हैं।
इसी मजहबी आजादी के कानून की बुनियाद पर हिंदुस्तान में मुस्लिम पर्सनल लॉ को कानूनी हैसियत हासिल है। इसलिए संविधान के खिलाफ अगर कोई भी कमेटी कुछ सिफारिश करती है तो उसको माना नहीं जा सकता। मौलाना बनारसी ने कहा कि इस्लाम में क्या सही है और क्या गलत है ये कहने का अधिकार किसी आयोग, कमेटी या कानून को नहीं हो सकता।
इस्लाम में तीन तलाक का जो तरीका प्रचलित है वो ही सही है। उसके खिलाफ जो लोग गैर जरूरी जुबान बोलते हैं वो हिंदुस्तान के संविधान की तौहीन करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यह सीधे सीधे मजहबी मामले में खुला हस्तक्षेप करना है। जो सरासर गलत है।
दारुल उलूम वक्फ के वरिष्ठ उस्ताद मौलाना नसीम अख्तर शाह कैसर ने कहा कि जिन लोगों को इस्लामी लॉ की जानकारी नहीं, उन्हें इस तरह की सिफारिश करने का कोई अधिकार नहीं है।