'बीसीसीआई के पास कम हैं बचाव के रास्ते'
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जस्टिस आरएम लोढ़ा कमेटी की सिफारशें आने के बाद बीसीसीआई भले ही उसकी काट ढूंढने में जुट गई, लेकिन बृहस्पतिवार को सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के बाद उसकी मुश्किलें बढ़ गई हैं। लोढ़ा कमेटी की सिफारशों में अहम योगदान देने वाले पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस मुकुल मुद्गल का कहना है कि अब बोर्ड के पास बचाव के रास्ते कम हैं।
उन्हें लगता है कि बोर्ड को लोढ़ा कमेटी की सिफारशें माननी होंगी। बावजूद इसके सुनवाई की तिथि तीन मार्च तक इंतजार करना चाहिए।
जस्टिस मुद्गल यह भी साफ कर देते हैं कि उनकी राय में एक या दो को छोड़ सभी सिफारशें मानने योग्य हैं। उनका मानना है कि कमेटी की ओर से मैचों के प्रसारण के दौरान सिर्फ ब्रेक के समय विज्ञापन दिखाए जाने की सिफारिश पर सुनवाई हो सकती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं होगा कि अदालत इस पर बोर्ड को राहत दे सकती है।
रीव्यू और क्यूरेटिव पिटीशन डालने का विकल्प
सुप्रीम कोर्ट की ओर से अगर
बोर्ड को लोढ़ा कमेटी की सिफारशें लागू करने के लिए बोला जाता है तो
बोर्ड के पास बचाव के रास्ते बेहद कठिन हैं। जस्टिस मुद्गल का कहना है कि
फैसला खिलाफ जाने की स्थिति में बोर्ड रीव्यू पिटीशन और उसके बाद क्यूरेटिव
पिटीशन दाखिल कर सकता है। लेकिन दोनों ही मौकों पर राहत मिलने के अवसर कम
होते हैं।
रीव्यू पिटीशन में वही बेंच सुनवाई करती है जिसने फैसला सुनाया
होता है और क्यूरेटिव पिटीशन में सुनवाई उच्चस्तरीय तीन जज करते हैं।
बोर्ड
ने कमेटी की सिफारशों पर राज्य एसोसिएशनों से आपत्तियां मांग तो लीं,
लेकिन इन पर अंतिम राय बनाने से पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने कमेटी की
सिफारशें लागू करने की सलाह बोर्ड को दे डाली। अब सात फरवरी को होने वाली
बैठक में बोर्ड के समक्ष यह चुनौती होगी किन आपत्तियों को अदालत के समक्ष
रखा जाए।