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कोयला कंपनियों का घाटाः कितना सच?

Wed, 01 Oct 2014 08:00 PM IST
Updated Wed, 01 Oct 2014 08:00 PM IST
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कोयला खदानों के लाइसेंसों को रद्द करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अर्थव्यवस्था पर नज़र रखने वाले लोगों ने एक नए तरह की बहस छेड़ दी है।

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कुछ हलकों में ये तर्क दिया जा रहा है कि इससे बिजली संकट गहरा हो जाएगा, बैंकों के क़र्ज़ वापस होने में दिक्क़तें पेश आएंगी और पूरी अर्थव्यवस्था को गहरा नुकसान पहुंचेगा।
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एक स्तंभकार के अनुसार अदालत द्वारा लगाए गए जुर्माने को चुकाने के लिए कंपनियों को 8800 करोड़ रुपयों से अधिक रक़म की व्यवस्था करनी होगी।

जो कोर्ट ने उन्हें अब तक निकाले गए कोयले के बदले देने के लिए कहा है।

'कोल ब्लैक जस्टिस'

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जाने माने अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला तो इस फ़ैसले को 'कोल ब्लैक जस्टिस' क़रार देते हैं।

उनके मुताबिक़ 214 कोयला ब्लॉक्स के लाइसेंसों को रद्द करने का सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला ग़लत था।

वे कहते हैं, "फैसले के तहत प्राइवेट कंपनियों को तो लाइसेंस से हाथ धोने के साथ-साथ जुर्माना भरना पड़ रहा है लेकिन अफ़सरशाही और राजनीतिज्ञों की कोई ज़िम्मेदारी तय नहीं हुई है।"

लेकिन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जनरल सेक्रेटरी और राज्यसभा सांसद डी राजा का कहना है कि लाइसेंसों को रद्द करने का फ़ैसला अंतरिम है और मामले में जांच जारी है।

इसी मामले का ज़िक्र करते हुए डी राजा कहते हैं कि पिछली केंद्र सरकार के क़ानून मंत्री को इसी मामले में हुई गड़बड़ी के कारण पद से हटना पड़ा था।

बिजली उत्पादन पर असर

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इस मामले पर औद्योगिक संगठन सीआईआई के अध्यक्ष अजय श्रीराम के हवाले से कहा गया है कि अदालत के निर्णय का असर बिजली, स्टील और खनन क्षेत्र पर पड़ेगा।

ख़ासतौर पर बिजली के क्षेत्र पर जिसका दो तिहाई उत्पादन कोयले से चलने वाले बिजलीघरों के माध्यम से होता है।

सीआईआई ने कहा है कि देश में पहले से ही कोयले की कमी है जिसका असर बिजली उत्पादन पर पड़ रहा है।

समूह के मुताबिक़ बिजली के क्षेत्र की ज़रूरत के लिए ही भारत को सालाना 80 मिलियन टन कोयला आयात करने की ज़रूरत पड़ती है।

लेकिन डी राजा कहते हैं कि बढ़ते शहरीकरण और कृषि में भी बिजली के उपकरणों के बढ़ते इस्तेमाल की वजह से बिजली की मांग बढ़ रही है लेकिन इन दोनों को जोड़कर नहीं देखा जा सकता है।

वो कहते हैं कि वैसे भी आवंटित 218 ब्लॉकों में से महज़ 40 ही उत्पादन के स्तर तक पहुंच पाए थे।

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असर कुल संपत्ति पर

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सामाजिक कार्यकर्ता सुदीप श्रीवास्तव के मुताबिक़ कोयला खदानों के आवंटन का फ़ायदा महज़ खदान से हुए मुनाफ़े तक ही सीमित करके नहीं देखा जा सकता है क्योंकि जब इस तरह के प्रोजेक्ट कंपनी के हित में आते हैं तो उसका असर शेयर बाज़ारों में उनके शेयर से लेकर कंपनी की कुल संपंत्ति पर भी पड़ता है।

जो लोग कोयला ब्लॉक आवंटन के खिलाफ़ सुप्रीम कोर्ट गए थे, सुदीप श्रीवास्तव उनमें से एक हैं।

वे ये सवाल भी उठाते हैं कि ये आवंटन अगर इतने अहम थे तो अब तक इनमें खनन का काम शुरू क्यों नहीं किया गया?

सुरजीत भल्ला इस बात को मानते हैं कि एक समय बाज़ार में ईंधन के दाम बढ़े थे और शायद इसी वजह से इन कंपनियों को इन खदानों में निवेश करने में फ़ायदा नज़र आया।

लेकिन बाद में शायद ये उनके अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं बढ़ा और उन्होंने इस पर अधिक ध्यान नहीं दिया।

आर्थिक परिवेश

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सुदीप श्रीवास्तव इस बात को दूसरे तरीक़े से सामने रखते हैं और कहते हैं कि एक कंपनी ने एक ही स्टील या पावर प्रोजेक्ट के नाम पर कई कई कोयले के ब्लॉक अपने नाम लिए ताकि ख़ूब मुनाफ़ा कमाया जा सके।

भल्ला का कहना कि बदलते आर्थिक परिवेश में मुनाफ़ा शब्द को बुरी नज़र से देखने की पुरानी आदत से भारतीयों को बाहर आना होगा।

मगर वो उद्योग जगत पर ज़रूरत से ज्यादा लगाए गए जुर्माने की बात बार बार उठाते हैं और कहते हैं कि कंपनियों को जो रक़म चुकाने के लिए कहा गया है वो उससे कहीं ज्यादा है जो उन्होंने खदानों से कमाया है।

उद्योग जगत का कर्ज

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उद्योग जगत कर्ज़ का बोझ बढ़ने की बात भी बार-बार कह रहा है।

हालांकि डी राजा कहते हैं कि इसका असर कंपनियों पर नहीं सरकारी बैंकों पर होगा जिसके सबसे बड़े डिफॉल्टर (लेनदार) उद्योग जगत के लोग हैं और निवेश पर असर होने की बात महज़ सरकार पर दबाव बनाने का तरीक़ा है।

लेकिन जिस समय स्पेक्ट्रम घोटाला सामने आया था कई अंतरराष्ट्रीय टेलीकॉम कंपनियां या तो भारत से वापस चली गई थीं या उन्होंने अपने निवेश की सीमा को कम कर दिया था।

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