'सफाई हमारा काम है, वो अपना काम करें'
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कमला चांगरा अब उम्र के सात दशक पार कर चुकी हैं। दो बेटों और पांच बेटियों की मां कमला जब पीछे मुड़ कर देखती हैं तो बीते समय की ''बास''(गंध) उनका पीछा नहीं छोड़ती।
राजस्थान के कुचामन शहर के पास बूटरु गांव से जयपुर जिले के सांभर कंस्बे में वो कम उम्र में ही ब्याह कर आयीं।
अपनी सास की अकेली बहू थीं इसलिए उनकी मदद के लिए जल्दी ही सर पर मैला ढोने के काम में लगना पड़ा।
वो कहती हैं, ''मुझे तो आते ही लगा दिया सास ससुर ने गंदीवाड़ा उठाने के काम में। अपने गांव में मैंने ऐसा नहीं देखा था। मैं अपने नाक-मुंह पर ''डाटा'' (कसकर कपड़ा बांधना) लगा कर काम करती थीं पर बदबू के मारे माथा चकरा जाता था, उलटी आने लगती थी। घर लौट कर आने पर भी वही बदबू जैसे पीछा करती और रोटी भी नहीं भाती थी।”
वो कहती हैं, ''बहुत ही परेशानी होती थी, पूरे वक्त वो ही सब दिखता।''
'सफाई हमारा काम है'
यही कहानी तेली दरवाजे में रहने वाली उनकी पड़ोसन कमला पवार की भी है। वो कहती हैं, ''शादी के बाद दो तीन साल बिठा कर सास ने इस गंदगी के काम में लगा दिया। पीड़ा तो बहुत ही महसूस हुई। नाक और मुंह पर खुब डाटा लगाकर ही काम कर पाती थी।''
घर के सब लोग यही काम करते थे। अभी दो तीन साल से ही बंद हुआ है।
मजदूरी के नाम पर आज से पचास साल पहले हर घर से मिलते थे कोई आठ आने और दोनों वक़्त का खाना। दो अक्तूबर से देश में चलाए जा रहे स्वच्छता अभियान के बारे में दोनों को ज़्यादा जानकारी नहीं है।
पर कमला पवार का मानना है कि “बड़े अफ़सर झाड़ू उठाएं और खुद सफाई करें, यह ग़लत है। वो अपना काम करें और सफाई कर्मियों को अपना काम करना चाहिए।
वो कहती हैं, "हमारा काम सफ़ाई का है, यह हम करेंगे। वो दफ्तर संभालें।''