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'गंदी' आदतों के साथ स्वच्छ भारत?

Fri, 03 Oct 2014 08:46 AM IST
Updated Fri, 03 Oct 2014 08:46 AM IST
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clean india with bad habits?

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को देशव्यापी स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की। इस अभियान की शुरुआत महात्मा गांधी की जयंति दो अक्तूबर को की गई है। गांधी जी निजी और सार्वजनिक जीवन में सफ़ाई बरतने को बहुत अहमियत देते थे।

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इस वक़्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उद्घाटन को सफल बनाने के लिए तमाम मंत्री और अधिकारी जोर-शोर से जुटे हुए हैं। लेकिन उद्घाटन के बाद इस अभियान को जारी रखने के लिए ज़रूरी होगा कि आम लोग भी इसमें सहयोग करें।
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आम भारतीय अपने घर से बाहर किसी भी सार्वजनिक स्थान को गंदा करने में कई बार बिल्कुल नहीं झिझकते। स्वच्छ भारत के लिए सरकारी अमलों के साथ जनता को भी अपनी आदतें बदलनी होंगी।
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पढ़ें पुष्पेश पंत का लेख विस्तार से

‘स्वच्छता ईश्वर की भक्ति के सबसे समीप है’

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गांधीजी ने एक बार कहा था कि ‘स्वच्छता ईश्वर की भक्ति के सबसे समीप है’ (Cleanliness is next to Godliness) और शायद इसीलिए आज गांधी की विरासत को सहेजने के प्रयास में नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रपिता के जन्मदिन पर स्वच्छता अभियान के सूत्रपात का फैसला किया है।

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी महात्मा गांधी की जयंति दो अक्तूबर को स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत करेंगे।

शुभ दिन की प्रतीक्षा के पहले ही मंत्रियों तथा आला अफसरों ने झाड़ू थाम ली है और कैमरे के आगे अपने-अपने अश्वमेधी घोड़े छोड़ने में जुट गए हैं। यह शक़ बेबुनियाद नहीं कि इस बार भी यह अनुष्ठान दिखावा भर ही न रह जाए, अधिक से अधिक एक सालाना दिखावटी रस्म अदायगी।

बहरहाल यह ‘पर्व’ हमें भारतीय जीवन में स्वच्छता के बारे में गंभीरता से सोचने का एक नायाब मौका दे रहा है जिसका सदुपयोग किया जाना चाहिए।

सफाई की जिम्मेदारी

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अक्सर यह कहा जाता है कि हम हिंदुस्तानी अपने शरीर की सफाई का तो ध्यान रखते हैं, अपने घरों को भी जहां तक हो सके साफ़-सुथरा रखते हैं पर सार्वजनिक जीवन में साझे के स्थानों को दूसरे की ज़िम्मेदारी मान कर चलते हैं। जहां जी चाहे थूकते हैं, लघुशंका से निवृत्त हो लेते हैं।

ख़ाली प्लास्टिक की बोतल, थर्मोकोल की पत्तल हो या नमकीन मिठाई या गुटका मसाला के चमकीले पैकेट-पन्नियां इन्हें प्यार बांटते चलो वाली अदा में यत्र-तत्र-सर्वत्र बिखेरना हमारी आदत हो गई है।

ठंडे दिमाग़ से सोचने की बात यह है कि सार्वजनिक स्थानों का प्रदूषण क्या हमारी सांस्कृतिक विरासत है या एक मजबूरी जिसके लिए कहीं वर्ण व्यवस्था ज़िम्मेदार है तो कहीं वर्ग विभाजन?

'सबसे बड़ी प्रदूषक ग़रीबी है'

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इंदिरा गांधी ने एक बार कहा था सबसे बड़ी प्रदूषक ग़रीबी है। क्या यह सच नहीं कि जिन झोपड़पट्टियों को आज मलिन बस्ती कहा जाने लगा है उनकी गंदगी के लिए वहां रहने वाले नहीं बल्कि अभागे ग़रीबों के लिए शौच-स्नान या कूड़े के निबटान के लिए बुनियादी सुविधाओं का प्रबंधन करने में सरकारी असमर्थता जिम्मेदार है?

पौ फटने के साथ साथ हाजत-रवां करने के लिए ‘जाएं तो जाएं कहां?’ का सवाल हर सवेरे मुफलिस के लिए मुंह बाए खड़ा होता है। पीने के लिए पानी के अभाव में तरसता बेघर नागरिक भला अपने किए पर पानी कैसे फेर सकता है?

गांधी अपने आश्रमवासियों से जब शौचालय साफ़ करने को कहते थे तब उनका एक मक़सद यह भी था कि सर पर दूसरों का मल ढोने की जन्मजात मजबूरी झेलने वाले और इस कारण अस्पृश्य समझे जाने वाले भाई-बहनों की यंत्रणा का अनुमान वह लगा सकें।

आदतन गंदे होते हैं-गंदगी पैदा करते हैं

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हम यह मान कर चलते हैं जो ग़रीब हैं, दलित हैं या निर्धन अल्पसंख्यक हैं वह आदतन गंदे होते हैं- गंदगी पैदा करते हैं। विडंबना यह है कि इस गंदी सोच को ही सबसे पहले साफ़ किया जाना चाहिए यह कोई नहीं कह रहा!

कहीं न कहीं इस कड़वे सच का सामना भी ज़रूरी है कि यह समस्या शौचालयों तथा पेशाबघरों या कूड़ादानों के निर्माण तथा रख-रखाव तक सीमित नहीं।

सरकार जो कर सकती है या स्वयंसेवी ग़ैर-सरकारी संगठन जो कर सकते हैं उसकी सीमाएं हैं। हमारे अपने दैनिक-सार्वजनिक जीवन में ‘क्रांतिकारी’ बदलाव के अभाव में सभी स्वच्छता-अभियान टांय-टांय फिस ही होते रहेंगे। शवदाह के बाद अधजली लाशों का-अस्थियों का विसर्जन कब तक जारी रह सकता है?

जीवन-मरण का प्रश्न

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औद्योगिक प्रदूषकों या शहरी मल पदार्थ का नदियों में विसर्जन चलता रहा तो इस पानी को पीने वाले नदी के देहांत से पहले ही प्राण त्याग देंगे इसमे संदेह नहीं। लब्बोलुबाब यह है कि स्वच्छता सिर्फ़ सौंदर्य प्रसाधन या सुरुचि का विषय नहीं हमारे जीवन-मरण से जुड़ा मुद्दा है।

अगर भारत के प्रधान मंत्री ने इसे दलगत राजनैतिक रस्साकशी के कारण भी उठाया है तो इसका तिरस्कार नहीं किया जाना चाहिए। प्रतीकों का अपना महत्व होता है।

यह बहस मात्र देवालय बनाम शौचालय की नहीं- संक्रामक महामारियों के नियंत्रण, पेय जल सुरक्षा, शहरी आबादी तथा उद्योगों के काम-काज से उत्पन्न कचरे के निबटान जैसी विकट चुनौतियों का सामना करने का आह्वान भी है।

स्वच्छता अभियान के सरकारी अनुष्ठान का मूक या छींटाकशी करने वाला दर्शक बना रहना हमारे हित में नहीं!

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