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चुपके, चुपके आंसू बहाना भी कोई गजल है?

Tue, 17 Mar 2015 11:21 AM IST
Updated Tue, 17 Mar 2015 11:21 AM IST
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Chupke chupke aanshu bhana cant be a Gazal

‘चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है।’ एक ऐसी गजल है जिसे आम तौर पर हिंदुस्तान-पाकिस्तान में हर आदमी सुनता है और तारीफ करता है। मगर शम्सुर्रहमान फारूकी उनमें शरीक नहीं हैं। वो इसे फिजूल का आंसू बहाना कहते हैं।

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‘कई चांद थे सरे आसमां’ जैसे व्यापक फलक वाले उपन्यास के लेखक और उर्दू आलोचक फारूकी ने दिल्ली के एक भरे ऑडिटोरियम में जब मौलाना हसरत मोहानी की लिखी गजल ‘चुपके, चुपके रात दिन’ को खारिज करते हुए गजल के सफर पर अपनी बात रखी तो सुनने वाले खामोशी से सुनते रहे।
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उन्होंने कहा कि उर्दू में शायरी तो सौ सवा सौ साल से हो रही थी लेकिन गजल नहीं थी। उर्दू साहित्य के बहुत से आलोचक ये कहकर गजल की आलोचना करते हैं कि ये विधा विदेशी है।
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लेकिन फारूकी ने कहा, “ये बात ठीक है कि गजल ईरान से आई। पर हमें अच्छी लगी तो हमने ले ली। ठीक वैसे ही जैसे अंग्रेजी साहित्य में नाटक और सॉनेट जैसी विधाएं दूसरी भाषाओं से ली गईं।”

उन्होंने कहा कि दक्कन के शायरों, खास तौर पर मोहम्मद अली कुतुबशाह और दूसरे लोगों ने हिंदुस्तान में गजल की शुरुआत की। गुजरात में 15वीं सदी में जो उर्दू शायरी हुई उसमें गजल नहीं थी, मस्नवी जरूर थी और जिक्री थी, जिन्हें रागों के आधार पर गाया जाता था।

“दक्कन के शायर न होते तो गालिब भी न होते।”

Chupke chupke aanshu bhana cant be a Gazal

फारूकी मानते हैं कि दिल्ली वालों यानी दिल्ली के मीर तकी मीर जैसे पुराने शायरों ने ये गलतफहमी को पैदा किया और बढ़ावा दिया कि गजल दिल्ली की उपज है, जबकि ये गलत है।

सच तो ये है कि वली दक्कनी की गजल पर दो सौ साल बाद सत्रह बरस के लड़के यानी मिर्जा असदुल्ला खां गालिब ने गजल कही। “दक्कन के शायर न होते तो गालिब भी न होते।”

उन्होंने कहा, “ये जरूरी है कि हम अपने इतिहास को सिर्फ देहली (दिल्ली) तक सीमित न रखें।” साथ ही ये भी कहा कि गजल में अगर सीधे दिखने वाले भाव के अलावा कुछ और गूढ़ अर्थ छिपा न रहे तो उसे स्तरीय गजल नहीं माना जा सकता।

बौद्धिक तीखापन गजल को गजल बनाता है

Chupke chupke aanshu bhana cant be a Gazal

गजल के सफरनामे का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि अगर गजल आपके बौद्धिक विकास में मदद न करे तो कैसी गजल?

यानी अगर आप गजल को सिर्फ संगीत में ढाली गई इश्क, आंसू, गुल और बुलबुल की शायरी मानकर उसे अपने अकेलेपन या दोस्तों की महफिल को गुलजार करने का औजार मानते हैं तो शम्सुर्रहमान फारूकी की बात आप तक नहीं पहुंच पाई।

गजलगोई की बारीकियों की चर्चा करते हुए उन्होंने बताया की वली दक्कनी, मीर तकी मीर, दाग देहलवी और इब्राहीम ज़ौक जैसे शायरों ने अपनी अपनी तरह से गजल को परवान चढ़ाया।

मीर तकी मीर के योगदान का जिक्र करते हुए फारूकी ने बताया कि “मीर ने गजल में सादा जबान रखी लेकिन उसमें बौद्धिक गहराई थी। इसलिए अगर आप गजलें सुनने और पढ़ने के शौकीन हैं, तो अगली बार सिर्फ “गुलो बुलबुल” की शायरी नहीं बल्कि उसमें छिपे गूढ़ रहस्य पर नजर डालें।

शम्सुर्रहमान फारूकी के शब्दों में, “यही बौद्धिक तीखापन गजल को गजल बनाता है।

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