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समलैंगिकता को वैध करने के खिलाफ हैं हिन्दू, मुस्लिम और ईसाई समुदाय

Wed, 03 Feb 2016 03:52 PM IST
Updated Wed, 03 Feb 2016 03:52 PM IST
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Christian, Muslim and Hindu groups insist Supreme Court must NOT make homosexual acts legal in India

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर ने जैसे ही 2013 में आए फैसले पर पुनर्विचार करने का फैसला सुनाया वैसे ही कोर्ट के बाहर खड़े समलैंगिकों से चेहरे पर मुस्कान खिल उठी। वे एक दूसरे को गले लगाने लगे और चूमने लगे। लेकिन वहीं दूसरी ओर वे लोग निराश हो गए जो नहीं चाहते कि देश में समलैंगिकता को वैध करार दिया जाए।

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समलैंगिकता को लेकर देश के लगभग सभी धर्मों में एक जैसी ही मान्यताएं हैं। भारतीय समाज के लगभग सभी धर्मों का मानना है कि समलैंगिकता का हमारी संस्कृति में कोई स्थान नहीं है। इसमें हिन्दू, मुस्लिम और ईसाई धर्म के लोग शामिल हैं। उन लोगों का कहना है कि 2009 में समलैंगिकता को लेकर आए दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला 'अंतरराष्ट्रीय चलन और पश्चिमी सभ्यता' को पोषक था।

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उन लोगों को का कहना है कि भारत और दुनिया की अन्य सभ्यताओं में जमीन आसमान का अंतर है। अपोस्टोलिक चर्च अलायंस के की ओर से वकील मनोज वी जॉर्ज ने कहा, 'बाइबिल में समलैंगिकता को वर्जित बताया गया है। ईसाई मान्यताओं के तहत इस पाप माना गया है।'

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सभी धर्मों की मान्यता समान

Christian, Muslim and Hindu groups insist Supreme Court must NOT make homosexual acts legal in India

वहीं मुस्लिम धर्म की ओर से ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य सय्यद कासिम रसूल इलियास ने कहा, 'हम इस क्यूरेटिव याचिका का विरोध करेंगे। समलैंगिकता सभी धर्मों के आस्था के खिलाफ है। अगर से वैध कर दिया जाता है तो इससे समाज में समस्याएं पैदा होगी।'

वहीं विश्व हिन्दू परिषद (वीएचपी) के चंपत राय का कहना है कि, 'समलैंगिकता पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित है और यह भारतीय संस्कृति के खिलाफ है। जो लोग पश्चिम से प्रभावित हैं वो इसकी वकालत कर रहे हैं। उन्हें जो करना है करें लेकिन भारत में ऐसा नहीं होने दिया जाएगा क्योंकि यह हजारों साल पुरानी संस्कृति का प्रतीक है और इसका इतिहास काफी गौरवशाली है।'

गौरतलब है कि मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर ने धारा 377 को वैध करने के लिए दायर क्यूरेटिव याचिका की सुनवाई की जिम्मेदारी पांच जजों की एक पीठ को सौंप दिया है। ये पीठ इस बात पर अपना फैसला सुनाएगी कि क्या धारा 377 को वैध करना चाहिए और इसका समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा? समलैंगिकता को वैध करार देने के पक्ष में वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल इसकी पैरवी कर रहे हैं।

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