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मजबूत बनने की चीनी खेमेबंदी कितनी कारगर?

Mon, 02 Feb 2015 12:21 PM IST
Updated Mon, 02 Feb 2015 12:21 PM IST
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China to strengthen themselves so effectively

चीन के बढ़ते वर्चस्व से आज कौन इनकार कर सकता है। उसकी आर्थिक ताकत का लोहा महसूस करने को (लोहा मानने की इच्छा चाहे कतई न हो) तो दुनिया का सबसे ताकतवर देश अमेरिका भी मजबूर है। अमेरिकी सरकार ने चीन के केन्द्रीय बैंक से जो 30 खरब डॉलर उधार ले रखें हैं, वह भारत के सकल घरेलू उत्पाद से 10 खरब डॉलर ज्यादा है।

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यह भी सही है कि चीन सौ से भी अधिक देशों का प्रमुख व्यापारिक साझेदार है। लेकिन अगर बात सैद्धांतिक करीबी और वैदेशिक नीति की और इन्हीं पैमानों पर दोस्ती की हो, तो आज चीन की पेशानी पर कुछ बल पड़ते दिख जाएंगे।
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एक नजर डालें वे कौन से देश हैं जो आज चीन के साथ सैद्धांतिक एकता और करीबी दोस्ती के घेरे में दिखाई देते हैं—उत्तरी कोरिया, वेनेजुएला, सूडान और जिम्बाब्वे इस सूची में सबसे ऊपर दिखाई देंगे।
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इनके अंतरराष्ट्रीय प्रभाव के बारे में कुछ खास कहने की जरूरत नहीं। न ही ऐसा भी है कि खुद ही परेशानियों से घिरे इन देशों से चीन की गहरी दोस्ती से उसे कोई खास अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि हो सकेगी।

कारोबारी साझेदारी के बाद भी चीन के दोस्त बहुत कम

China to strengthen themselves so effectively

अब अगर रूस की बात करें तो एकबारगी उससे ऊर्जा क्षेत्र में चीन को दीर्घकालिक आपूर्ति की गारंटी हो भी सकती है और यह उसे शायद एशिया में अमेरिकी वर्चस्व को थामने में मददगार भी हो सकता है।

लेकिन इससे बड़ी सच्चाई यह भी है कि निकट भविष्य में यूरोप, अमेरिका और जापान ही चीन के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार बने रहने वाले हैं। इसलिए रूस की समूचे पश्चिमी जगत को ठेंगा दिखाने की जिद के मद्देनजर रूस-चीन की दोस्ती के गाढ़ेपन की एक सीमा है।

पूर्व श्रीलंकाई राष्ट्रपति महिन्दा राजपक्षे के समय की चीन-श्रीलंका दोस्ती में अरबों डॉलर के चीनी निवेश और 2014 में श्रीलंकाई बंदरगाह पर चीनी पनडुब्बी की तैनाती ने भारत को काफी खिजाया था।

हाल के चुनावों में राष्ट्रपति बने मैत्रीपाला सिरिसेना ने चुनाव के दौरान राजपक्षे की चीन-समर्थक नीतियों के खिलाफ जोरदार अभियान चलाया था। सिरिसेना के गद्दीनशीन होने से चीन को झटका लगा है।

चीन के दोस्त भी नहीं कर रहे उस पर विश्‍वास

China to strengthen themselves so effectively

इसी साल के शुरू में चीन ने वेनेजुएला को 20 अरब डालर की मदद देना स्वीकार किया। लेकिन वहां की अर्थव्यवस्था जिस दुर्दशा के भंवर में घिरी है, उससे चीन की इस भारी-भरकम मदद के अंधे कुएं में जा गिरने का अंदेशा हो चला है।

वेनेजुएला में दुनिया की सर्वाधिक मुद्रास्फीति की स्थिति बनी हुई है और पेट्रोल के गिरते दामों का दौर यों ही जारी रहा तो कह सकते हैं कि वेनेजुएला डिफाल्टर होने की ओर बढ़ रहा है।

एक लंबे समय से शेष दुनिया से अलग-थलग पड़े रहे कुछ चीनी दोस्त देशों में खुलेपन की बयार जोर मार रही है। क्यूबा और म्यांमार नये दोस्तों की तलाश में हैं और बीजिंग पर अपनी अति निर्भरता को घटाने की राह तलाश रहे हैं।

भले ही आज चीन क्यूबा का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और सबसे बड़ा आर्थिक मददगार भी है, लेकिन क्यूबा-अमेरिकी रिश्तों में सुधार की नई इबारत लिखे जाने की संभावना सारा खेल ही बदल के रख सकती है। हवाना-वाशिंगटन के बीच कुछ इसी तरह के रिश्ते पनप सकते हैं।

चीन की नीति अवसरों को भुनने की है

China to strengthen themselves so effectively

इसी तरह, आज तक यह तथ्य है कि चीन म्यामांर का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और सबसे बड़ा हथियार आपूर्तकर्ता लेकिन 2011 से देश में शुरू हुए लोकतांत्रिक सुधारों की प्रक्त्रिस्या ने जापान और सिंगापुर सरीखे खिलाड़ियों को भी म्यांमार में पैर जमाने का मौका दिया है।

इसी तरह चीन ने सूडान और उत्तरी कोरिया में भी भारी निवेश किया हुआ है, लेकिन उसे बदले में जो हासिल हो रहा है, उसका रणनीतिक महत्व कोई खास नहीं दिखता।

इंस्टीट्यूट ऑफ चाइनीज स्टडी में सहायक निदेशक जबिन टी जेकब के मुताबिक, बदली परिस्थितियों में चीन एक बड़ी शक्ति है, दोस्ती के बात मान भी ली जाए तो चीन के अपने साझेदार देशों के साथ कहीं बेहतर रिश्ते हैं।

चीन अमेरिका को ही ले लें, भले अमेरिका को चीन का साथी नहीं माना जाता हो, लेकिन दोनों देशों के बीच साझेदारी उच्च, मध्य और निम्न तीनों स्तरों पर है। इस दौरे में खराब रिश्तों के बाद भी अवसरों का लाभ उठाना एक बड़ी चुनौती है। चीन की नीति इन्हीं अवसरों को लेकर है।

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