भारत के जवाब में चीन ने लांच किया 'मेड इन चाइना'
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एक तरफ भारत अपनी मेक इन इंडिया पहल के लिए संभावित निवेशक और कंपनियों को आकर्षित करने के मोर्चे पर संघर्ष कर रहा है वहीं चीन की सरकार ने मेड इन चाइना कार्यक्रम 2025 की घोषणा कर दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा को अगले स्तर पर पहुंचा दिया है।
इस पहल के तहत चीन अगले 10 वर्ष में नवाचार, शोध एवं विकास, फैक्ट्री के परिचालन को पूरी तरह से कंप्यूटरीकृत बनाना और उत्कृष्ट तकनीक वाले उत्पादों पर फोकस करेगा।
दुनिया की फैक्ट्री के तौर पर पहचान रखने वाला चीन अब गियर बदल रहा है। चीन के उद्यमी मोदी सरकार की पहल से चिंतित नहीं हैं और वास्तव में ज्यादातर ने मेक इन इंडिया के बारे में सुना ही नहीं है।
मेक इन इंडिया में अब भी नीतिगत स्पष्टता नहीं
नरेंद्र मोदी सरकार का मेक इन इंडिया कार्यक्रम में अब भी नीतिगत दिशा के मोर्चे पर स्पष्टता का अभाव है और निवेशकों को अब भी यह नहीं पता कि इस मेक इन इंडिया पहल का क्या मतलब है।
केंद्र सरकार पिछले लगभग एक वर्ष से भी कम समय से इस मोर्चे पर स्पष्टीकरण देने के लिए संघर्ष कर रही है और भारत को अब भी किसी प्रमुख बहुराष्ट्रीय कंपनी से मैन्यूफैक्चरिंग फैसिलिटी स्थापित करने का प्रस्ताव नहीं मिला है।
सितंबर में घोषित किया गया मेक इन इंडिया कार्यक्रम विदेशी निवेश लाने और 2022 तक देश की अर्थव्यवस्था में मैन्यूफैक्चरिंग का हिस्सा मौजूदा 18 फीसदी से बढ़ा कर 22 फीसदी तक पहुंचाने की बात करता है।
भारत को टक्कर देना चाहता है चीन!
मेड इन चाइना 2025 देश को श्रम आधारित काम से आगे परिष्कृत क्षेत्रों रोबोटिक्स से लेकर एयरोस्पेस तक ले जाना है। मोदी का लक्ष्य ऐसी अर्थव्यवस्था में मूल मैन्यूफैक्चरिंग को लाना है, जिसे अच्छा वेतन देने वाली नौकरियों की जरूरत है।
सही मायने में चीन मेड इन चाइना के जरिए न सिर्फ भारत पर अंकुश लगाना चाहता है बल्कि वह जापान और जर्मनी जैसे देशों को भी टक्कर देना चाहता है। ये देश उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद बनाने के लिए जाने जाते हैं और ऑटोमोबाइल में दुनिया की अगुवाई करते हैं।
भारत नहीं दे सकता चीन को टक्कर?
चीन में कई लोगों का मानना है कि अगली पीढ़ी के सुधारों के लिए भारत उनका प्रतिस्पर्धी नहीं है। चीन यूरोप के देशों को टक्कर देने की योजना बना रहा है और चीन मैन्यूफैक्चरिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर सहित लगभग हर क्षेत्र में भारत से दशकों आगे है।
अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार चीन का प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद भारत के 7,600 डॉलर का पांच गुना है और उसका मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर भारत से 10 गुना बड़ा है।
इसके बावजूद चीन लाखों कामगारों को खो रहा है। जापान में 1990 के दशक के अंत में ऐसा ही हुआ था।चीन इसके आगे बड़ी एयरक्राफ्ट और जेट फाइटर मैन्यूफैक्चरर जैसे बोइंग और एयरबस ग्रुप को टक्कर देने की योजना भी बना रहा है।
इसके अलावा चीन एडवांस्ड मेडिकल डिवाइसेज, एनर्जी सेविंग व्हीकल, मरीन इंजीनियरिंग और गहरे समुद्र में उत्खनन के लिए महंगे जहाज और इलेक्ट्रिक पावर और कृषि के लिए उपकरण भी बनाने पर फोकस कर रहा है।