फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   china india stand off at ladakh ends

लद्दाख से चीन ने सेना हटाई, भारत भी पीछे हटा

Mon, 06 May 2013 08:27 AM IST
लेह/नई दिल्ली/एजेंसी
लेह/नई दिल्ली/एजेंसी Updated Mon, 06 May 2013 08:27 AM IST
विज्ञापन
china india stand off at ladakh ends

भारत और चीन तात्कालिक रूप से लद्दाख के दौलत बेग ओल्डी (डीओबी) से अपनी सेनाएं हटाने पर सहमत हो गए हैं।

विज्ञापन


अचानक हुए इस फैसले के बाद दोनों देशों के बीच बीते तीन हफ्ते से चल रहा तनाव फिलहाल खत्म हो गया है। आधिकारिक सूत्रों ने यह जानकारी दी।

दोनों के बीच किन आधारों और शर्तों पर यह फैसला हुआ, अभी इसकी विस्तृत जानकारी नहीं मिल सकती है।

लेकिन इतना मालूम चला है कि भारतीय सेना 15 किलोमीटर पीछे बर्सते तक हटेगी, जहां भारतीय-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) का ठिकाना है।

15 अप्रैल को भारतीय सेना की यही स्थिति थी। चीनी सेनाएं कितने पीछे जाएंगे, यह अभी पता नहीं चला है।

उल्लेखनीय है कि 15 अप्रैल को चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) को पार करते हुए भारतीय सीमा में 19 किलोमीटर अंदर तक घुस कर दौलत बेग ओल्डी सेक्टर में पांच टेंट लगा लिए थे।

इनमें उसके करीब 50 सैनिक, गाड़ियां और कुत्ते थे। इसके बाद भारतीय सैनिकों ने भी चीनी टेंट से करीब 300 मीटर दूर अपने टेंट लगाए थे। इससे दोनों देशों के बीच तनाव पैदा हो गया था।
विज्ञापन


मसले का हल निकालने के लिए दोनों देशों की सेनाओं ने चार फ्लैग मीटिंग की, जो बेनतीजा रहीं। इन बैठकों के साथ दोनों देशों ने उच्च स्तरीय राजनयिक प्रसास भी जारी रखे, जो अंतत: विवाद का हल निकालने में कामयाब रहे।
विज्ञापन
विज्ञापन


सूत्रों ने बताया कि रविवार शाम साढ़े सात बजे दोनों पक्ष एक ‘समझौते’ पर पहुंचे, जिसके मुताबिक दोनों ओर की सेनाएं विवाद की जगह से पीछे हट जाएंगी।

सूत्रों के मुताबिक उच्च स्तर पर हुए इस फैसले की सूचना मिलने के बाद दोनों सेनाओं के कमांडरों ने एक-दूसरे से हाथ मिलाए और पीछे हट गए।

वैसे अभी यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि चीनी सेना पीछे हट कर 15 अप्रैल वाली ही स्थिति में पहुंच एलएसी पर तैनात होगी या नहीं। भारत यही मांग कर रहा था।

दोनों सेनाओं के आमने-सामने आ जाने के बाद 9 मई को विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद की चीन यात्रा पर संकट के बादल गहराने लगे थे। जबकि 20 मई को चीनी प्रधानमंत्री को भी भारत आना है।

चीन की हिमाकत यह थी कि उसने यह मानने से ही इंकार कर दिया था कि भारतीय सीमा में घुसपैठ की है। वह भारतीय सेना को ही पीछे जाने को कह रहा था।

शनिवार को भी चीनी टेंट के बाहर उसके सैनिक यह बैनर लहराते नजर आए थे कि भारतीय हमारी सीमा में घुस आए हैं, पीछे जाएं।

दोनों देशों के ब्रिगेडियर स्तर की चौथी बैठक भी शनिवार को नाकाम रही। लेकिन दोनों पक्ष आगे बातचीत जारी रखने को तैयार थे।

चीनी लगातार मांग कर रहे थे कि एलएसी के फुक्तसे और चूमर क्षेत्र में भारतीय सेना द्वारा बनाए गए बंकर नष्ट किए जाएं। जबकि भारत का कहना था कि चीन ने अपनी सीमा में ऐसे ही बंकर तैयार कर रखे हैं।

चीन का तर्क था कि उसने स्थानीय विकास कार्य किया है, यह उसकी सैन्य गतिविधि नहीं है। उसकी यह भी मांग थी कि भारतीय चरवाहे चूमर डिविजन में अपने जानवर न लाएं।

उल्लेखनीय है कि 15 अप्रैल को चीनी सैनिक 27 किलोमीटर अंदर तक घुस आए थे, लेकिन सुरक्षा बलों द्वारा तत्काल की गई कार्रवाई के कारण उन्हें पीछे हटना पड़ा था। बावजूद इसके चीनी सैनिक एलएसी के 19 किलोमीटर अंदर अपने टेंट बनाने में कामयाब रहे थे।

क्या था मामला
15 अप्रैल को लेह के दौलत बेग ओल्डी (डीबीओ) क्षेत्र में चीनी सेना भारतीय इलाके में घुस आई। यहां चीन ने पांच टेंट लगाए। इससे कुछ मीटर की दूरी पर भारतीय सैनिक तैनात थे।

पहले कहा गया कि चीन की यह घुसपैठ भारतीय इलाके में 10 किलोमीटर अंदर तक है, लेकिन बाद में सरकार ने बताया कि चीन 19 किलोमीटर तक अंदर आ गया है।

यहां चीन के 30 से 50 सैनिक थे। चीन ने इस क्षेत्र में भारतीय सैनिकों द्वारा बनाई पक्की चौकियों पर नाराजगी जताई थी। जबकि भारत का तर्क है कि यह उसका इलाका है, अत: वह यहां निर्माण कार्य कर सकता है।

बेनतीजा चार फ्लैग मीटिंग
चीन के साथ इस विवाद को सुलझाने के लिए सैनिक स्तर पर चार फ्लैग मीटिंग भी हुई, लेकिन उनमें किसी तरह का नतीजा नहीं निकल सका। ऐसे में सैन्य प्रमुख जनरल बिक्रम सिंह ने रक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी से मिल कर सैन्य विकल्पों के सुझाव दिए थे।


पीएम ने बताया था ‘लोकल’ मामला
चीन की घुसपैठ पर देश में विवाद तब बढ़ गया जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि यह ‘स्थानीय मामला’ है। भारत चीन के साथ सीमा विवाद को तूल नहीं देना चाहता।

इसी प्रकार विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने भी इसे छोटा-मोटा मामला बताया था। इन बयानों को भारत की राजनयिक विफलता माना जा रहा था और दोनों नेताओं के बयानों ने विपक्षी दलों तथा रक्षा विशेषज्ञों की नाराजगी बढ़ाई थी।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed