बहादुर बच्चों की चौंकाने वाली कहानियां
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दिल्ली के वसंत विहार में बिटिया से सामूहिक दुष्कर्म की वारदात के एक साल दो माह बाद जयपुर की एक बहादुर बेटी हैवानियत की शिकार होने से बच गई। इसने साहस का परिचय देते हुए बदमाशों का सामना किया और उनसे अपनी जान बचाई।
यह बिटिया है गीता चोपड़ा पुरस्कार से सम्मानित होने वाली जयपुर की मलाइका सिंह टाक। वह अपने साथ हुई उस घटना को सोचकर डरती नहीं, बल्कि उसे हिम्मत से बताती हैं। हालांकि दिल्ली में दुष्कर्म की बढ़ती वारदातों से आहत मलाइका यहां रहने से डरती हैं और मुंबई में रहकर पढ़ना चाहती हैं।
15 फरवरी 2013 को जयपुर में 11वीं की छात्रा मलाइका के साथ जो कुछ भी हुआ, उसके बाद वह अपने साथ पेपर स्प्रे व नाइफ टूल लेकर चलती हैं। उन्होंने कहा, ‘मैं डरती नहीं हूं, बस पहले से ज्यादा सतर्क हो गई हूं।’
मलाइका ने अपने साथ हुई घटना को कुछ इस तरह बयां किया। ‘मैं ट्यूशन के लिए जा रही थी। सड़क पर एक लड़का मुझे घूर रहा था। मैंने उसे अनदेखा किया, फिर अचानक मैंने उस लड़के को अपने साथी को इशारा करते देखा।
इसके बाद दोनों लड़कों ने मेरे हाथ पकड़ लिए। भीड़ भाड़ होने के बावजूद मेरी मदद के लिए कोई आगे ही नहीं आया। दोनों लड़के भीड़ में से ही उसे जबरदस्ती एक गाड़ी की ओर ले गए, जिसमें पहले से ही दो लड़के बैठे थे।
लड़कों ने उन्हें गाड़ी में धकेलने की कोशिश की। इस बीच मैं लड़कों को धक्का देकर गाड़ी से कूद गई। लड़के मुझे मारने लगे तभी मेरे कंधे से बैग गिरा और उसमें से पैन रूपी चाकू निकला। मैंने लड़कों को चाकू दिखाकर डराया और इसके बाद मैं वहां से भाग निकली।
लड़के मेरा पीछा कर रहे थे। ऐसे में एक वृद्ध व्यक्ति ने मेरी मदद की और मुझे क्लास तक पहुंचाया और वहां से मैं दोस्तों के साथ घर पहुंची।’ मलाइका जयपुर में स्टेच्यू सर्किल पर बिटिया के लिए चलाए गए आंदोलन में हिस्सा ले चुकी हैं। आर्मी में जाने की इच्छुक मलाइका लड़कियों को डर पर जीत हासिल कर मुकाबला करने का संदेश देती हैं।
हिमाचल की शिल्पा ने तेंदुए से बचाई भाई की जान
जब टीवी पर किसी को कोई पुरस्कार पाते देखती थी तो लगता था कि काश मुझे भी ऐसा कोई पुरस्कार मिले और मैं टीवी पर नजर आऊं।
हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले के गांव बराऊन व तहसील घुमारविन निवासी शिल्पा शर्मा को क्या पता था कि उनकी इच्छा भाई को बचाने से पूरी हो जाएगी।
14 साल 3 माह की शिल्पा को भाई को तेंदुए से बचाने में साहस दिखाने के लिए बहादुरी पुरस्कार देने की घोषणा की गई है।
शिल्पा 27 अक्तूबर 2012 की घटना बताती हैं कि दोनों भाई-बहन जंगल के रास्ते से पास के गांव में स्थित स्कूल जा रहे थे। भाई महज 20 कदम दूरी पर था। अचानक तेंदुए ने उस पर हमला कर दिया।
भाई की चीख सुनी और तेंदुए के नीचे दबे हुए भाई के जूते दिखे। भाई को बचाने के लिए वह तेंदुए की तरफ दौड़ पड़ी और बस्ते से वार करने लगी। तेंदुए ने संतुलन खो दिया और भाई को पंजों से मुक्त करके झाड़ियों की तरफ भाग गया।
तेंदुए के वार से भाई की गर्दन, सिर व हाथ खून से लथपथ हो गए। किसी तरह वह भाई को 200 मीटर दूर स्थित घर लेकर पहुंची। अस्पताल में भाई का इलाज हुआ और एक माह बाद वह ठीक हो गया।
उन्होंने कहा कि इस घटना के बाद से सबके बीच पहचाने जाने लगी हूं। इस बात से खुश हूं कि इस पुरस्कार के कारण उन्हें बड़े-बड़े लोगों से मिलने का अवसर मिलेगा और टीवी पर नजर आएंगी।
शिल्पा के पिता राकेश कुमार एक दुकान चलाते हैं। भविष्य में वह क्या बनना चाहती हैं। इस पर वे जवाब नहीं दे सकीं।
बाढ़ में नहीं छोड़ा महिका ने भाई का हाथ
बीते साल जून में उत्तराखंड की त्रासदी में बड़ों-बड़ों के हौसले पस्त हो गए, लेकिन इसी त्रासदी में दिल्ली की एक छोटी सी बच्ची ने अदम्य साहस का परिचय दिया।
बच्ची ने अपने छोटे भाई को बचाकर देशभर के बच्चों के सामने एक मिसाल रखी। यमुना विहार की इस नन्ही परी के इसी साहस के चलते उसे देश के प्रतिष्ठित बहादुरी पुरस्कारों के तहत भारत अवार्ड दिए जाने की घोषणा हुई है।
लाल किला स्थित प्रेजेंनटेशन कॉन्वेंट स्कूल में तीसरी में पढ़ने वाली महिका गुप्ता बताती हैं कि वह परिवार समेत 16 लोगों के साथ जून 2013 में केदारनाथ गई थीं। 16 जून को भारी बारिश के कारण वहां बाढ़ आ गई।
जिस समय यह आपदा आई, उस समय वह और उनका परिवार मंदिर में पूजा कर रहे थे। महिका ने चुलबुले अंदाज में बताया कि उसी समय बाढ़ का पानी तेजी से मंदिर के अंदर भर गया।
इस दौरान सब एक दूसरे से अलग हो गए। कुछ देर बाद महिका ने अपने भाई की चीख सुनी। बकौल महिका, ‘मुझे तैरना नहीं आता लेकिन भाई को बचाना था। इसलिए नाक तक भरे मटमैले पानी को चीरते हुए भाई तक पहुंची।
उस समय कुछ ध्यान नहीं था। मैंने अपने एक हाथ से उसका पेट पकड़ा और दूसरे से उसकी नाक बंद की। पत्थरों के थपेड़ों से चोट खाते हुए भाई को करीब पांच घंटे तक पकड़े रखा।
हाथ हिलाने पर एक व्यक्ति ने सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया। कुछ देर बाद मेरी मां भी मिल गई।’ इस घटना से महिका के भाई को काफी चोटें आईं, जिसके कारण उसके पैर में रॉड डली हैं।
महिका की मम्मी रीना गुप्ता ने बताया कि तीन दिन भोजन-पानी से दूर रहने के बावजूद महिका ने हिम्मत नहीं हारी और न ही वह रोई। पुरस्कार मिलने के बाद से वह अपने स्कूल में हीरो हो गई है।
डॉक्टर सेट से खेलने वाली महिका को अपनी मम्मी का जज बनने का सपना पूरा करना है। कार्टून डोरीमॉन देखने वाली महिका को इस बात की खुशी है कि वह अब गणतंत्र दिवस परेड में हिस्सा लेंगी और प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से मिलेंगी।
पानी में रहने की आदत ने बचाई तीन जानें
बचपन से पानी में रहने की आदत के चलते सरिता विहार के सागर कश्यप ने तीन बच्चों की जान बचाई। इस साहस की बदौलत उन्हें बहादुरी पुरस्कार दिया जा रहा है।
सरिता विहार के रामकिशन सर्वोदय स्कूल में आठवीं कक्षा के सागर अपने पिता से तैराकी की गुर सीख रहे हैं। उनकी इच्छा भारत के लिए तैराकी में मेडल जीतने की है। सागर को भरोसा है कि वह एक दिन ऐसा जरूर करेंगे।
बात 15 जुलाई 2012 की है। सागर बताते हैं कि बारह फुट गहरी आगरा नहर की सीढ़ियों पर नहाते हुए चार बच्चों का पैर फिसल गया। पानी का बहाव काफी तेज होने से चारों नहर के बीच में पहुंच गए। उस समय सागर पिता को खाना पहुंचाने के लिए गए हुए थे।
बच्चों को चिल्लाते हुए देख कुछ सोचे समझे पानी में कूद गए। चारों को बचाने का प्रयास किया, लेकिन तीन को ही बचा पाए। सागर बताते हैं कि वह और उनके पिता कई बार लोगों को बचाने में पुलिस की मदद कर चुके हैं।
उन्हें इस बात का मलाल है कि चौथे बच्चे को बचा नहीं पाए। पुरस्कार मिलने के बाद उनको न जानने वाले भी उन्हें दोस्त बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
बहादुरी पुरस्कार पाने वालों में सबसे छोटी तन्वी
पुणे (महाराष्ट्र) की 7 साल 6 माह की तन्वी नंदकुमार ओव्हाल बच्चों से लेकर बड़ों तक, सभी के लिए एक मिसाल हैं। पुरस्कार पाने वालों में तन्वी सबसे छोटी उम्र की हैं।
पायलट बनने की इच्छा रखने वाली तन्वी ने अपने साढ़े चार साल की बहन को 7 फीट गहरे टैंक से निकाल कर उसे बचाया था। हिंदी कम समझने वाली तन्वी सिर्फ इतना ही कहा, ‘मुझे बस अपनी बहन को बचाना था।’
कथक सीख रही शर्मीले स्वभाव की तन्वी अपने माता-पिता का दुलारी हैं। अपने साहस पूर्ण कार्य की वजह से वह अपने क्षेत्र में सबकी चहेती बन गई हैं।
आर्यन ने तैरना न जानते हुए भी बचाई चार जानें
बहादुरी पुरस्कारों के तहत फैजाबाद के आर्यन राज शुक्ला को मरणोपरांत बापू गेधानी अवार्ड देने की घोषणा की गई है। 13 साल 8 माह के आर्यन ने अपना जीवन गवां कर चार जिंदगियां बचाईं। आर्यन की मां उनकी इस बहादुरी को कुर्बानी मानती हैं।
फैजाबाद के 2/11 नया पुरवा, नियावन में रहने वाले पेशे से शिक्षक आर्यन के माता-पिता के लिए वह पल काफी भरा रहा जब उनके बेटे को पुरस्कार दिए जाने के लिए उन्हें बुलाया गया।
मां गीता शुक्ता कहती हैं कि काश यह होता कि उनका बेटा उनके साथ यह पुरस्कार लेता। लेकिन वह कहती हैं कि बहादुरी से उसने चार जीवन बचाए, लिहाजा उसकी कुर्बानी की तौहीन नहीं करना चाहतीं।
मां गीता शुक्ला और पिता विजय कुमार शुक्ला बताते हैं कि आर्यन ही उनके साथ रहता था क्योंकि बड़ा बेटा मुंबई में नौकरी करता है। 13 मई 2013 की घटना के बारे में उन्होंने बताया कि आर्यन और उनके चार दोस्त फैजाबाद के गुप्तार घाट पर गए थे।
दोस्त सरयू नदी में तैर रहे थे और आर्यन सीढ़ी पर बैठे थे। अचानक उनके दोस्त डूबने लगे। आर्यन को तैरना नहीं आता था। इसके बावजूद वह 8 फुट गहरे पानी में कूद गए। वह अपने मित्रों को बचाने में तो कामयाब हो गए, लेकिन खुद डूब गए।
फैजाबाद के जिंगल बेल एकेडमी में नौंवीं में पढ़ने वाले आर्यन को आर्मी में जाना था। खास बात है कि वह उसी दिन तैराकी सीखने के लिए दाखिला लेने गए थे। सेंटर बंद होने के कारण घूमने चले गए और यह घटना घट गई।
मां बताती हैं कि घटना से एक दिन पहले उन्हें अपने बेटे पर काफी प्यार आ रहा था। बेटे को उन्होंने उस दिन न केवल उबटन लगाया, बल्कि नहलाया भी खुद। पिज्जा खाने की इच्छा रखने पर पिज्जा खिलाया।
गले से लगाकर अपने पास सुलाया। वह कहती हैं कि पता नहीं ऐसा क्यों लग रहा था कि मानो उसे अंतिम विदाई दे रही हों।