रणछोड़ या धोती वाला प्रधानमंत्रीः चिदंबरम के कई नाम हैं
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एरन इझुक्कथु अल्लवी नीकि मारन इझुक्का मन्नम उदयथु आरसु, तमिल संत कवि तिरुवल्लुवर की इस पंक्ति का अर्थ है, अच्छे शासक वे होते हैं, जो नैतिकता पर अमल करते हैं, कोई अपराध नहीं करते और ईमानदारी तथा साहस के रास्ते पर चलते हैं।
संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के 2004 में सत्ता में आने के बाद अपने पहले बजट भाषण का समापन पलनिअप्पन चिदंबरम ने इन्हीं पंक्तियों के साथ किया था।
तब शायद उन्होंने भी नहीं सोचा था कि एक दशक तक शासन करने वाली यूपीए सरकार इतिहास में ऐसी सरकार के रूप में जगह बनाती दिखे जिसने नैतिकता और ईमानदारी को दरकिनार कर दिया, जिसके कई मंत्री भ्रष्टाचार के मामलों में शक के दायरे में आ गए और जिसने समय रहते साहसिक फैसले लेने का साहस नहीं दिखाया। और अब जबकि मनमोहन सिंह ने अपने रिटायरमेंट की घोषणा कर दी है, राहुल गांधी ने चुनाव अभियान की कमान जरूर हाथ में ले ली है लेकिन अब तक वह कोई करिश्मा नहीं कर पाए हैं, पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी कुछ जाने-अनजाने कारणों से पहले से कम सक्रिय हैं और प्रणब मुखर्जी पहले ही राष्ट्रपति भवन जा चुके हैं, अगले आम चुनावों में कांग्रेस का काफी कुछ चिदंबरम पर भी दांव पर होगा।
होगा
2004 में सोनिया गांधी ने नाटकीय घटनाक्रम में प्रधानमंत्री का पद ठुकरा कर मनमोहन सिंह को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था। उसके बाद से सोनिया और मनमोहन के रूप में सत्ता के दो केंद्रों की काफी चर्चा होती रही है। हालांकि इन दो के अलावा यूपीए सरकार का दारोमदार जिन दो नेताओं के हाथों में रहा, उनमें प्रणब मुखर्जी के बाद पी चिदंबरम ही थे। ये दोनों सरकार के संकट मोचक बने रहे। मगर प्रणब दा के राष्ट्रपति बनने के बाद पी चिदंबरम सरकार का असली चेहरा बनकर उभरे हैं। वह यूपीए सरकार के सबसे अनुभवी मंत्रियों में से हैं, जिनके पास वित्त, गृह और वाणिज्य जैसे सबसे अहम मंत्रालयों में काम करने का लंबा अनुभव है।
धोती वाला प्रधानमंत्री
यह अकारण नहीं है कि जब मशहूर पत्रिका इकोनॉमिक्स ने दिसंबर, 2012 में अपनी एक रिपोर्ट में इशारा किया कि चिदंबरम मनमोहन की जगह ले सकते हैं, तो सियासी हलके में तूफान मच गया। द्रमुक सुप्रीमो एम करुणानिधि ने यह कहकर इसे हवा दे दी कि अगला प्रधानमंत्री दक्षिण का कोई धोतीवाला होगा!
यह बात किसी से छिपी नहीं है कि यह चिदंबरम ही थे, जिन्होंने खुदरा क्षेत्र में एफडीआई के मुद्दे पर ममता बनर्जी के हाथ खींचने के बाद लोकसभा में हुए मतविभाजन में द्रमुक प्रमुख का समर्थन जुटा कर सरकार को फजीहत से बचाया था। हालांकि खुद चिदंबरम ने ऐसे किसी दावे से इन्कार किया और राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का स्वाभाविक दावेदार बताया।
यह चिदंबरम का आभामंडल ही है, जिसकी वजह से टाइम पत्रिका ने उन्हें पिछले वर्ष सबसे प्रभावशाली सौ लोगों की सूची में शुमार किया और उनकी शख्सियत को असाधारण माना। मगर ऐसे समय में जब यूपीए का कुनबा बिखर रहा है, कांग्रेस के बारे में सबसे बुरी चुनावी भविष्यवाणियां की जा रही हैं, वाकई यह दूर की कौड़ी है कि खांटी सफेद कमीज और पारंपरिक तमिल वेस्टि (धोती) पहनने वाला यह तमिल एलिट राहुल गांधी का मनमोहन बनेगा!
पुराने कांग्रेसी
वणिक समुदाय चेत्तियार से ताल्लुक रखने वाले पी चिदंबरम का जन्म 16 सितंबर 1945 को तमिलनाडु के शिवगंगा जिले में हुआ था। वह लोकसभा में इसी शिवगंगा का प्रतिनिधित्व करते हैं, जहां से वह 1984 से सात बार चुनाव जीत चुके हैं। चिदंबरम ने 1960 के दशक के पूर्वार्ध में वकील के रूप में अपने करियर की शुरुआत की थी, लेकिन उसी दौर में वह कांग्रेस से भी जुड़ गए। वह युवक कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे।
1984 में वह पहली बार न केवल शिवगंगा से लोकसभा चुनाव में विजयी हुए, बल्कि राजीव गांधी ने उन्हें जल्द ही उप मंत्री के रूप में अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया। राजीव की मौत के बाद कांग्रेस में एक तरह का शून्य आ गया था। हालांकि 1991 के आम चुनाव के बाद कांग्रेस जैसे तैसे नरसिंह राव की अगुआई में सरकार बनाने में सफल रही। चिदंबरम को इसमें भी मंत्री बनाया गया। मगर हर्षद मेहता के शेयर घोटालों की वजह से बदनाम राव सरकार की हालत अपने अंतिम दिनों में बहुत खराब हो गई थी।
उस वक्त सोनिया गांधी नेपथ्य में थीं और कांग्रेस में घमासान मचा था। चिदंबरम इससे अछूते नहीं रहे। और 1996 में जी के मूपनार की अगुआई में जब तमिलनाडु कांग्रेस के एक धड़े ने अलग होकर तमिल मनिला कांग्रेस बनाई थी, तब वह उसमें चले गए थे। मगर यह सिलसिला लंबा नहीं चला। 2001 में तमिल मनिला कांग्रेस से अलग होकर उन्होंने कांग्रेस जननायक पेररवई नाम से अपनी एक पार्टी भी बना ली थी, मगर 2004 के चुनावों से ऐन पहले उन्होंने इसका विलय कांग्रेस में कर दिया। आज उनकी गिनती सोनिया गांधी के सबसे विश्वसनीय लोगों में होती है।
बाजी पलटने वाला अर्थशास्त्री
स्वतंत्र भारत में मोरारजी देसाई के बाद सर्वाधिक आठ बजट (इस बार के अंतरिम बजट को शामिल करें तो नौ बजट) पेश करने वाले चिदंबरम वह धुरी हैं, जिसके इर्द-गिर्द आज देश की अर्थनीति घूम रही है। 1990 के दशक में जब नरसिंह राव और मनमोहन सिंह ने देश की अर्थव्यवस्था को बाजार के हवाले किया था, चिदंबरम भी उस टीम का हिस्सा थे। मगर उन्हें ख्याति तब मिली, जब उन्हें पहली बार 1996-97 के दौरान एच डी देवगौड़ा की अगुआई वाली संयुक्त मोर्चा सरकार के वित्त मंत्री के रूप में बजट पेश करने का मौका मिला।
उन्होंने सरकारी खर्च में कटौती के साथ कर सुधार का ऐसा खाका खींचा था, जिसमें वित्तीय घाटे को कम करने के नुस्खे भी थे। यही नहीं, उन्होंने स्वैच्छिक रूप से आय घोषित करने की योजना लाई। इसे कालेधन को बाहर निकालने के औजार के रूप में देखा गया; हालांकि इसकी आलोचना करने वाले भी कम नहीं थे। उनके बजट को ड्रीम बजट बताया गया और इसे आर्थिक सुधारों के दूसरे चरण के तौर पर देखा गया। मगर कांग्रेस के समर्थन वापस लेने के कारण 1998 में संयुक्त मोर्चा सरकार गिर गई।
इसके बाद चिदंबरम की मंत्रिमंडल में वापसी 2004 के आम चुनावों के बाद ही हो सकी। यह वह दौर था, जब पूर्ववर्ती अटल बिहारी वाजपेयी की अगुआई वाली एनडीए सरकार की 'फील गुड' की खुमारी टूट चुकी थी। मनमोहन सिंह और प्रणब मुखर्जी के साथ उन्होंने देश के सामने समावेशी विकास ढांचा रखा, 2008 की महामंदी के समय जिसे अमीर देशों ने अचरज से देखा।
2004-05 का बजट पेश करते हुए उन्होंने आर्थिक सुधार के एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए इसे मानवीय चेहरा देने की कोशिश की। उनके पिटारे में सबके लिए कुछ न कुछ था और सबको आश्वस्त करते हुए उन्होंने उस वर्ष आई शाहरुख की चर्चित फिल्म के शीर्षक की तर्ज पर कहा... मैं हूं न...।
किसानों की कर्जमाफी का फैसला उनका ही था, जिसे 2009 में वोट में तब्दील होते देर नहीं लगी, नतीजतन यूपीए को दूसरी बार सरकार बनाने का मौका मिला। मगर वित्त मंत्रालय में चिदंबरम की वापसी प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति बनने के बाद ही हो सकी। लेकिन तब तक यूपीए सरकार भ्रष्टाचार, घोटालों और नीतिगत जड़ता की ऐसी चपेट में आ गई, जहां से उसके लिए उबरना मुश्किल हो गया है। वित्त मंत्री बनने के बाद उन्होंने कैश सब्सिडी जैसी लोक लुभावन पेशकश की। अगले लोकसभा चुनावों से पहले अंतरिम बजट के जरिये आम आदमी को कई तरह की रियायतें भी दी। मगर लाख टके का सवाल है कि क्या उनका यह दांव चल पाएगा?
कॉर्पोरेट जगत के हितैषी
यह महज इत्तफाक नहीं है कि 1960 के दशक में जो चिदंबरम वामपंथ से प्रभावित थे, उनकी छवि आज कॉर्पोरेट जगत की हितैषी की है।
उनके बचपन के दोस्त द हिंदू अखबार के पूर्व प्रधान संपादक एन राम ने कुछ वर्ष एक बिजनेस पत्रिका को दिए साक्षात्कार में बताया था कि उन्होंने उसी दौर में चिदंबरम की मुलाकात माकपा महासचिव प्रकाश करात से कराई थी।
आज करात और चिदंबरम दोनों अर्थनीति के दो छोरों पर खड़े हैं। दरअसल चिदंबरम वेदांता जैसे बड़े कॉर्पोरेट घरानों के पक्ष में बतौर वकील पैरवी भी कर चुके हैं। उनकी पत्नी नलिनी भी सुप्रीम कोर्ट में वकील हैं।
बौद्धिक अहंकार का शिकार
तमिल उनकी मातृभाषा है, लेकिन उनकी अंग्रेजी का आतंक सियासी जगत में चर्चा का विषय है। हाल ही में वह उस वक्त चर्चा में आए थे, जब शहरी विकास मंत्रालय के सचिव ने उन पर एक बैठक के दौरान उन्हें कमजोर अंग्रेजी की वजह से अपमानित करने का आरोप लगाया था। उन्होंने हार्वर्ड में पढ़ाई की है, जिसे लेकर भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने उन पर फिकरा कसा कि देश बनाने के लिए हार्वर्ड की नहीं, हार्ड वर्क की जरूरत होती है।
चिदंबरम ने यह कहकर पलटवार किया कि मोदी का ज्ञान आठवीं कक्षा के स्तर का है। चिदंबरम के इस बौद्धिक आतंक से विपक्षी दल के नेता ही नहीं, उनकी अपनी पार्टी के लोग भी आक्रांत हैं। गृह मंत्री रहते जब उन्होंने माओवादियों के खिलाफ कड़ा रुख अख्तियार किया था, तब उनकी ही पार्टी के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने उन्हें सलाह दी कि वह इस मसले पर संकीर्ण ढंग से सोचने के बजाए व्यापक रूप से विचार करें। दिग्विजय सिंह ने बाकायदा एक अंग्रेजी अखबार में लेख लिखकर चिदंबरम की खिंचाई की थी।
उन्होंने लिखा, चिदंबरम अत्यंत विद्वान हैं, मुखर हैं और अपनी बात पर अड़ जाते हैं.... मैं खुद भी कई बार चिदंबरम के बौद्धिक अहंकार का शिकार हो चुका हूं!
संत कवि तिरुवल्लुवर प्रेरणास्रोत
दो हजार वर्ष पूर्व के महान तमिल संत कवि तिरुवल्लुवर पी चिदंबरम के प्रेरणास्रोत हैं। तिरुवल्लुवर ने सुशासन और नैतिकता को लेकर कविताएं लिखीं थीं जिसे थिरुकुर्रल नाम से संग्रहित किया गया है। सूक्तियों की तरह लिखी गई इन पंक्तियों का उल्लेख तमिल साहित्य में भी मिलता है। चिदंबरम अपने बजट भाषण का समापन तिरुवल्लुवर की पंक्तियों से करते आए हैं।
इस वर्ष यूपीए दो सरकार का अंतिम बजट पेश करते हुए उन्हें एक बार फिर संत तिरुवल्लुवर याद आए। उन्होंने अपना भाषण उनकी इन पंक्तियों के साथ खत्म किया, वेल अनरु वेनरी थरुवथु मन्नअवन, कोल अथुवूम कोदत्थु एनिन । यानी बरछे या भाले से नहीं, बल्कि सिर्फ राजदंड (मजबूत शासन) और समता से ही किसी शासक को विजय मिल सकती है। लेकिन यह चिदंबरम भी जानते हैं कि इस बार यूपीए के लिए जीत कितनी कठिन होती जा रही है।
जनाधार विहीन नेता
चिदंबरम बेशक अब तक सात बार लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं, लेकिन उन्हें जनाधार वाला नेता नहीं माना जाता। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि वह अपने लोकसभा क्षेत्र शिवगंगा के आम मतदाता से तारतम्य नहीं बना पाते। 1984 में उन्होंने पहली बार लोकसभा का चुनाव जीता था।
उसके बाद वह 1989, 1991, 1996 और 1998 में भी वह विजयी रहे, लेकिन 1999 में वह चुनाव हार गए थे। इसके बाद 2004 और 2009 में भी वह विजयी हुए। मगर पिछली बार वह बहुत मुश्किल से ही चुनाव जीत पाए थे। 16 मई, 2009 की रात उनके लिए काफी उतार-चढ़ाव वाली थी।
मतगणना के 14 दौर तक उनके प्रतिद्वंद्वी अन्नाद्रमुक के आर एस राजा कन्नप्पन उनसे आगे चल रहे थे। 22 दौर तक चली मतगणना में वह मुश्किल से 3354 मतों से ही जीत पाए। अटकलें लगाई जा रही हैं कि इस बार वह शिवगंगा को छोड़कर पुदुचेरी से चुनाव लड़ सकते हैं।