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दान मिले सवा करोड़ रुपये निजी बैंक में रखने की थी तैयारी

Sat, 12 Sep 2015 04:40 AM IST
Updated Sat, 12 Sep 2015 04:40 AM IST
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cheating in the donation given to temple

बाबा विश्वनाथ के दान और चढ़ावे में गोलमाल करने वाले कर्मचारियों के एक से बढ़कर एक कारनामे सामने आ रहे हैं। बाबा के नाम पर दान के लिए 17 बैंक खाते खोलने का हाल में ही खुलासा हुआ था।

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इस बीच एक निजी बैंक में नया खाता खोलकर 1.25 करोड़ रुपये हस्तांतरित करने के प्रयास का नया मामला सामने आया है। इसके लिए मंदिर प्रशासन ने बाकायदा पत्रावली चलाई है।
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चार महीने पहले नया खाता खोलकर इतनी बड़ी रकम निजी बैंक को देने का निर्णय लिया गया था, लेकिन ट्रेजरी अफसर की आपत्ति के चलते डीएम ने अनुमोदन से कदम पीछे खींच लिया। पता चला है कि अखिलेश सरकार के एक मंत्री को खुश करने के लिए मंदिर प्रशासन ने यह कदम उठाया था।

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जून 2015 की है घटना

cheating in the donation given to temple

बाबा के दरबार में लगी हुंडियों और दान के अन्य माध्यमों से श्रद्धालुओं से मिलने वाले चढ़ावे की रकम में से 1.25 करोड़ रुपये शहर के ही एक निजी बैंक को देने की तैयारी मंदिर प्रशासन के कर्मचारियों ने जून, 2015 में की थी। इसके लिए फाइल चलाई गई।

कर्मचारियों की रिपोर्ट पर निजी बैंक की शाखा में नया खाता भी खोल दिया गया लेकिन बड़ी रकम होने की वजह से इस खाते का डीएम से अनुमोदन कराना जरूरी था।

मुख्य कार्यपालक अधिकारी ने निजी बैंक को सवा करोड़ रुपये का खाता देने संबंधी पत्रावली जब आगे बढ़ाई, तब ट्रेजरी अफसर रहे राममूर्ति द्विवेदी ने उस पर आपत्ति लगा दी।

उच्चाधिकारी ने की पुष्टि

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ट्रेजरी अफसर ने मंदिर प्रशासन की ओर से भेजी गई पत्रावली पर अपनी आपत्ति में लिखा कि विश्वनाथ मंदिर सरकार के अधीन है। ऐसी दशा में सरकारी धन के रूप में इतनी बड़ी रकम राष्ट्रीयकृत बैंक में ही रखी जानी चाहिए।

इसे प्राइवेट बैंक में देना उचित नहीं होगा। इसके बाद तत्कालीन जिलाधिकारी प्रांजल यादव ने इस खाते से संबंधित पत्रावली के अनुमोदन से मना कर दिया।

दान और चढ़ावे में हेराफेरी और मंदिर में की गई अन्य वित्तीय अनियमितताओं की जब जांच शुरू हुई तब एक लिपिक ने इस नए खाते को लेकर चलाई गई पत्रावली के बारे में अफसरों को जानकारी दी। एक उच्चाधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर इसकी पुष्टि की।

बताया कि एक मंत्री के रिश्तेदार संबंधित निजी बैंक में तैनात हैं। इसलिए उनका व्यवसाय बढ़ाने और मंत्री को खुश करने के लिए यह कदम मंदिर प्रशासन की ओर से उठाया जा रहा था।

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