भाजपा ने दुहराया बुरा इतिहास, करारी हार के बाद हैं ये चुनौतियां
इतिहास से सबक न सीखने की भाजपा को दिल्ली विधानसभा चुनाव में बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। वर्ष 1998 में अचानक सुषमा स्वराज को बतौर पैराशूट उम्मीदवार दिल्ली के घमासान में उतार कर भाजपा को महज 15 सीटें हासिल हुई थी। इस बार सुषमा की तरह किरण बेदी को मैदान में उतारने का नतीजा भाजपा को अब तक की सबसे करारी हार के रूप में झेलनी पड़ी। दरअसल पूरे चुनाव के दौरान भाजपा पर व्यक्तिगत आक्रामक हमले, नकारात्मक प्रचार, स्थानीय नेताओं-कार्यकर्ताओं पर बाहरी नेताओं को तरजीह देनी भारी पड़ गई।
पार्टी के सारे मुद्दों पर आप के संयोजक अरविंद केजरीवाल की सादगी, संगठित और योजनाबद्ध प्रचार भारी पड़ गया। अब ताबड़तोड़ और लगातार मिल रही जीत की राह में इस चुनाव के नतीजे से पैदा हुए रोड़े ने पार्टी की भावी रणनीति के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया है। अगले एक साल में कई राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा अब सरकार ही नहीं संगठन को भी कसने की कवायद शुरू करेगी। इस क्रम में जहां केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल कई दिग्गजों को फिर से संगठन की शरण में आना होगा, वहीं संगठन में खाली पदों को भरने के मामले में भी पार्टी जनाधार वाले नेताओं को ही तवज्जो देगी।
उल्लेखनीय है कि पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने करीब दो महीने पूर्व ही संगठन को मजबूती देने के लिए सरकार में शामिल किए गए चेहरों को मुक्त करने की इच्छा व्यक्त की थी। हालांकि, तब चुनाव तैयारियों के कारण उनकी इच्छा को अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका।
करारी हार ने खड़ी की भाजपा के समक्ष कई नई चुनौतियां
दिल्ली विधानसभा में मिली करारी हार से भाजपा की सफल राजनीतिक जोड़ी के रूप में चर्चित पीएम मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को अब पहली बार अग्निपरीक्षा के दौर से गुजरना पड़ेगा। अब तक दुर्जेय माने जा रहे मोदी के खिलाफ विरोधी दलों में यह भरोसा तो बढ़ेगा ही कि इस पराक्रमी सियासी जोड़ी को भी मात दी जा सकती है। जाहिर तौर पर नौ महीने बाद मोदी को विपक्ष से चुनौती मिलने की आशंका बढ़ गई है। उन पर जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने का भी दबाव बढ़ गया है।
मोदी के सियासी जोड़ीदार शाह को भी संगठन के अंदर की चुनौतियों से निपटना पड़ेगा। उनके कामकाज को लेकर पार्टी के अंदर नाराज नेताओं की लंबी फेहरिस्त है। शाह को दोबारा से अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं का विश्वास जीतना होगा। वहीं, बिहार चुनाव से पहले आए इस परिणाम से भाजपा की सियासी जमीन रपटीली हो गई है। दिल्ली की हार इतनी बड़ी है कि समर्थकों के हौसले पस्त हैं। भाजपा को इस हार से जल्द से जल्द उबरना पडे़गा। वरना बड़े राज्यों के लिए शुरू उसकी विधानसभा चुनाव की तैयारियों पर भी असर पड़ सकता है। बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और उत्तर प्रदेश सरीखे बडे़ राज्यों के विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटे भाजपा रणनीतिकारों पर दबाव बढ़ गया है। अब तक पार्टी की रणनीति मोदी के करिश्मे के सहारे चुनाव जीतने की थी। लेकिन, मोदी के नेतृत्व में 14 महीने से शुरू हुआ भाजपा की जीत का सिलसिला अब रुक गया है। इसे दोबारा से बहाल करने के लिए भाजपा को अपनी पूरी ताकत झोंकनी पड़ेगी।
दूसरी ओर, उधार के औजार से चुनाव जीतने की रणनीति विफल रहने के बाद चुनावी राज्यों में इस बात का संतोष है कि शायद पार्टी आलाकमान दोबारा से यह गलती नहीं करेगा। बेदी को दिल्ली का चेहरा बनाए जाने के बाद से चुनावी राज्यों के नेताओं में इस बात का भय पैदा हो गया था कि मोदी और शाह की जोड़ी उनके प्रदेश में भी यही फार्मूला अपनाएगी। बताया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश के मिशन 2017 के लिए भाजपा आलाकमान की नजर 180 विधानसभा सीटों पर बाहर के चेहरों पर दांव खेलने पर थी। मगर दिल्ली के परिणामों के बाद से इस बात की उम्मीद बढ़ी है कि पार्टी बाहरी नेताओं के बजाय अपने कार्यकर्ताओं को तरजीह देगी।
केंद्र में हो सकती है प्रमुख राज्यों की नुमाइंदगी
चुनाव नतीजों से जाहिर तौर पर भाजपा में भूचाल की स्थिति है। इस एक हार ने न केवल मोदी-शाह की जोड़ी के कभी न हारने के मिथक को तोड़ दिया, बल्कि पार्टी की बड़े राज्यों में चुनावी रणनीति को भी उलझा कर रख दिया। पार्टी के अतिविशिष्ट सूत्र के मुताबिक इस हार से सबक सीखते हुए भाजपा नेतृत्व सरकार और संगठन के स्तर पर जल्द ही बड़ा फैसला करेगा। इसमें सर्वाधिक अहम फैसला टीम मोदी में शामिल सरकार के कुछ चेहरों को वापस संगठन में लाने का होगा।
उक्त सूत्र के मुताबिक अगर शाह की इच्छा को अमलीजामा पहनाया गया तो कम से कम चार केंद्रीय मंत्रियों को फिर से संगठन में भेजा जा सकता है। इसके अलावा संगठन में खाली पड़े पदों को भरने के मामले में भी अब नए सिरे से रणनीति तैयार करनी होगी। सरकार को कसने की कवायद की तहत मंत्रिमंडल में अब सभी प्रमुख राज्यों की नुमाइंदगी तय की जाएगी।
अति आत्मविश्वास का शिकार हुई पार्टी
इस चुनाव में भाजपा अति आत्मविश्वास का शिकार हो गई। चूंकि ऐसा शीर्ष स्तर पर हुआ और खुद पीएम ने केजरीवाल पर व्यक्तिगत हमला बोलने के साथ मुकाबले से कांग्रेस के बाहर होने का संकेत दिया, इसलिए पहले से पस्त पड़ी कांग्रेस मैदान से ही बाहर हो गई। इसके अलावा बाहरी नेता स्थानीय नेताओं, कार्यकर्ताओं और जनता की नब्ज ही नहीं टटोल पाए। अति आत्मविश्वास के कारण ही बेदी को अचानक सीएम पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने से पार्टी नेताओं में फैली नाराजगी को भरोसे से दूर करने के बदले सख्ती दिखाने की गलती की गई।
पार्टी ही नहीं पीएम की पसंद बेदी को भी ठुकराया
कहां तो भाजपा की योजना किरण बेदी के सहारे अपने कोर वोट बैंक के इतर नए वोट बैंक पर हाथ आजमाने की थी। मगर नतीजे से साफ साबित हुआ कि इस मामले में भाजपा दिल्ली के मतदाताओं के सामने बुरी तरह से गच्चा खाई। पार्टी के लिए सदमे की बात यह है कि मतदाताओं ने चुनाव में न केवल भाजपा को नकार दिया, बल्कि पीएम नरेंद्र मोदी की पसंद किरण बेदी की चुनावी नैया भी डुबो दी।
उल्लेखनीय है कि बेदी को अचानक सीएम पद का उम्मीदवार घोषित करने के बाद पार्टी नेतृत्व ने पार्टी के स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं की नाराजगी की परवाह करना तो दूर, उल्टे अपने इस निर्देश का पालन कराने के लिए बेहद सख्ती से काम लिया। इस क्रम में जहां स्थानीय वरिष्ठ नेताओं, सांसदों ही नहीं मंत्रियों तक की बेदी के समक्ष हाजिरी लगवाई, बल्कि फटकार भी लगाई। इतना ही नहीं पार्टी नेतृत्व ने बेदी को सबसे सुरक्षित कृष्णानगर से चुनाव मैदान में उतार कर उन्हें जिताने की जिम्मेदारी बीते विधानसभा चुनाव में सीएम पद के उम्मीदवार रहे डॉ. हर्षवर्धन को दी।
दिल्ली के चुनाव नतीजे ने भाजपा को कई मोर्चे पर तगड़ा झटका दिया है। मतदाताओं ने पार्टी का सूपड़ा साफ करने से भी बड़ा झटका पीएम मोदी की पसंद बेदी को चुनाव हरा कर दिया। बेदी को उम्मीदवार बनाने के बाद पीएम लगातार उनकी तारीफों के पुल बांधते दिखे। हालांकि पार्टी को अपने फैसले के गलत साबित होने का अंदाजा बेदी की सभाओं में भीड़ नहीं जुटने से हो गया था। इस कारण भाजपा के चुनाव प्रचार के अंत में फिर से बेदी-बेदी की जगह मोदी-मोदी के नारे लगाने पड़े थे। उल्लेखनीय है कि वर्ष 1998 में अचानक वर्तमान विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को मैदान में उतारने के बाद भी पार्टी को ऐसी ही स्थितियों से दो चार होना पड़ा था। हालांकि तब सुषमा अपनी सीट बचाने में कामयाब रही थीं।
दिल्ली की हार से परेशान मोदी ने की नेताओं संग की लंबी मंत्रणा
दिल्ली की करारी हार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को परेशानी में डाल दिया है। तो ऊपर से बिहार की सियासत ने भी उन पर दबाव बढ़ा दिया है। दिल्ली के परिणाम और बिहार के ताजा राजनीतिक हालातों को लेकर प्रधानमंत्री ने देर रात पार्टी नेताओं के साथ बैठक की।
इस विपरीत स्थिति से निपटने के लिए मोदी ने गृह मंत्री राजनाथ सिंह, वित्त मंत्री अरुण जेटली और शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू के साथ अपने आवास पर लंबी मंत्रणा की। बताया जा रहा है कि नीतीश कुमार ने 130 विधायकों के साथ बुधवार को राष्ट्रपति से मिलने का समय मांगा है।
संकेत है कि महामहिम ने उन्हें मिलने का समय दे दिया है। इस बीच राज्यपाल केसरी नाथ त्रिपाटी भी दिल्ली में रह सकते हैं। राष्ट्रपति ने देशभर के राज्यपालों की दो दिवसीय बैठक बुलाई है। जिस कारण से माना जा रहा है कि बिहार की सियासी लड़ाई का केंद्र भी अगले दो दिनों तक दिल्ली रहेगा।