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'भ्रष्ट' जज की नियुक्ति के लिए PMO ने डाला था दबाव

Wed, 23 Jul 2014 08:52 AM IST
Updated Wed, 23 Jul 2014 08:52 AM IST
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central govt accepted, appointment of judge was under pressure

मद्रास हाईकोर्ट के कथित भ्रष्ट जज को राजनीतिक संरक्षण और पदोन्नति दिए जाने के मामले में सियासी तूफान थमने का नाम नहीं ले रहा है। मंगलवार को सरकार ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस मार्कंडेय काटजू के खुलासे की पुष्टि कर विवाद को और हवा दे दी।

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लोकसभा में कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने माना कि उक्त जज की नियुक्ति और पदोन्नति के मामले में न केवल पूर्ववर्ती यूपीए सरकार दबाव में थी, बल्कि वर्ष 2005 में पीएमओ ने सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम से उस जज के नाम पर विचार करने के लिए कहा था।
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हालांकि कानून मंत्री ने जज का नाम लेने से मना करते हुए कहा कि सेवानिवृत्त होने के बाद वह जज अब इस दुनिया में नहीं हैं। कानून मंत्री ने इस तरह के विवाद से बचने के लिए जजों की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव लाने के लिए राष्ट्रीय न्यायिक आयोग बनाने पर नई सरकार की प्रतिबद्धता जाहिर की।
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इस मामले में मंगलवार को भी संसद के दोनों सदनों में जमकर हुए हंगामे के कारण कार्यवाही स्थगित हुई। अन्नाद्रमुक ने इस मामले की जांच की मांग करते हुए कांग्रेस और तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से सफाई की मांग की। जबकि कांग्रेस ने दोनों ही सदनों में जज से जुड़ा मामला होने के कारण इस मुद्दे को उठाने देने पर नाराजगी जाहिर की।

संसद के दोनों सदनों में हंगामा

central govt accepted, appointment of judge was under pressure

सोमवार को काटजू ने दावा किया था कि पूर्ववर्ती यूपीए सरकार ने सहयोगी दल के दबाव में न केवल जिला जज को मद्रास हाईकोर्ट में जज बनवाया था, बल्कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के तीन पूर्व मुख्य न्यायाधीश भी राजनीतिक दबाव के आगे झुक गए थे।

संसद में रविशंकर प्रसाद ने कहा कि वर्ष 2005 में पीएमओ ने सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम से संबंधित जज के नाम पर विचार करने के लिए कहा था। कॉलेजियम द्वारा यह अनुरोध ठुकराए जाने के बाद कानून मंत्रालय ने इस मामले में एक और नोट भेजा था।

जज के संबंध में सदन में चर्चा पर कांग्रेस की आपत्तियों का जवाब देते हुए प्रसाद ने कहा कि सरकार न तो कोई आरोप लगा रही है और न ही सदन में किसी जज पर चर्चा हो रही है। सरकार इस मामले में महज स्थिति स्पष्ट कर रही है।

इस दौरान अन्नाद्रमुक की जज का नाम सार्वजनिक किए जाने की मांग को कानून मंत्री ने ठुकरा दिया। अन्नाद्रमुक के सदस्यों ने कहा कि तत्कालीन कानून मंत्री हंसराज भारद्वाज ने भी दबाव की बात स्वीकार की है। इसलिए सरकार को इस मामले में बयान देना चाहिए। हंगामे के कारण दोनों सदनों की कार्यवाही एक एक बार स्थगित भी हुई।

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