जाट आरक्षण को लेकर मोदी सरकार ने उठाया अहम कदम
जाट आरक्षण निरस्त करने के फैसले पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से पुनर्विचार करने का अनुरोध किया है।
सरकार ने अपनी याचिका में कहा है कि अन्य पिछड़े वर्ग की केंद्रीय सूची में जाटों को शामिल करने का अधिकार संविधान के अनुरूप है।
एनडीए ने जाटों को आरक्षण देने के यूपीए सरकार के फैसले का पुरजोर समर्थन किया था। केंद्र ने पुनर्विचार याचिका में शीर्ष अदालत से कहा है कि राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की सिफारिशें मानना केंद्र सरकार के लिए बाध्यकारी है, अदालत का ऐसा मानना एक त्रुटि है।
पुनर्विचार याचिका तैयार करने वाले अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल मनिंदर सिंह के मुताबिक याचिका में कहा गया है कि राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग कानून के प्रावधानों से इतर केंद्र सरकार को अन्य पिछड़े वर्गों की केंद्रीय सूची में नाम शामिल करने या बाहर करने का अधिकार है।
सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त किया था आरक्षण
केंद्र को संविधान के अनुच्छेद 16(4) के तहत यह अधिकार मिला हुआ है, यह पिछड़ा वर्ग आयोग की सिफारिशों पर निर्भर नहीं है।
मालूम हो कि जाट आरक्षण को फिर से लागू करने को लेकर पिछले दिनों जाट समुदाय का प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिला था। उस समय प्रधानमंत्री ने जाट समुदाय के नेताओं को आश्वस्त किया था कि सरकार इसके कानूनी पहलुओं पर विचार कर जल्द ही इस संबंध में उचित कदम उठाएगी।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की रंजन गोगोई और आरएफ नरीमन की पीठ ने जाट आरक्षण को विभिन्न संवैधानिक स्कीम और राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट के आधार पर निरस्त करते हुए कहा था कि जाट समुदाय आरक्षण का पात्र नहीं है।
अदालत ने 17 मार्च को सरकार की 2014 की उस अधिसूचना को निरस्त कर दिया था, जिसमें जाटों को नौ राज्यों में अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल किया गया था। केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से विभिन्न समितियों की रिपोर्ट का हवाला देते हुए जाट आरक्षण पर फिर से विचार करने की मांग की है।