स्कूलों में संस्कृत को बढ़ावा देने पर विवाद
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सीबीएसई ने स्कूलों से कहा है कि वो संस्कृत को बढ़ावा देने के लिए स्कूलों में संस्कृत सप्ताह मनाएं, हालांकि कुछ दलों के नेताओं और शिक्षाविदों को ये सुझाव गले नहीं उतर रहा, वे इसे कट्टरपंथ से जोड़कर देखते हैं।
वहीं कुछ छात्र-छात्रा मानते हैं कि इससे उन्हें फ़ायदा हो सकता है जो संस्कृत पढ़ते हैं।
स्कूल में संस्कृत श्लोक अंताक्षरी, लघुभाष्यम (छोटा भाषण) और 'आदि शंकराचार्य', 'मुद्राराक्षस' जैसी संस्कृत की लघु फ़िल्में दिखाना - ये सब सुझाव शामिल हैं सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंड्री एजुकेशन (सीबीएसई) के स्कूलों को भेजे सर्क्युलर में।
सर्कुलर से बढ़ा विवाद
सीबीएसई ने एक सर्क्युलर जारी कर स्कूलों को सात अगस्त से 13 अगस्त तक संस्कृत सप्ताह के तौर पर मनाने का सुझाव दिया है। इसमें छात्रों से आग्रह किया गया है कि वो अपनी तकनीक से जुड़ी जानकारी का इस्तेमाल कर संस्कृत में कम्प्यूटर ऐप्स और गेम्स भी बनाएं।
लेकिन संस्कृत की ओर अचानक सीबीएसई का ध्यान केंद्रित होने से तमिल पार्टियां नाराज हैं। एमडीएमके नेता वायको ने कहा है, “एक भाषा को तवज्जो देने से भारत की अखंडता पर बुरा प्रभाव पड़ेगा।”
डीएमके, एमडीएमके और पीएमके नेताओं ने तमिल समेत अन्य भाषाओं के लिए भी ऐसे आयोजनों की मांग करते हुए इस कदम को, ‘नई सरकार द्वारा कट्टरपंथी हिंदू विचारधारा को बढ़ावा’ देने वाला बताया है।
'संस्कृत ही क्यों?'
शिक्षाविद भी इस प्रस्ताव से हैरान हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ा रहे अपूर्वानंद के मुताबिक भारत में 1600 से ज़्यादा भाषाएं हैं और किसी एक भाषा के चयन की वजह साफ होनी चाहिए।
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, “किसी अन्य भाषा की कीमत पर या किसी एक भाषा पर विशेष ध्यान देने से पहले सीबीएसई को बताना चाहिए कि इसकी शैक्षिक वजह क्या है।”
दिल्ली के सेंट मेरीज़ स्कूल की प्रधानाचार्य डॉक्टर ऐनी कोशी के मुताबिक ये सही रास्ता नहीं हैं। वो कहती हैं, “बच्चों की रुचि विदेशी तौर-तरीकों में है और सीबीएसई भी उसके मुताबिक बदलाव लाता रहा है, फिर अचानक एक संस्कृत सप्ताह मनाना तो सिर्फ़ प्रतीकात्मक ही होगा।”
'भाषा में रुचि'
सीबीएसई से मान्यता प्राप्त स्कूलों में संस्कृत एक वैकल्पिक विषय के तौर पर पढ़ाई जाती है।
दिल्ली के कार्मल कॉन्वेंट स्कूल में संस्कृत की पढ़ाई कर रहीं एमान कहती हैं, “हमें शायद संस्कृत भाषा से जुड़ीं और बातें पता चले और ये सब देख और छात्र-छात्रा ये विषय चुनने लगें।”
लेकिन संस्कृत के अलावा कई स्कूलों में अब फ्रेंच, जर्मन, रूसी, बांग्ला और तमिल जैसी विदेशी और स्थानीय भाषाएं भी पढ़ाई जाती हैं।
दिल्ली के ही डीपीएस वसंत विहार में फ्रेंच की छात्रा निष्का के मुताबिक, “संस्कृत सप्ताह से उस भाषा की पढ़ाई कर रहे बच्चों को ज़रूर फ़ायदा होगा लेकिन मुझे पता नहीं क्या समझ आए।”
भाषा और नई सरकार
लेकिन लक्ष्मण पब्लिक स्कूल की प्रधानाचार्य उषा राम आशावान हैं। वो कहती हैं, “सही तरीके से सीबीएसई के सुझाव अपनाने पर ये एक लुप्त होती जा रही भाषा की ओर बच्चों में नई रुचि पैदा कर सकता है।”
संस्कृत सप्ताह के सुझाव से पहले भी भाषा के इस्तेमाल से जुड़े नई सरकार के आदेश बहस का विषय बनते रहे हैं।
कुछ हफ़्ते पहले सरकारी काम में हिन्दी को सोशल मीडिया पर अनिवार्य करने की बात कही गई थी। बाद में इस फ़ैसले को केवल हिन्दी भाषी राज्यों पर लागू करने की सफ़ाई दी गई।