सीबीआई के फंदे से यादव सिंह को नहीं बचा सकी अखिलेश सरकार
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करोड़ों की चल और अचल संपत्ति के घपले में फंसे यादव सिंह का केस सीबीआई तक नहीं पहुंचने देने की उत्तर प्रदेश सरकार की तमाम कोशिशें नाकाम रहीं।
अखिलेश यादव सरकार के तमाम विरोधों के बावजूद सीबीआई ने नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेस हाईवे के पूर्व चीफ इंजीनियर यादव सिंह के खिलाफ दो एफआईआर दर्ज कर ली है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर सीबीआई ने मंगलवार को यादव सिंह और उसके परिवार के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर इनके नोएडा, ग्रेटर नोएडा, आगरा और फिरोजाबाद के 14 ठिकानों पर सघन छापेमारी की। लखनऊ में उनके दामाद के घर भी छापा मारा गया है।
सीबीआई टीम ने नोएडा प्राधिकरण, ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण और यमुना विकास प्राधिकरण के दफ्तरों में भी छापे मारे। इस दौरान टीम ने नवंबर 2014 में यादव सिंह के ग्रेनो प्राधिकरण और यमुना प्राधिकरण के 13 दिन के कार्यकाल के दौरान टेंडरों और निजी कंपनियों को रिलीज किए गए रुपयों वाली फाइलों की जांच की और सुबूत इकट्ठा कर अपने साथ ले गई।
यादव सिंह के राजनीतिक संपर्क भी सीबीआई के जांच के दायरे में है। माना जा रहा है कि अपने संपर्कों की वजह से ही वह कई विरोधाभासों के बावजूद अहम पदों पर लंबे समय तक बना रहा।
हाईकोर्ट के आदेश पर सीबीआई ने दर्ज की दो एफआईआर
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में मायावती की सरकार के दौरान 2002 में नोएडा, ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी में नियुक्त हुए यादव सिंह, मुलायम सिंह और अखिलेश सरकार में भी अहम भूमिका में रहा। यादव सिंह ने इस दौरान करीब 8,000 करोड़ की योजना पर काम करते हुए कई बड़े वित्तीय फैसले लिए।
सीबीआई के मुताबिक, पहली एफआईआर में यादव, पत्नी कुसुम लता, बेटी गरिमा भूषण और बेटे सनी यादव के खिलाफ आपराधिक षड्यंत्र और भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत आरोप लगाए गए हैं।
इसमें राजीव मिनोचा नाम का एक व्यक्ति भी आरोपी है। यह मामला परिवार के आय से अधिक संपत्ति के जुड़ा है। दूसरी एफआईआर में बेनामी लोगों के साथ यादव सिंह को घोखाधड़ी और जालसाजी का आरोपी बनाया गया है।
करोड़ो के घपले का आरोप
सीबीआई सूत्रों के मुताबिक पिछले साल नवंबर में आयकर विभाग के छापे में यादव सिंह के ठिकानों से फर्जी आयकर रिटर्न और कुछ गड़बड़ दस्तावेज बरामद किए गए थे। सीबीआई उन कागजातों के आधार पर अपना केस तैयार करेगी।
सूत्रों ने बताया है कि 2009 से 2014 के बीच यादव और परिवार की बचत करीब 1.7 करोड़ रुपये थी जबकि उसकी अचल संपत्ति का मूल्य 3.60 करोड़ रुपये आंका गया।
इसके अलावा छापेमारी में यादव सिंह के साथी के पास से 10 करोड़ रुपये नकद बरामद हुए। यादव पर आरोप है कि उसने निजी व्यक्तियों के साथ सांठगांठ कर उन्हें बिना नियम के कई ठेके दे दिए।
ऐसे गया यह मामला सीबीआई के पास
ऊंची राजनीतिक पहुंच की वजह से यादव सिंह के खिलाफ सरकार की ओर से कोई कार्रवाई नहीं होता देख समाज सेविका नूतन ठाकुर हाईकोर्ट में याचिका दायर कर मामले को अदालत ले गईं।
मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने सीबीआई को यादव के खिलाफ जांच के आदेश दिए। उत्तर प्रदेश सरकार ने इसका सख्त विरोध किया।
यहां तक कि इसके विरोध में अखिलेश सरकार दिल्ली के बड़े वकीलों की मदद से सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रही थी। यूपी सरकार की दलील थी कि वह खुद इस मामले की जांच करवा रही है।
यादव सिंह, पत्नी और बेटा फरार
सीबीआई के छापे चलते रहे लेकिन यादव सिंह, पत्नी कुसुम और बेटे सनी यादव का कोई पता नहीं चला। यादव सिंह के सेक्टर 27 स्थित ए-38 के मकान में कोई नहीं था। सिर्फ किरायेदार मिला।
अधिकारियों को भरोसा था कि छापे के दौरान कुसुम और सनी जरूर मिल जाएंगे लेकिन दोनों चकमा देकर फरार होने में कामयाब रहे।
घिर सकते हैं माया और मुलायम
यादव सिंह के खिलाफ सीबीआई की एफआईआर मुलायम सिंह और मायावती पर भारी पड़ सकती है। यादव के ठिकानों पर पिछले साल पड़े आयकर विभाग के छापों में कुछ ऐसे कागजात और डायरियां मिली हैं।
जिससे उसके राज्य में ऊंची राजनीतिक सांठगांठ का पता चलता है। ये कागजात फिलहाल केंद्र सरकार के पास है। माया और मुलायम को इसका राजनीतिक नुकसान हो सकता है।
नोएडा, ग्रेनो और यमुना प्राधिकरणों पर छापे
सीबीआई ने गड़बड़ी की जांच के लिए नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना प्राधिकरण के दफ्तरों पर छापे मारे। ग्रेनो और यमुना प्राधिकरण में पांच घंटे तक चली सीबीआई की कार्रवाई में ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण से जुड़े परियोजना विभाग (इंजीनियरिंग), एचआर और वित्त विभाग के दस्तावेज खंगाले गए। जबकि नोएडा प्राधिकरण के कार्मिक व टेंडर सेल के दस्तावेजों की छानबीन हुई।