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केंचुआ पकड़ने गए थे, निकल आया सांप

Fri, 18 Dec 2015 03:51 PM IST
Updated Fri, 18 Dec 2015 03:51 PM IST
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CBI raid on kejriwal's office become tragic for bjp government

बंगाली में एक कहावत है: केछो खुरते गिये शांप बेरिये एलो (केंचुआ खोदते हुए सांप निकल आया)। अंग्रेजी में कुछ इसी तरह की उपमा है- जिसे कीड़ों के टिन को खोलना कहा जाता है। इसका अर्थ यह हुआ कि किसी एक फैसले और कार्रवाई की वजह से मुश्किल हालात का पैदा होना।

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यह मुहावरा मंगलवार के घटनाक्रम के संदर्भ में सटीक बैठता है जब सीबीआई ने दिल्ली सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी (प्रधान सचिव राजेंद्र कुमार) के कार्यालय पर छापा मारा और इस प्रक्रिया में एक चुने हुए मुख्यमंत्री (अरविंद केजरीवाल) को अपने ऑफिस में जाने से रोक दिया। यकीनन अधिकारियों ने यह नहीं सोचा होगा कि इस मामले की वजह से पूरा विपक्ष अपने मतभेदों को भुलाकार नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ उठ खड़ा होगा। विशेषकर प्रधानमंत्री के बाद सरकार के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति वित्त मंत्री अरुण जेटली के खिलाफ।
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यह वास्तव में दुर्लभ है कि सारी राजनीतिक जमात एक मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी और एनडीए का विरोध कर रही है। इस मुद्दे ने वामदलों और तृणमूल कॉंग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी जैसे विरोधियों और तो और बीजू जनता दल (जिसका अक्सर मोदी सरकार के प्रति झुकाव दिखता है) को एक कर दिया। यह भी महत्वपूर्ण है कि यह ऐसे समय में हुआ है जबकि कांग्रेस, वामदल और बसपा सबसे कमजोर स्थिति में हैं।

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आरोप कुछ साल पुराने

CBI raid on kejriwal's office become tragic for bjp government

राजेंद्र कुमार और जेटली के विरुद्ध यह आरोप नए नहीं है- यह कुछ साल पुराने हैं। लेकिन हुआ यह कि सीबीआई के छापे ने चिंगारी दिखा दी है पैंडोरा का बक्सा खुल गया है। यूनान की पौराणिक कथा के अनुसार, सभी बुराइयां जिस बक्से या जार में बंद थीं, उसे पैंडोरा ने खोल दिया था जिसकी वजह से दुनिया में उथल-पुथल मच गई थी। यह उस कर्म का भारतीय राजनीतिक प्रतिरूप है। क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पता था कि सीबीआई क्या करने जा रही है? अगर हां तो क्या उन्हें यह अहसास नहीं था कि इस काम के व्यापक राजनीतिक प्रभाव क्या होंगे?

इस बात को कि सरकार का सीबीआई पर कोई नियंत्रण नहीं है बहुत कम लोग मानते हैं। भारत की इस प्रमुख जांच संस्था के निदेशक ने बाकायदा कहा है कि किसी भाजपा मंत्री या सरकारी अधिकारी ने उन्हें या किसी और अन्य को फोन नहीं किया है जैसे कि वह बता रहे हों कि उन्हें क्या करना चाहिए था। और वह सही कह रहे थे, सीधी सी बात यह है कि आज बहुत कम लोग यह यकीन करते हैं कि सीबीआई वास्तव में सत्तासीन लोगों से स्वतंत्र और स्वायत्त है।

मजेदार बात यह है कि आज जो सवाल पूछा जा रहा है वह यह है: जेटली और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह में क्या अंतर है? दोनों पर भ्रष्टाचार को देखकर आंखें मूंदने का आरोप है। उनकी तुलना गांधी जी के तीन बंदरों से की जा रही है जो न बुरा बोलते हैं, न बुरा देखते हैं और न बुरा सुनते हैं। इस मामले के दो अलग पहलू हैं जिन पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

क्या है मुद्दे?

CBI raid on kejriwal's office become tragic for bjp government

कांग्रेस के अनुसार, जिस तरह पार्टी अध्यक्ष (सोनिया गांधी) और उपाध्यक्ष (राहुल गांधी) को नेशनल हेरल्ड मामले में अदालत के समक्ष पेश होने के लिए बुलाया गया है उससे यह साफ हो जाता है। अक्टूबर 1977 में मोरारजी देसाई सरकार (जिसके गृह मंत्री चौधरी चरण सिंह थे) ने इंदिरा गांधी को गिरफ्तार करने का फैसला किया था। तब इंदिरा ने जमानत पर रिहा होने से इनकार कर दिया और जोर दिया कि वह कम से कम एक रात सलाखों के पीछे बिताएंगी।

इंदिरा गांधी की बहू और पोता भी आने वाले शनिवार (दिसंबर 19) को उन्हीं के पदचिन्हों पर चलना चाह रहे हैं। इंदिरा गांधी ने अपनी गिरफ्तारी का इस्तेमाल खुद को ऐसा व्यक्ति बताने में सफलतापूर्वक किया जिसे उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी परेशान कर रहे हैं। उन्होंने लोगों को इस बात का विश्वास दिलाने की कोशिश की कि आपातकाल के दौरान उनके नाम का इस्तेमाल कर 'ज्यादती' करने वालों के कामों के लिए उन्हें सजा नहीं दी जानी चाहिए।

यह इंदिरा की राजनीतिक वापसी की शुरुआत थी जो दरअसल दो साल बाद दिसंबर 1979 में आम चुनाव के बाद हुई। जो लोग इतिहास से सबक नहीं सीखते, वो पहले की गई गलतियों को दोहराने के लिए अभिशप्त होते हैं।

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