'CBI से पहले बच्चों को मिल जाता लैपटॉप'

अमर उजाला, दिल्ली Updated Tue, 26 Nov 2013 08:12 AM IST
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आर्थिक स्वायत्तता की मांग कर रही सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि अब ऐसा समय आ गया है कि जांच एजेंसी के विशेष निदेशक को लैपटॉप पाने के लिए सौ से भी ज्यादा दिनों तक का इंतजार करना पड़ता है जबकि स्कूली बच्चों को उनसे पहले ही यह मिल जाता है।
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सिर्फ यही नहीं मोबाइल खराब होने पर नया फोन खरीदने की अनुमति लेने के लिए कई स्तर की समीक्षा से गुजरना पड़ता है जिसमें तीन साल से भी ज्यादा का समय लग जाता है।
कार्मिक विभाग (डीओपीटी) के पास विशेष अदालतों के गठन को लेकर राज्य सरकारों को खर्च के भुगतान की मंजूरी का प्रस्ताव गत डेढ़ साल से लटका हुआ है। इसी वजह से भुवनेश्वर, चेन्नई, नागपुर और गुवाहाटी में अभी तक विशेष अदालतों का गठन नहीं हो सका है।
सीबीआई ने सर्वोच्च अदालत में दाखिल किए गए हलफनामे में कुछ इस तरह की अपनी मुश्किलों का हवाला दिया है, जो केंद्रीय एजेंसी के निदेशक को केंद्रीय सचिव स्तर का दर्जा दिए जाने के मुद्दे पर सरकार की खिलाफत के बाद दायर किया गया है। याद रहे कि सीबीआई का प्रशासनिक नियंत्रण डीओपीटी के अंतर्गत है।

सीबीआई ने विभिन्न आधारों पर आर्थिक और प्रशासनिक कामकाज की स्वतंत्रता की मांग करते हुए यह भी कहा है कि इससे एजेंसी में नौकरशाहों की नियुक्ति में देरी की समस्या भी खत्म हो जाएगी।

केंद्र ने 13 नवंबर को सीबीआई की उस मांग का फिर से पुरजोर विरोध किया था जिसमें एजेंसी निदेशक को सचिव स्तर का दर्ज दिए जाने की मांग की गई थी।

सरकार के हलफनामे का जवाब देते हुए सीबीआई ने आग्रह किया है कि इससे किसी भी तरह की समस्या पैदा नहीं होगी जो संतुलन बिगड़ने को लेकर सरकार दे रही है। सर्वोच्च अदालत एजेंसी की आर्थिक स्वायत्तता के मुद्दे पर गंभीर है और कोल ब्लॉक आवंटन के मसले की सुनवाई में इस पर गौर करेगा।

सीबीआई ने हलफनामे में दावा किया है कि कार्यप्रणाली को प्रभावशाली बनाने के लिए स्वायत्तता मिलनी चाहिए क्योंकि तत्काल प्रशासनिक और आर्थिक अधिकार न होने के परिणामस्वरूप कई बार जांच में देरी होती है। इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

एजेंसी ने यह भी कहा है कि वह कभी यह नहीं चाहती कि उसे अतिरिक्त कानूनी अधिकार दिए जाएं। साथ ही कहा है कि मौजूदा समय डीओपीटी सचिव के नियंत्रण में जांच एजेंसी रहती है। जबकि सीबीआई निदेशक को सीधे तौर पर मंत्री के समक्ष रिपोर्ट का अधिकार मिलना चाहिए।

एजेंसी ने इस पर भी जोर दिया है कि उसे विशेष अभियोजक की नियुक्ति के लिए कानून मंत्रालय से अनुमति लेनी पड़ती है। जबकि निदेशक को यह अधिकार होना चाहिए। इससे बाहरी हस्तक्षेप और प्रभाव खत्म होगा जो अदालत लगातार कह रही है।
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