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दागियों को चुनाव लड़ने से रोक के फैसले पर पुनर्विचार याचिका दायर

Sun, 04 Aug 2013 02:15 AM IST
नई दिल्ली/ब्यूरो
नई दिल्ली/ब्यूरो Updated Sun, 04 Aug 2013 02:15 AM IST
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case in supreme court

सांसदों और विधायकों को दो साल से ज्यादा की सजा होने पर सदस्यता रद्द करने और हिरासत में लिए जाने या जेल में बंद व्यक्ति के चुनाव लड़ने पर रोक संबंधी फैसले पर सुप्रीम कोर्ट में शनिवार को पुनर्विचार याचिका दायर की गई।

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हरियाणा स्वतंत्र पार्टी के अध्यक्ष रमेश दलाल ने सर्वोच्च अदालत से अपने फैसले पर दोबारा विचार करने की मांग की है। अदालत ने 10 जुलाई को लिली थॉमस और जन चौकीदार एनजीओ की याचिका पर दोनों मुद्दों पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया था।
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सर्वोच्च अदालत ने अपने फैसले में यह व्यवस्था दी है कि यदि कोई व्यक्ति जेल या पुलिस हिरासत में हैं तो वह चुनाव नहीं लड़ सकता। इस फैसले से उन विचाराधीन राजनेताओं के चुनाव लड़ने पर रोक लग गई है जो जेल में बंद है।
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जबकि दूसरे फैसले में शीर्षस्थ अदालत ने जन प्रतिनिधित्व कानून (आरपीए) के उस प्रावधान को निरस्त कर दिया है जो दोषी व्यक्ति को संरक्षण या छूट प्रदान करता था।

कानून में यह निर्धारण किया गया था कि ऊपरी अदालत में अपील के लंबित रहते दोषी सांसद या विधायक की सदस्यता को बरकरार रखा जाएगा। लेकिन शीर्षस्थ अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट कर दिया कि दोषी करार दिए जाते ही सदस्यता निरस्त कर दी जाएगी।

सर्वोच्च अदालत ने दोनों ही फैसलों का राजनीतिक दलों और नेताओं से एक सुर में विरोध किया है और केंद्र सरकार ने भी संकेत दिया है कि वह इन मुद्दों पर सर्वोच्च अदालत में पुनर्विचार याचिका दायर करेगी और सांसदों, विधायकों को छूट प्रदान करने के लिए संशोधन विधेयक लाया जाएगा।

दलाल की ओर से दायर याचिका में कहा गया है कि फैसले में तमाम खामियां हैं, जो स्थितियों की वास्तविकता से परे भी है। आरपीए की धारा 8(4) के इतिहास पर गौर किए बिना ही अदालत ने उसे असंवैधानिक करार दिया।

जबकि फैसले की आड़ लेकर इस व्यवस्था का दुरुपयोग आसानी से किया जा सकेगा जिसके दुष्प्रभाव और दुष्परिणाम स्पष्ट हैं। अदालत की ओर से जारी किए गए फैसला में कमियां है जिन पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए क्योंकि इससे संसद, विधानसभा और पूरे देश के लोकतंत्र की कार्यप्रणाली प्रभावित होगी।

याचिका में कहा गया है कि इसमें कोई शक नहीं कि राजनीति को अपराधीकरण से बचाने के मूल तत्व संविधान में दिए गए हैं। लेकिन उन्हें इस स्तर तक नहीं आगे ले जाया गया है कि लोकतांत्रिक तौर पर गठित की गई संसद की निरंतरता कमजोर हो जाए।


इन कारणों को ध्यान में रखते हुए इस मामले की सुनवाई संविधान पीठ को भेज दी जानी चाहिए। याचिकाकर्ता ने यह भी कहा है कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाया जाना कानून के मुताबिक नहीं है और फैसले को सत्ताधारी दल अपने विरोधियों के खिलाफ हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर सकती हैं।

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