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क्या 'माई लॉर्ड' शब्द पर लगेगी पाबंदी!
अमर उजाला/दिल्ली
Updated Mon, 11 Nov 2013 11:00 PM IST
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जज को भगवान स्वरूप मानकर संबोधित किए जाने के खिलाफ दायर याचिका पर सर्वोच्च अदालत सुनवाई करेगा। न्यायाधीशों को माई लॉर्ड या योर लॉर्डशिप कहे जाने को याचिका में गुलामी का प्रतीक बताया गया है।
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साथ ही आजादी के 66 साल बाद अंग्रेजी हुकूमत की दासता से पूर्ण मुक्ति के लिए इस पर पाबंदी लगाए जाने की जरूरत पर जोर दिया गया है। याचिका में माई लॉर्ड कहने पर प्रतिबंध लगाए जाने की दलील दी गई है।
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चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली बेंच ने वकील शिव सागर तिवारी की याचिका को अन्य पीठ के समक्ष स्थानांतरित करने का निर्देश दिया। चीफ जस्टिस और जस्टिस रंजन गोगोई की बेंच ने कहा कि इस तरह का आदेश कैसे जारी किया जा सकता है।
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कोई भी अदालत वकील को माई लॉर्ड कहने के लिए मजबूर नहीं करती। लेकिन वकील ने कहा कि उसकी एक याचिका सिर्फ इस कारण खारिज कर दी गई कि उसने जज को माई लॉर्ड कहकर संबोधित नहीं किया।
जस्टिस गोगोई की ओर से याचिका पर सुनवाई से इंकार किए जाने पर चीफ जस्टिस ने इसे अन्य बेंच में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया।
याचिका में कहा गया है कि लॉर्ड का मतलब होता है भगवान। कलियुग में भगवान की उत्पत्ति नामुमकिन है। धार्मिक दृष्टिकोण से भी किसी मानव को माई लॉर्ड या योर लॉर्डशिप कहना ठीक नहीं है।
राम और कृष्ण भगवान के अवतार हैं। इनके अलावा किसी को भी लॉर्ड कहना ठीक नहीं है। यह देश की गरिमा के भी खिलाफ है।
बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने 2006 में ही सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों को माई लॉर्ड संबोधित करने पर पाबंदी लगा दी थी लेकिन उसके बाद भी यह परंपरा खत्म नहीं हुई है।
दिल्ली हाईकोर्ट के जज जस्टिस एस मुरलीधर ने बार काउंसिल के प्रस्ताव पर अमल किया। उन्होंने बाकायदा नोटिस जारी करके माई लॉर्ड या योर लॉर्डशिप कहने पर प्रतिबंध लगा दिया है।
जस्टिस मुरलीधर की ओर से दिखाए गए रास्ते पर सभी जजों को चलना चाहिए। याचिका में यह भी कहा गया है कि बार काउंसिल ही वकीलों की ड्रेस, अनुशासन आदि के कायदे कानून तय करती है।
बार काउंसिल ने ही माई लॉर्ड के स्थान पर योर ऑनर और सर शब्द का इस्तेमाल करने का निर्देश देशभर के वकीलों को दिया है।
सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया गया है कि वह देश की सभी अदालतों के न्यायाधीशों को निर्देश जारी करे कि वे माई लॉर्ड या योर लॉर्डशिप संबोधन को स्वीकार नहीं करें।
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट तथा अन्य अदालतों की आधिकारिक भाषा हिंदी करने का भी आग्रह किया है। याची ने कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 348 के तहत अंग्रेजी का भाषा का प्रयोग सिर्फ 15 साल के लिए था।
यह अवधि 1965 में समाप्त हो गई। हिंदी को अदालत की आधिकारिक भाषा बनाने के लिए संसद में विधेयक लाना चाहिए था लेकिन 48 साल बाद भी संसद में इस तरह का बिल नहीं लाया गया है।
संविधान के अनुच्छेद 343 में हिंदी को देश की आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया गया है।