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कार्टून सीरियल देख मां का लाडला बिगड़ रहा, हो जाइए सावधान

Mon, 13 Jul 2015 10:21 AM IST
Updated Mon, 13 Jul 2015 10:21 AM IST
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cartoon serial impact on children

कही आपका लाडला घर में अस्वाभाविक व्यवहार तो नहीं करता। यदि ऐसा करता हो तो वक्त रहते सावधान हो जाए। टीवी पर कार्टून सीरियल देखकर और उसके कैरेक्टर की नकल के चक्कर में ये बच्चे अजीबोगरीब आदत के शिकार हो रहे हैं।

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शुरू में तो लगता है कि यह सामान्य घटना है लेकिन वहीं जब आदत में शामिल हो जाता है तो परिजनों के लिए सिरदर्द बन जाता है। टीवी, लैपटॉप एवं मोबाइल पर आसानी से उपलब्ध हिंसक कार्टून एवं गेम्स आदि के कारण उनमें आक्रामकता की प्रवृति बढ़ रही है।
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भाई-बहन ही नहीं कई बार तो रोकने पर मम्मी पर भी हाथ छोड़ देते हैं। घर का सामान इधर-उधर फेंक देना या अधिक गुस्से में स्वयं को चोट पहुंचाने के मामले भी मनोवैज्ञानिकों के पास पहुंचते हैं। मनोवैज्ञानिक भविष्य में इसे सामाजिक समस्या के रूप में देख रहे हैं।
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डॉ. एनबी माथुर, रेलवे रोड ने बताया कि बच्चों से संबंधित (टोडलर एज) कई तरह के केस आते हैं। असामान्य व्यवहार, हम उम्र भाई-बहन को मारने, पढ़ाई में अरुचि, नार्मल डाइट से परहेज, आक्रामक जैसे केस अक्सर आते रहते हैं। कुछ तो मां या परिजनों के नियंत्रण से बाहर होते हैं। टीवी का इसमें बड़ी भूमिका है। बच्चों से अधिक मां-बाप की काउंसिल की जरूरत है।

क्या है कारण....

cartoon serial impact on children

डॉ. शाह आलम, मनोवैज्ञानिक, काउंसलर एएमयू  ने बताया कि संयुक्त परिवार के जमाने में दादा-दादी कहानी सुनाते थे। बच्चे उसमें से रोल मॉडल ढूंढ कर वैसा ही व्यवहार करते थे। अब कार्टून एज आ गया है।

बच्चे उसी में खोए रहते हैं। हम उन्हें पर्याप्त टाइम नहीं दे रहे हैं। सामान्यत: अपनी व्यस्तता या लापरवाही के कारण बच्चों को कार्टून देखने के लिए भेज देते हैं। अपने पास नहीं बैठने देते।

व्यस्त दिनचर्या के बीच जब हम घर में होते हैं तो बच्चों से बातचीत के बदले मोबाइल-लैपटॉप में लगे रहते हैं। इससे सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो रहा है। समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो भारत ‘भावना रहित यूरोप’ बन जाएगा।

प्रो. एसए आजमी, मनोचिकित्सक जेएन मेडिकल कॉलेज का मानना है कि छोटे-छोटे बच्चों से संबंधित केस लेकर अक्सर पैरेंट्स आते हैं। इसमें कई हाईपर काइनेटिक चिल्ड्रन होते हैं। समस्या गंभीर है। सबसे अधिक जरूरी अभिभावकों की काउंसलिंग की है। टीवी, कार्टून व तरह-तरह के गेम्स देखने से बच्चों का विकास प्रभावित होता है।

एक इंसान की पर्सनालिटी 18 साल में बन जाती है, इसलिए समय रहते ध्यान देने की जरूरत है। बच्चों को सप्ताह में अधिकतम 18 घंटे से अधिक टीवी नहीं देखने देना चाहिए। हिंसक गेम्स एवं शो से उन्हें दूर रखे। टीवी एवं बच्चों की दूरी कम से कम 8 फुट होना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बच्चों से प्यार भरे वातावरण में वार्तालाप है। उनसे तार्किक ढंग से खूब बात करें। वो कुछ पूछें तो टालने वाले अंदाज में पेश नहीं आएं।

सेकेंड क्लास का एक बच्चा अजीबोगरीब आवाज निकालता

cartoon serial impact on children

केस नंबर 1: शहर के एक प्रतिष्ठित स्कूल में पढ़ने वाला सेकेंड क्लास का एक बच्चा अजीबोगरीब आवाज निकालता है। समस्या तब शुरू हुई जब वह नींद में या कही भी यह आवाज निकालने लगा। काफी समझाने या डराने के बावजूद उस पर कोई असर नहीं हुआ। अब यह ‘आवाज’ जैसे उसकी आदत में शामिल हो गई है। परेशान पैरेंट्स उसे डॉक्टर को दिखा रहे हैं। बकौल परिजन आवाज निकालने की शुरुआत एक कार्टून कैरेक्टर को देखकर हुई।  

केस नंबर 2: एक बच्चा ऐसा है, जिसे टीवी पर कार्टून देखने से रोकने पर मम्मी पर हाथ उठा देता है। समान उठाकर इधर-उधर फेंक देता है। मारने या डराने का भी असर उस पर नहीं होता। गुस्से में दीवार से सिर टकराने लगता है या जमीन पर लोट कर हाथ-पैर पटकता है। बच्चों को मनोचिकित्सक से दिखाया जा रहा है।

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