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रंग सभी को एक जैसा क्यों नहीं दिखता?

Mon, 06 Apr 2015 01:17 PM IST
Updated Mon, 06 Apr 2015 01:17 PM IST
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can we see all colur same?

कुछ हफ्ते पहले एक तस्वीर में ड्रेस का रंग, एक बड़ा मसला बनकर इंटरनेट पर चर्चित रहा। कहीं भी उस ड्रेस के रंग को लेकर मत एक जैसा नहीं था।

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दफ्तरों में, घरों में जैसे दो ख़ेमे बन गए - एक, जिन्हें ड्रेस गोल्ड-व्हाइट दिखी और दूसरे, जिन्हें ड्रेस ब्लू-ब्लैक दिखी। तो फिर असलियत क्या है? वही तस्वीर, दो इंसानों को नंगी आंख से अलग-अलग रंग की कैसे दिख सकती है?
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दिमाग पर है सब निर्भर

दरअसल दिलचस्प बात ये जानने में है कि किसी वस्तु के रंग को लेकर हमारे दिमाग में क्या चलता है। क्या आप जानते हैं इसका विज्ञान क्या है? कल्पना कीजिए, मैं अपने एक दोस्त के हाथों में हाथ डाले सूर्यास्त देख रहा हूं। सूर्यास्त के समय आकाश सुनहरे रंग का दिखता है, वहीं दूसरी तरफ से नीले रंग का आकाश उससे मिलता हुआ प्रतीत होता है। मैं कहता हूं, "क्या ख़ूबसूरत रंग हैं।" और दूसरा दोस्त भी सहमत है।
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उसके बाद थोड़ी देर की चुप्पी के बाद मैं कहता हूं कि आकाश का रंग नीला है। दोस्त सहमत है। लेकिन सवाल ये है कि क्या वो शख्स भी उसी नीले रंग को देख पा रहा है जो मैं देख रहा हूं।

यहां पर अंतर संभव है। हो सकता है जो नीला रंग मुझे नजर आ रहा हो, दूसरे को वैसा ही नीला रंग नहीं नजर आ रहा हो। ये भी संभव है कि मुझे सुनहरा नीला आकाश नजर आ रहा हो और दूसरे साथी को गहरा नीला रंग दिख रहा हो।

मेरी चिंता की वजह दर्शनशास्त्र का दायरा है, तंत्रिका विज्ञान नहीं।

अंतर संभव

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आप ये पूछ सकते हैं कि शानदार सूर्यास्त देखने की बजाए मैं इस चिंता में क्यों डूबा हुआ हूं। जब आप कलर ब्लाइंडनेस के बारे में सोचेंगे तो आपको मेरी चिंता सुखद ही लगेगी। दुनिया के करीब 8 फ़ीसदी पुरुष और 0।5 फ़ीसदी महिलाएं कलर ब्लाइंडनेस के शिकार हैं।

कई लोग ये स्वीकार भी नहीं कर पाते हैं कि वे कलर ब्लाइंडनेस के शिकार हैं। वे अपना जीवन गुजार देते हैं और चीजों को अमूमन अलग ही रंग में देखते हैं। तंत्रिका विज्ञान के मुताबिक हम किसी चीज का रंग फ़ोटोरिसेपटर्स की मदद से देख पाते हैं। हमारी आंखों के पीछे सेंसर लगे होते हैं जो हमारे दिमाग को रंग के बारे संकेत देते हैं।

हमारे पास अलग अलग रंग के प्रति संवेदनशील तरह तरह के फ़ोटोरिसेपटर्स होते हैं। ज़्यादातर लोग के पास तीन तरह को फ़ोटोरिसेपटर्स होते हैं। ये नीले, हरे और लाल रंग के प्रति संवेदनशील होते हैं। इनके द्वारा मिली सूचना के चलते ही बाकी रंगों का संसार दिख पाता है।

कलर ब्लाइंडनेस के शिकार पुरुषों में हरे रंग के प्रति संवेदनशील फ़ोटोरिसेपटर्स में कमजोरी होती है, ऐसे में हरे रंग की वस्तु को देखने में उनसे चूक हो जाती है।

क्यों होता है अंतर

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वहीं दूसरी ओर कुछ लोग रंगों के प्रति कुछ लोग ज़्यादा ही संवेदनशील होते हैं। उनमें चार रंगों के प्रति संवेदनशील फ़ोटोरिसेपटर्स मौजूद होते हैं। पक्षी और रेंगने वाले जलचर टेट्रा क्रॉमेटिक होते हैं, यानी वे इंफ्रारेड और अल्ट्रावायलेट स्पेक्ट्रम को भी देख सकते हैं।

इंसानों के टेट्रा क्रॉमेट सामान्य रोशनी से ज्यादा नहीं देख पाते हैं, लेकिन अतिरिक्त फ़ोटोरिसेपटर्स होने के चलते कई लोग लाल और हरे रंग के बीच के रंग के प्रति संवेदनशील होते हैं। यानी टेट्रा क्रॉमेट क्षमता वाले जिस तरह से समर-ग्रास-ग्रीन और स्पेनिश-लाइम-ग्रीन रंग को पहचान पाते हैं, वैसा सामान्य शख्स नहीं कर पाता है।

हम सूर्यास्त का अनुभव आपसे शेयर कर रहे हैं। तो संभव है जो रंग मैं देख पा रहा हूं वो मेरा साथी नहीं देख पा रहा होगा, या फिर ठीक उलटा भी। अगर हम ये सोचें कि हम दूसरे के बारे में जानते हैं, लेकिन इसके बाद भी हम अपनी जानकारी को लेकर निश्चिंत नहीं हो सकते कि कितना जानते हैं। ऐतिहासिक तौर पर, मनोचिकित्सक एक आचरण का इस्तेमाल करते हैं।

ये आचरण आंतरिक अनुभव के सवालों को अप्रासंगिक बनाता है। मतलब ये कि आप मेरे नीले रंग को नीला कहने लगे लेकिन आपको आसमान लाल दिख रहा हो। या फिर हम पहले से जानते हों कि आसमान का रंग कौन सा है तो फिर आंतरिक अनुभव की चिंता किसे होगी?

अनुभव अनुभव का अंतर

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इस नजरिए में काफी फायदा भी है। संभव है कि हम मान लें कि हमारे आंतरिक अनुभव का अंतर वास्तविक है और ये महत्व रखता है। वास्तव में कुछ अंतर अपरिहार्य होते हैं। हम सामान्य शब्दों का इस्तेमाल कर सकते हैं और अपने अनुभव बांट सकते हैं। लेकिन सच यही है कि कोई दूसरा शख्स वैसा सूर्यास्त नहीं देख पाएगा।

हम विभिन्न चीजें देख सकते हैं। हम इस पर बात कर सकते हैं। वैसे किसी मामले में, सूर्य डूब चुका है और हम वहां से चल देते हैं। हो सकता है कि आप सूर्यास्त का गहरा नीला रंग देख सकते हैं। लेकिन आपके सूर्यास्त का अनुभव मेरे अनुभव के समान नहीं हो सकता।

हमें अपना विजन टेस्ट करना होगा और फिर देखना होगा कि रंग के प्रति किसकी संवेदनशीलता ज्यादा है। लेकिन हम कभी नहीं जान पाएंगे कि दूसरा आदमी खास रंग को किस तरह से देखता है। हम जब तक ये कहते हैं कि सूर्यास्त शानदार था, हम सहमत है। हमने अपना नीला रंग देखा और उसने अपना नीला रंग। हमने एक ही रंग नहीं दखा। लेकिन हमने आपस में अपना अनुभव बांटा। लेकिन ये अनुभव अनोखा होगा क्योंकि दुनिया में किन्ही दो शख्स के पास ठीक वही दिमाग नहीं होगा, जो हमारा है।

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