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काबीना मंत्री कामेश्वर उपाध्याय पंच तत्व में विलीन

Tue, 30 Oct 2012 11:57 PM IST
देवरिया/अमर उजाला नेटवर्क
देवरिया/अमर उजाला नेटवर्क Updated Tue, 30 Oct 2012 11:57 PM IST
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Cabinet ministers Kameshwar Upadhyaya funeral

प्रदेश सरकार में युवा एवं खेल मंत्री कामेश्वर उपाध्याय का मंगलवार को रात 8:30 बजे भागलपुर में सरयूतट पर राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। बड़े बेटे डॉक्टर पंकज उपाध्याय ने मुखाग्नि दी। इसके पहले उनके पैतृक निवास भाटपार रानी में हजारों लोगों ने फूल मालाएं चढ़ाकर दिवंगत नेता को श्रद्धांजलि अर्पित की।

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अपने प्रिय नेता को अंतिम विदाई देने के लिए भारी संख्या में लोग शव यात्रा में शामिल हुए। दलीय सीमाएं भी टूट गईं। सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के नेताओं ने भी उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित किए। विधान परिषद के सभापति गणेश शंकर पांडेय ने उन्हें  समर्पित समाजसेवी और कुशल राजनेता बताते हुए शोक संवेदना प्रकट की।
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काबीना मंत्री का सोमवार की देर रात दिल्ली के एक अस्पताल में निधन हो गया था। वे 72 वर्ष के थे। मंगलवार को उनका शव विशेष विमान से गोरखपुर एयरपोर्ट लाया गया। हवाई जहाज में दुग्ध राज्यमंत्री राममूर्ति वर्मा व काबीना मंत्री के परिवार के लोग भी शव के साथ आए। गोरखपुर एयरपोर्ट पहुंचने पर सपा नेताओं सहित कमिश्नर के रविन्द्र नायक, गोरखपुर के डीएम रवि कुमार एनजी आदि ने पार्थिव शरीर को पुष्प चक्र अर्पित किए।
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यहां से उनका शव देवरिया सपा कार्यालय लाया गया जहां पार्टी नेताओं सहित सैकड़ों लोगों ने उनका अंतिम दर्शन किया। यहां से शाम 3:25 बजे उनका पार्थिव शरीर उनके निवास भाटपाररानी लाया गया। शव पहुंचते ही उनके अंतिम दर्शन को जनसैलाब उमड़ पड़ा। श्रद्धांजलि देने वालों में काबीना मंत्री अंबिका चौधरी, बलराम यादव, ब्रह्मशंकर त्रिपाठी, विधायक शाकिर अली, मनबोध प्रसाद, एमएलसी रामसुंदर दास निषाद, पूर्व विधायक दीनानाथ कुशवाहा, रुद्रप्रताप सिंह, अनुग्रह नारायण सिंह, रविन्द्र प्रताप मल्ल, रामछबिला मिश्र, रामनगीना यादव, जिलाध्यक्ष रामईकबाल यादव, उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किया।


कांग्रेसी नेता कमलेश प्रताप शाही, सुहेल अंसारी, बलराम सिंह प्रमुख रहे। वहां से अंतिम संस्कार के लिए शव भागलपुर लाया गया। शव को वाहन से उतारने के साथ उनके तीनों बेटे लिपटकर रोने लगे। यह देख लोगों की आंखें नम हो आईं। वहां के लोगों ने उन्हें विकास पुरुष के साथ एक बेहतर इंसान के रूप में याद किया। राजनीति उनका शगल नहीं था। परिस्थितियों ने उन्हें राजनीति में धकेला। पहली बार 1985 में विधायक बने उपाध्याय ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। एक के बाद एक उपलब्धियां उनके दामन में आती गईं।

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