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आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे को कैबिनेट की मंजूरी
लखनऊ/ब्यूरो
Updated Wed, 26 Sep 2012 01:16 AM IST
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अखिलेश सरकार के एक और ड्रीम प्रोजेक्ट आगरा-लखनऊ ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे को कैबिनेट ने हरी झंडी दे दी है। यह पीपीपी (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) के तहत बनेगा। सात जिलों से होकर गुजरने वाले करीब 270 किलोमीटर लंबे एक्सप्रेस-वे के निर्माण पर 10,400 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।
एक्सप्रेस-वे की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार कराने के बाद अगले साल मई-जून तक इसके टेंडर जारी होंगे। डेवलपर के चयन के बाद इसके निर्माण में तीन वर्ष लगने का अनुमान है। एक्सप्रेस-वे को यमुना एक्सप्रेस वे से जोड़ने का भी प्लान है, ताकि नोएडा से लखनऊ पांच-छह घंटे में पहुंचा जा सके।
मंगलवार को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक में आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे परियोजना को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी गई। परियोजना के लिए नियुक्त कंसलटेंट ने तीन एलाइनमेंट सुझाए थे। पिछले दिनों मुख्यमंत्री के समक्ष इनका प्रेंजेंटेशन किया गया था, जिसमें आगरा से फिरोजाबाद, शिकोहाबाद, इटावा, मैनपुरी, कन्नौज, हरदोई, मलिहाबाद होते हुए लखनऊ तक के एलाइनमेंट को स्वीकृत किया गया था। इसी एलाइनमेंट पर एक्सप्रेस-वे के निर्माण का प्रस्ताव तैयार करके कैबिनेट के समक्ष मंजूरी के लिए रखा गया।
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पांच से आठ महीने लगेंगे डीपीआर में
एक्सप्रेसवे की डीपीआर तैयार होने में पांच से आठ माह का वक्त लगने की संभावना है। इसके बाद तय किया जाएगा कि कार्य आवंटन एक पैकेज में किया जाए या तीन पैकेज में। एक ही डेवलपर को पूरा कार्य देने या तीन हिस्सों में बांटकर काम कराने का विकल्प खुला रखा गया है। एक्सप्रेस-वे में पर्याप्त अंडर-वे और कैटल-वे की व्यवस्था की जाएगी व दोनों ओर 10.25 मीटर तक हरित पट्टी विकसित की जाएगी।
एक्सप्रेस-वे कस्बों एवं गांवों से दूर होगा और इससे मुख्य शहरों को बाईपास से जोड़ा जाएगा। एक्सप्रेस-वे पर टोल टैक्स लगाने के लिए भी दो विकल्पों पर विचार किया जा रहा है। पहला यह कि डेवलपर्स को ही टोल टैक्स वसूलने की अनुमति दे दी जाए और दूसरा राज्य सरकार नीलामी के जरिये टोल टैक्स वसूले और हर साल निश्चित धनराशि डेवलपर्स को दे दे। दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में यह व्यवस्था लागू है। इसमें तीन वर्ष में राज्य सरकार टोल टैक्स की दरें पुनरीक्षित कर सकती है।
उद्योग-धंधों को लगेंगे पंख
एक्सप्रेस वे निर्माण के बाद दिल्ली और लखनऊ के बीच दूरी बहुत कम हो जाएगी। साथ ही आलू व आम के विपणन में तेजी आएगी। कन्नौज के इत्र, फिरोजाबाद के कांच, आगरा के चमड़ा उद्योग के साथ ही हस्तशिल्प को भी बढ़ावा मिलेगा और आर्थिक विकास में तेजी आएगी।
एक्सप्रेस-वे की खासियत
- छह लेन का प्रवेश नियंत्रित एक्सप्रेस-वे, भविष्य में हो सकेगा आठ लेन।
- यह एक्सप्रेस-वे आगरा में यमुना एक्सप्रेस-वे से जुड़ेगा।
- बाढ़ से बचने के लिए एक्सप्रेस-वे जमीन की सतह से काफी ऊंचाई पर होगा।
- उपजाऊ जमीन का अधिग्रहण कम से कम होगा।
- एक्सप्रेस-वे का अधिकांश हिस्सा नहर की पटरियों पर पड़ रहा है।
- सरकारी जमीन होने के कारण ज्यादा भूमि अधिग्रहण की जरूरत नहीं।
- सड़क के दोनों ओर ग्रीन फील्ड बेल्ट तैयार होगी।
- सड़क के दोनों ओर झील, तालाब व इको फ्रेंडली पार्क विकसित होंगे।
- अभी आगरा से लखनऊ की सड़क मार्ग की दूरी 350 किमी है। एक्सप्रेस-वे बनने से यह दूरी घटकर लगभग 270 किमी रह जाएगी। इस तरह यह दूरी केवल तीन घंटे में पूरी हो सकती है।
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एक्सप्रेस-वे की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार कराने के बाद अगले साल मई-जून तक इसके टेंडर जारी होंगे। डेवलपर के चयन के बाद इसके निर्माण में तीन वर्ष लगने का अनुमान है। एक्सप्रेस-वे को यमुना एक्सप्रेस वे से जोड़ने का भी प्लान है, ताकि नोएडा से लखनऊ पांच-छह घंटे में पहुंचा जा सके।
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मंगलवार को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक में आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे परियोजना को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी गई। परियोजना के लिए नियुक्त कंसलटेंट ने तीन एलाइनमेंट सुझाए थे। पिछले दिनों मुख्यमंत्री के समक्ष इनका प्रेंजेंटेशन किया गया था, जिसमें आगरा से फिरोजाबाद, शिकोहाबाद, इटावा, मैनपुरी, कन्नौज, हरदोई, मलिहाबाद होते हुए लखनऊ तक के एलाइनमेंट को स्वीकृत किया गया था। इसी एलाइनमेंट पर एक्सप्रेस-वे के निर्माण का प्रस्ताव तैयार करके कैबिनेट के समक्ष मंजूरी के लिए रखा गया।
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पांच से आठ महीने लगेंगे डीपीआर में
एक्सप्रेसवे की डीपीआर तैयार होने में पांच से आठ माह का वक्त लगने की संभावना है। इसके बाद तय किया जाएगा कि कार्य आवंटन एक पैकेज में किया जाए या तीन पैकेज में। एक ही डेवलपर को पूरा कार्य देने या तीन हिस्सों में बांटकर काम कराने का विकल्प खुला रखा गया है। एक्सप्रेस-वे में पर्याप्त अंडर-वे और कैटल-वे की व्यवस्था की जाएगी व दोनों ओर 10.25 मीटर तक हरित पट्टी विकसित की जाएगी।
एक्सप्रेस-वे कस्बों एवं गांवों से दूर होगा और इससे मुख्य शहरों को बाईपास से जोड़ा जाएगा। एक्सप्रेस-वे पर टोल टैक्स लगाने के लिए भी दो विकल्पों पर विचार किया जा रहा है। पहला यह कि डेवलपर्स को ही टोल टैक्स वसूलने की अनुमति दे दी जाए और दूसरा राज्य सरकार नीलामी के जरिये टोल टैक्स वसूले और हर साल निश्चित धनराशि डेवलपर्स को दे दे। दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में यह व्यवस्था लागू है। इसमें तीन वर्ष में राज्य सरकार टोल टैक्स की दरें पुनरीक्षित कर सकती है।
उद्योग-धंधों को लगेंगे पंख
एक्सप्रेस वे निर्माण के बाद दिल्ली और लखनऊ के बीच दूरी बहुत कम हो जाएगी। साथ ही आलू व आम के विपणन में तेजी आएगी। कन्नौज के इत्र, फिरोजाबाद के कांच, आगरा के चमड़ा उद्योग के साथ ही हस्तशिल्प को भी बढ़ावा मिलेगा और आर्थिक विकास में तेजी आएगी।
एक्सप्रेस-वे की खासियत
- छह लेन का प्रवेश नियंत्रित एक्सप्रेस-वे, भविष्य में हो सकेगा आठ लेन।
- यह एक्सप्रेस-वे आगरा में यमुना एक्सप्रेस-वे से जुड़ेगा।
- बाढ़ से बचने के लिए एक्सप्रेस-वे जमीन की सतह से काफी ऊंचाई पर होगा।
- उपजाऊ जमीन का अधिग्रहण कम से कम होगा।
- एक्सप्रेस-वे का अधिकांश हिस्सा नहर की पटरियों पर पड़ रहा है।
- सरकारी जमीन होने के कारण ज्यादा भूमि अधिग्रहण की जरूरत नहीं।
- सड़क के दोनों ओर ग्रीन फील्ड बेल्ट तैयार होगी।
- सड़क के दोनों ओर झील, तालाब व इको फ्रेंडली पार्क विकसित होंगे।
- अभी आगरा से लखनऊ की सड़क मार्ग की दूरी 350 किमी है। एक्सप्रेस-वे बनने से यह दूरी घटकर लगभग 270 किमी रह जाएगी। इस तरह यह दूरी केवल तीन घंटे में पूरी हो सकती है।