बस ड्राइवर जिन्होंने बचाई कई जिदंगियां
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पुणे ज़िले के मालीण गांव में आई प्राकृतिक आपदा की ख़बर प्रशासन को सबसे पहले राज्य परिवहन के बस ड्राइवर प्रताप काले ने दी थी।
घटना के तीन दिन बाद शुक्रवार को वो घोड़ेगाव स्थित अपने घर पहुंचे। रास्ता बंद होने की वजह से काले अपनी बस के साथ आहुपे गांव में अटके हुए थे।
वो बीस साल से इस मार्ग पर बस चला रहे हैं। काले मालीण गांव के लोगों के मिलनसार व्यवहार को याद करते हैं। मंगलवार दोपहर साढ़े तीन बजे मनचर छोडने के बाद काले को इस बात का बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि उन्हें तीन दिन तक घर से दूर रहना पड़ेगा और एक कभी न भूल पाने वाली विपदा का गवाह बनना पड़ेगा।
प्रताप कहते हैं, ''मंगलवार शाम आहुपे पहुंचने के बाद हमने रात वहीं गुज़ारी। सुबह छह बजे के आसपास आहुपे से हम निकले। थोड़ी आगे जाने पर एक व्यक्ति ने हमें बताया कि आगे भूस्खलन हुआ है।''
लाल मिट्टी की ढेर
वो बताते हैं, "पहले तो मुझे लगा कि यह आमतौर पर होने वाली घटना है और एकाध जेसीबी से काम चल जाएगा। लेकिन बस आगे ले जाने के बाद मैंने जो देखा वह भयभीत करने वाला था।''
प्रताप बताते हैं, "आहुपे मालीण से थोड़ी उंचाई पर है। वहां से पूरा गांव दिखता है। लेकिन उस दिन वहां केवल लाल मिट्टी का ढेर था। हर तरफ़ पानी बह रहा था। सिर्फ़ गांव का स्कूल जो कि थोडी उंचाई पर था, वो दिख रहा था।
मैंने तुरंत अपने भाई को फोन किया। वह भी ड्राइवर है और राजगुरुनगर से उसी रास्ते पर आने वाला था। मैंने उसे बताया कि यहां बड़ी दुर्घटना हुई है और मत आओ। इसके साथ ही यह बात मैंने अपने वरिष्ठों को बताने को कहा।''
'हम सकते में हैं'
प्रताप ने बताया, "मालीण का रास्ता पूरी तरह मलबे से पटा था। इस वजह से मुझे और बस कंडक्टर को वहीं रुकना पडा। जब तक गांव में राहत कार्य पूरा नहीं होता, रास्ते पर काम हो नहीं सकता था। इसलिए हम कल रात एक बजे आहुपे से निकले और आज सुबह नारायणगांव में हमने बस पहुंचाई। सुबह छह बजे मैं घर आया।''
बस चालक प्रताप काले
प्रताप काले 1994 से मनचर-आहुपे मार्ग पर बस चला रहे हैं। गांव के हर व्यक्ति से उनकी जान-पहचान थी। वो कहते हैं, "उनमें से कोई हमारा रिश्तेदार नहीं था। लेकिन वे काफ़ी मिलनसार लोग थे। वे हमेशा हमारे खाने-पीने का इंतजाम करते थे। इतने सारे लोग अचानक ग़ायब हो जाने से हम सभी सकते में हैं।"
भूस्खलन में मरने वालों की संख्या 60 हुई
महाराष्ट्र में पुणे के पास हुए भूस्खलन में मरने वालों की संख्या बढ़कर 60 हो गई है। भारी बारिश के कारण हुए भूस्खलन के बाद क़रीब पूरा मालीण गांव मलबे में दब गया था यह गांव पश्चिम घाट की पहाड़ियों की तलहटी पर बसा था और इसमें क़रीब 70 मकान थे।
मलबे से अभी तक 60 शवों को निकाला जा चुका है। नौ लोगों को मलबे से जिंदा निकाला गया है।
सौ से ज्यादा लोग अभी भी मलबे में दबे
अधिकारियों का कहना है कि सौ से ज़्यादा लोग अब भी मलबे में दबे हैं और उनके जिंदा बचे होने की उम्मीद कम है। राहतकर्मी दिन रात काम में जुटे हैं. गांव वालों के एक दल का नेतृत्व कर रहे एक राहतकर्मी ने कहा कि इस करें आपदा ने गांव में भारी तबाही मचाई है।
मलबे से निकाले गए लोगों का चल रहा इलाज
उन्होंने कहा, "गांव में एक मंदिर था जिसका स्तंभ 30 मीटर ऊंचा था. उसका कहीं नामोनिशान नहीं है और स्कूल की इमारत के अवशेष आप देख सकते हैं। बाक़ी कुछ नहीं बचा है। इस मलबे ने सब कुछ लील लिया है।"
मलबे से ज़िंदा निकाले गए लोगों का मालीण गांव से 60 किलोमीटर दूर मनचर के सरकारी अस्पताल में इलाज चल रहा है। इस बीच लगातार हो रही भारी बारिश के कारण बचाव कार्य प्रभावित हो रहा है।