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बुलंदशहरः कल्याण सिंह की कर्मभूमि में मुद्दों पर जात-पात भारी

Wed, 26 Mar 2014 01:46 PM IST
Updated Wed, 26 Mar 2014 01:46 PM IST
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Bulandshahr : Effect of casteism over issues

बुलंदशहर (सुरक्षित) संसदीय सीट पर चुनावी चर्चाएं तेज हो गई हैं, लेकिन माहौल अभी पूरी तरह गरमाया नहीं है। कभी कल्याण सिंह को संसद पहुंचाने वाले इस क्षेत्र में उनकी प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। सभी दल भाजपा से चुनावी लड़ाई लड़ते नजर आ रहे हैं।

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मुद्दों की कोई बात ही नहीं करता। जाति-धर्म के आधार पर हार-जीत के अनुमान लगाए जा रहे हैं। सभी की नजरें जाट और मुस्लिम वोटों पर लगी हैं।

मुस्लिम वोटों पर सपा, बसपा और रालोद सभी दावेदारी कर रहे हैं। वेस्ट यूपी में नरेंद्र मोदी की चुनावी रैलियों की शुरुआत कल्याण की कर्मभूमि बुलंदशहर से हो रही है। इस सीट पर भाजपा ने डॉ. भोला सिंह, सपा ने मौजूदा सांसद कमलेश वाल्मीकि, बसपा ने प्रदीप जाटव और राष्ट्रीय लोकदल ने अंजू मुस्कान को चुनावी जंग में उतारा है।
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हो सकता है धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण

Bulandshahr : Effect of casteism over issues

बुलंदशहर जिले के सैदपुर को फौजियों का गांव कहा जाता है। इस गांव के करीब एक हजार लोग सेना, अर्द्ध सैनिक बलों या पुलिस में हैं। करीब डेढ़ हजार पूर्व सैनिक हैं। इस सीट पर मुख्य मुकाबला भाजपा और रालोद के बीच है।

स्‍थानीय लोगों की नजर में भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी की अच्छी छवि है। हालांकि यह भी माना जा रहा है कि चुनाव में कुछ हद तक धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण हो सकता है।

रालोद की प्रत्याशी फिलहाल मजबूत नहीं लग रही हैं। जाट आरक्षण के फैसले को लोग अच्छा तो मान रहे हैं, लेकिन मौजूदा माहौल में यह ज्यादा असर डालता नहीं दिख रहा।

सियासत का केंद्र बना अगौता बाजार

Bulandshahr : Effect of casteism over issues

यहां के लोग गन्ना मूल्य भुगतान में देरी, पर्चियां न मिलने और बिजली न आने की दिक्कतों का जिक्र करते हैं। स्‍थानीय लोगों की शिकायत है कि बुलंदशहर के बसपा विधायक हाजी अलीम कभी उनके क्षेत्र में नहीं आए।

इनका मानना है कि इन मुद्दों पर वोटिंग होगी। रही बात आम आदमी पार्टी की तो इससे जुड़े लोग भी इसे लड़ाई से बाहर मान रहे हैं। जाटों में आरक्षण मिलने का असर है।

पूर्व मंत्री और अगौता क्षेत्र से कई बार विधायक रहे किरनपाल सिंह आजकल राष्ट्रीय लोकदल में हैं। वे ज्यादा सक्रिय नहीं हैं। लेकिन कुछ लोग यह भी मानते हैं कि फिलहाल निष्क्रिय बने किरनपाल कोई बड़ा ‘विस्फोट’ कर सकते हैं। हालांकि गांव के कुछ लोगों का मानना है कि वह पुराने कांग्रेसी हैं, इस बार भाजपा नहीं, मोदी के लिए वोट करेंगे।

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कांग्रेस-रालोद में तालमेल की कमी

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पुराने कांग्रेसी नेता प्रकाश चंद शर्मा के मुताबिक वरिष्ठ कांग्रेसियों को रालोद से कोई सम्मान नहीं मिल रहा है। वह मानते हैं कि चुनाव का रुझान तो चौधरी साहब (अजित सिंह) के दौरे के बाद ही तय होगा।

सेवानिवृत्त डिप्टी एसपी ओपी शर्मा कहते हैं कि चुनावी आकलन साफ है, जाटों ने रालोद को वोट किया तो अंजू मुस्कान जीतेंगी वरना कोई और (भाजपा) बाजी मारेगा। कुछ का मानना है कि जाट वोट बंटेगा।

बीबीनगर से स्याना रोड पर करौंठी गांव के लोगों का मानना है कि जब चीनी मिलों के देरी से चलने से गेहूं की बुवाई नहीं हो सकी थी। तब अजित सिंह कहां थे? इनका यह भी मानना है कि जाटों को आरक्षण मिलने का बड़ा असर नहीं है, चुनाव में मोदी लहर साफ दिख रही है।

मुस्लिम और जाट वोटों पर टिका समीकरण

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स्याना कस्बे में चांदपुर रोड पर कुरैशियान मोहल्ले के यूसुफ कुरैशी कहते हैं, बिरादरी ने अभी कोई राय नहीं बनाई है। स्‍थानीय मुस्लिम समुदाय मानता है कि 2004 के लोकसभा चुनाव में रालोद के बदरुल इस्लाम ने जाट-मुस्लिम समीकरण से कल्याण सिंह के दांत खट्टे कर दिए थे। उसी तरह का समीकरण बन जाए तो सबसे मुफीद रहेगा।

पूरी संसदीय सीट पर अभी तय नहीं है कि भाजपा का मुकाबला किस दल से होगा। चुनाव का समीकरण मुस्लिम और जाट वोटों पर टिका है। मुस्लिम उस प्रत्याशी को तरजीह देंगे जो भाजपा को हराने की स्थिति में होगा। मोदी लहर साफ दिख रही है। यह क्षेत्र लोधी बहुल के साथ ही भाजपा का समर्थक है।

किरनपाल सिंह के नजदीकी समझे जाने वाले प्रताप सिंह मानते हैं कि फिलहाल इस सीट पर मुकाबला भाजपा और बसपा के बीच लग रहा है। वे कहते हैं, दुखद है कि चुनाव जाति-धर्म पर होने लगे हैं। कुछ जाट अब बदल रहे हैं। यदि जाट-मुस्लिम समीकरण बना तो रालोद भी टक्कर दे सकता है।
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