मौलाना बुखारीः धर्मगुरु क्यों कर रहे वोटों का धंधा?
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जुमे की नमाज के बाद जामा मस्जिद की बारादरी से मौलाना सैयद अहमद बुखारी ने आम चुनावों में कांग्रेस को समर्थन देने की घोषणा की तो केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा, ‘देर आए, दुरुस्त आए।’
राजनीति में धर्मगुरुओं का प्रयोग नया नहीं है। मौजूदा चुनावों में कई धार्मिक शख्सियतें विभिन्न दलों के प्रचार में लगी हुई हैं। कई धार्मिक नेता लोकसभा का चुनाव भी लड़ रहे हैं।
हालांकि, मौलाना बुखारी की अपील के बाद भाजपा उन पर बरस पड़ी हैं। भाजपा ने कहा है, मुस्लिम बुखारी के मशविरे पर भरोसा नहीं करेंगे। वे कभी किसी दल के समर्थन की बात करते हैं तो कभी किसी।
मुस्लिम वोटों की रहनुमाई की दावा
बुखारी ने अपनी अपील में कहा, ‘कुछ पार्टियां पर्दे के पीछे से सांप्रदायिक पार्टियों की मदद कर रही हैं, इसलिए हमारी कोशिश होनी चाहिए कि धर्मनिरपेक्ष वोटों का बंटवारा न हो।’
उन्होंने आम चुनावों में कांग्रेस का समर्थन करने की अपील की, हालांकि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को समर्थन दिया। बुखारी की ये राजनीतिक अपील कई मायनों में महत्वपूर्ण है। मुस्लिम वोटों की रहनुमाई का दावा उन्होंने पहली बार नहीं किया है।
2012 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उन्होंने समाजवादी पार्टी के समर्थन की घोषणा की थी। समाजवादी पार्टी उन चुनावों में स्पष्ट बहुमत से प्रदेश में सरकार बनाने में कामयाब हुई थी। लेकिन उसी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े उनके दामाद जमानत भी नहीं बचा पाए थे।
बुखारी की महात्वाकांक्षाएं छिपी नहीं
वैसे तो मौलाना सैयद अहमद बुखारी दिल्ली स्थित जामा मस्जिद के शाही इमाम हैं, लेकिन उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं छिपी नहीं रही हैं। उत्तर प्रदेश में 2012 विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने समाजवादी पार्टी मुखिया मुलायम सिंह यादव से दोस्ती गांठी थी। पार्टी के मुस्लिम नेताओं के विरोध के बाद भी मुलायम ने बुखारी को साथ लिया।
समाजवादी पार्टी ने उनके दामाद मोहम्मद उमर खान को सहारनपुर की बेहट सीट से टिकट भी दिया। उन चुनावों मे 68 मुस्लिम उम्मीदवार विजयी रहे थे। ये विधानसभा की कुल संख्या का 17 फीसदी है यानी प्रदेश में मुस्लिम आबादी के लगभग बराबर।
लेकिन बुखारी के दामाद अपनी जमानत भी नहीं बचा पाए। उन चुनावों में समाजवादी पार्टी के टिकट पर ही 42 मुस्लिम उम्मीदवार जीते थे।
सपा के साथ तकरार और नई दोस्ती
विश्लेषकों का दावा है कि बुखारी यूपी में मुस्लिमों के राजनीतिक अगुआ बनना चाहते थे। लेकिन आजम खां और अहमद हसन जैसे नेताओं के चलते उनकी दाल न गली।
पिछले साल मुलायम पर दबाव बनाने के लिए बुखारी ने मुस्लिम की बदहाली का सवाल जोरशोर से उठाया। मुलायम पर दबाव बनाने के लिए उन्होंने अपने दामाद से विधान परिषद की सदस्यता से इस्तीफा दिलवा दिया।
सपा से अपने रिश्ते खत्म करते हुए उन्होंने कहा था कि मुलायम ने जब मुझसे समर्थन मांगा था तो वादा किया था कि मुस्लिमों को 18 फीसदी आरक्षण दिया जाएगा; लेकिन वादे पर आज तक अमल नहीं हुआ।
सपा से दोस्ती तोड़ते हुए उन्होंने प्रदेश में दंगों का सवाल भी उठाया था। बाद में उनके बसपा के साथ जुड़ने की सुगबुगहट भी हुई।
आजम ने दी चुनाव लड़ने की चुनौती
बुखारी ने मुलायम का साथ छोड़ते हुए उन्हें एक खत लिखा था। आजम खान बुखारी के इस खत पर भड़क उठे थे।
आजम ने तब कहा था कि बुखारी मुरादाबाद से मेयर का चुनाव लड़ लें और अपनी जमानत बचा कर दिखा दें तो वे राजनीति से संन्यास ले लेंगे।
सपा से रिश्ते तोड़ने पर आजम खान ने कहा था कि बुखारी अपने भाई के लिए राज्यसभा की सीट मांग रहे थे और अपने दामाद के लिए लाल बत्ती।
आजम ने उस समय बुखारी को नसीहत देते हुए कहा था कि उनका काम नमाज पढ़ना हैं, वही करें, हमें सभी की हैसियत पता है।
2004 में किया था भाजपा का समर्थन
बुखारी ने सांप्रादयिकता की दुहाई देकर कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस का साथ देने की अपील की है। लेकिन 2004 में राजग सरकार के इंडिया शाइनिंग के प्रभाव में बुखारी ने भाजपा का समर्थन भी किया था।
हालांकि बाद में उन्होंने भाजपा की राजनीति से किनारा कर लिया। बुखारी चुनावों के मौसम में राजनीतिक रूप से कई बार सक्रिय हुए हैं, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि उनकी प्रभाव दिल्ली में जामा मस्जिद के आसपास के इलाकों से अधिक नहीं है।
बुखारी ने मौजूदा अपील कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी से चंद दिनों पहली हुई मुलाकात के बाद की है।