मुलायम का दिल तोड़ बुखारी गए कहीं और
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दिल्ली की ऐतिहासिक जामा मस्जिद के शाही इमाम सय्यद अहमद बुखारी चुनावों से पहले हर बार सक्रिय हो जाते हैं और दावा करते हैं कि मुस्लिम वोटों का रुख मोड़ने का वो माद्दा भी रखते हैं।
समाजवादी पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव और उनके बीच काफी करीबी रही है, लेकिन इस बार बात अलग है। बुखारी दूसरी वजहों से पहले ही मुलायम से रूठे बताए जा रहे थे और रही-सही कसर मुजफ्फरनगर दंगों ने पूरी कर दी।
एक तरफ दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल मुस्लिमों को लुभाने के लिए चाल चलने लगे हैं, लेकिन दूसरी तरह बुखारी उनके पाले में नहीं आए हैं। बुखारी ने न मुलायम को चुना और न केजरीवाल को, बल्कि उन्होंने अलग नेता चुना है और उस नेता को वह पीएम के पद पर देखना चाहते हैं। जानते हैं वो नेता कौन है?
बुखारी गए ममता के पाले में
समाजसेवी अन्ना हजारे के बाद जामा मस्जिद के शाही इमाम ने भावी प्रधानमंत्री के रूप में ममता बनर्जी को चुनने का फैसला किया है। उन्होंने कहा, "वह दूसरों की तुलना में धर्मनिरपेक्ष भारत के लिए बेहतर प्रधानमंत्री बन सकती हैं।"
अन्ना हजारे की तरह शाही इमाम बुखारी ने 30 जनवरी को सभी गैर-भाजपा मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर सच्चर आयोग की सिफारिशें लागू करने के बारे में कुछ सवाल पूछे थे।
इनमें से केवल ममता बनर्जी ने जवाब दिया। 19 फरवरी को दिए इस चिट्ठी के जवाब में ममता बनर्जी ने वे तमाम काम गिनाए, जो उन्होंने अल्पसंख्यकों की भलाई के लिए किए हैं।
बंगाल में ममता के कामकाज से खुश
सय्यद अहमद बुखारी ने कहा, "पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यकों और मुस्लिमों के लिए जो विकास संबंधी कामकाज उन्होंने (ममता ने) किए हैं, उन्हें देखकर मुझे व्यक्तिगत रूप से लगता है कि भारत को उनके जैसे सेकुलर नेता की जरूरत है, जो कहने नहीं बल्कि करने में यकीन रखता है।"
उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि वह धर्मनिरपेक्ष नेता हैं और भाजपा या एनडीए के साथ नहीं जाएंगी।" राजनीतिक जानकार इसे दिल्ली में एक अन्य घटनाक्रम के तौर पर देख रहे हैं, जिसमें शाही इमाम ने समाजवादी पार्टी से रिश्ते खत्म कर लिए हैँ।
उनके दामाद उमर अली खान ने उत्तर प्रदेश कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया है। बुखारी के ममता के साथ जाने से उनके राष्ट्रीय स्तर पर जाने की कोशिशों को बल मिलेगा।
कुछ उलेमा की राय बुखारी से अलग
ममता की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के सांसद सुल्तान अहमद ने कहा, "शाही इमाम ने बंगाल में अल्पसंख्यकों के विकास के लिए किए गए काम का अपना आकलन किया है। वो सम्मानीय पद रखते हैं और अगर वह प्रधानमंत्री के रूप में ममता बनर्जी का समर्थन करते हैं, तो कई लोग इस पर ध्यान देंगे।"
हालांकि, रेड रोड ईद नमाज की अगुवाई करने वाले वरिष्ठ उलेमा मौलाना कारी फजलुर्रहमान का मानना कुछ अलग है। उन्होंने कहा, "मेरे लिए ममता बनर्जी एक सेकुलर नेता हैं। हमें दिल्ली में ऐसे नेताओं की जरूरत भी है।"
उन्होंने कहा, "लेकिन मेरे लिए ऐसी वो अकेली नेता नहीं हैं। मैं इस मुद्दे पर मौलाना बुखारी से जुदा राय रखता हूं। ममता बनर्जी ने बंगाल में शुरुआत की है। लेकिन काफी कुछ किया जाना है।"
बंगाल में मुस्लिम काफी असरदार
फजलुर्रहमान ने कहा, "फंड की कमी की वजह से अल्पसंख्यकों से जुड़ी कई परियोजनाओं पर काम शुरू नहीं हुआ है, जबकि सरकार समारोह पर लाखों खर्च करने से नहीं चूकती। अभी यह कहने का वक्त नहीं आया है कि सब कुछ हो चुका है। लोग इस पर ऐतबार नहीं करेंगे।"
नखोदा मस्जिद के इमाम मोहम्मद शफी ने कहा, "ममता सेकुलर चेहरा हैं। हमें केंद्र में उनके जैसे नेता चाहिए। इससे लोगों को मदद मिलेगी। वह बंगाल के लिए कुछ कर रही हैं, लेकिन और बेहतर करने के लिए उन्हें वक्त दिया जाना चाहिए।" साम्प्रदायिक ताकतों को रोकने के लिए वह ममता को पीएम के रूप में देखना चाहते हैं।
पश्चिम बंगाल में 27 फीसदी मुस्लिम आबादी है और विधानसभा की 294 सीटों में से कम से कम 140 पर उनका अच्छा खासा असर रहता है। बुखारी मार्च में बंगाल जाएंगे।