मोदी से निबटने को बसपा-कांग्रेस ने चला 'ब्राह्मणास्त्र'
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
अहमदाबाद में भाजपा के कुनबे से हाल में टिकट से दरबदर किए गए मौजूदा सांसद और वहां से कोसों दूर उत्तर प्रदेश के उन्नाव में बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार के बीच क्या समानता है? दोनों नेता ब्राह्मण हैं।
यह संयोग ही है कि बसपा ने गुजरात में नरेंद्र मोदी पर हमला बोलने के लिए हरिन पाठक को अपना हथियार बनाया है। उसका कहना है कि मोदी ब्राह्मण समुदाय को किनारे लगा रहे हैं और इसलिए सात बार के सांसद पाठक को हटा दिया गया।
टीओआई की खबर के मुताबिक मायावती के करीबी और बसपा के ब्राह्मण चेहरे एस सी मिश्रा ने उन्नाव के सिकंदरपुर में हाल में कहा, "हमने उनसे पूछा कि भाजपा ने इतने अनुभवी नेता को क्यों बाहर कर दिया, तो उन्होंने कहा कि इसलिए, क्योंकि मैं पाठक हूं। क्योंकि मैं ब्राह्मण्ा हूं।" तभी बसपा सांसद ब्रजेश पाठक मंच पर चढ़ गए।
कांग्रेस भी पीछे नहीं
गंगा के किनारे बसी ब्राह्मण बेल्ट में राजनीतिक विरोधी इस बात को जोरशोर से उठा रहे हैं कि भाजपा ब्राह्मणों की कीमत पर ओबीसी पर ध्यान लगा रही है। बहुजन समाज पार्टी अगर इस इलाके में इस मुद्दे को सक्रिय बनाए हुए हैं, तो कांग्रेस यही खेल लखनऊ में कर रही है।
लखनऊ में कांग्रेस उम्मीदवार रीता बहुगुणा जोशी के सरनेम पर खास ध्यान दिला रही है, जो भाजपा अध्यक्ष और ठाकुर नेता राजनाथ सिंह के खिलाफ मुकाबले में उतरी हैं।
उनका मानना है कि भाजपा में अगड़ी जातियों की कम नुमाइंदगी और लोकसभा सीट चुनते वक्त वरिष्ठ ब्राह्मण नेताओं के साथ की गई कथित बदतमीजी के दम पर ही मोदी के आक्रामक अभियान से लोहा लिया जा सकता है।
मोदी के खिलाफ रणनीति
मायावती की पार्टी उम्मीद कर रही है कि यही ब्राह्मण-दलित संयोजन एक बार फिर उसके लिए काम करेगा, जिसने उसे 2007 में विधानसभा चुनावों में जीत दिलाई थी। दूसरी ओर, कांग्रेस उन सीटों पर यह मुद्दा गर्माना चाहती है, जहां उसके दावेदार ब्राह्मण हैं।
उन्नाव में अगर यह मुद्दा है, तो कानपुर में ही उतना ही बड़ा मुद्दा बनाया जा रहा है पार्टी के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी को बनारस से भेजा गया, ताकि मोदी के लिए सीट खाली की जा सके।
बसपा-कांग्रेस ने देवीपाटन बेल्ट में भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोला है, जहां बड़ी तादाद में ठाकुरों को टिकट दिए गए हैं। इसके अलावा पूर्वांचल में भी यह मामला उठाया जा रहा है, जहां लोकसभा की बेहद अहम 25 सीटों पर दांव है।
ब्राह्मणों पर डोरे डाले
उत्तर प्रदेश में इन दिनों सारे सामाजिक-राजनीतिक दांव उल्टे नजर आ रहे हैं। दलित सिद्धांतों पर खड़ी बसपा और खुद को सेकुलर बताने वाली कांग्रेस इन दिनों उस समुदाय पर डोरे डाल रही है, जो लंबे वक्त से 'प्रगतिशील' ताकतों के निशाने पर रही है।
दूसरी तरफ अतीत में अगड़ी जातियों का झुनझुना बजाने वाली भाजपा इन दिनों पिछड़ी जातियों की रहनुमा बनकर दिखा रही है। सवाल उठता है कि ब्राह्मण क्या सोचते हैं? भाजपा के खिलाफ भड़काने की तमाम कोशिशों के बावजूद इस सवाल का जवाब आसान नहीं है।
इसका जवाब यह होगा कि क्या ब्राह्मण जाति के रूप में वोट डालेंगे या हिंदुओं के रूप में। दरअसल, जाति के रूप में वो इस बात पर जरूर खफा हो सकते हैं कि भगवा दल में उनके समुदाय के नेताओं की ताकत लगातार घटी है। लेकिन हिंदुओं के रूप में वो मोदी के पीछे खड़े नजर आएंगे। समुदाय ने राम मंदिर आंदोलन से उभरे ओबीसी नेता कल्याण सिंह को भी स्वीकारा था।
संघ परिवार को पता है माजरा
ऐसा नहीं है कि संघ परिवार को इस मुद्दे की संवेदनशीलता का अंदाजा नहीं है। कानपुर में अगर मोदी ने मुरली मनोहर जोशी के पैर छुए, तो इसकी वजह थी।
जो समुदाय मोदी की पिछड़ों पर गौर करने की रणनीति से चोटिल था, यह उसके लिए मरहम का इंतजाम था। उन्नाव में 27 को मोदी की रैली होनी है और उन्हें देखना है कि वो क्या बोलते हैं।
लेकिन बसपा को भरोसा है कि उसकी रणनीति काम कर जाएगी। उन्होंने कहा, "हमने 21 ब्राह्मणों को टिकट दिया है, जबकि भाजपा ने 80 में से सिर्फ तीन। ब्राह्मण समझ रहे हैं कि भाजपा उनके खिलाफ साजिश कर रही है।"