काला धन बाहर भेजने वाले टॉप 5 देशों में भारत भी
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ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने कहा है कि ब्रिटिश सरकार लंदन समेत देश में कहीं भी महंगी प्रॉपर्टी खरीदने से आने वाले गैरकानूनी धन के प्रवाह को बंद करना चाहती है। लेकिन कालाधन एक वैश्विक समस्या है और विकासशील देश इससे सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।
कैमरन का कहना है कि लंदन को किसी भी किस्म के ‘कालेधन’ की जरूरत नहीं है। ब्रिटेन में अवैध धन से प्रापर्टी खरीदने वाले विदेशियों पर कठोर नीति की वकालत करते हुए एक भाषण में उन्होंने कहा था, “ब्रिटेन आपके अवैध धन को छुपाने की जगह नहीं है।”
नेशनल क्राइम एजेंसी (एनसीए) की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, ब्रिटेन में महंगी प्रापर्टी खरीदने के लिए मनीलॉंड्रिंग (हवाला) के जरिए अरबों पाउंड धन लाया जा रहा है।
लंदन बना केंद्र
इस तरह की खरीदारी खासकर ब्रिटेन की राजधानी लंदन में हो रही है। कई लोग इसे वैश्विक मनी लॉंड्रिंग (हवाला) का प्रमुख केंद्र मानते हैं। अधिकांश प्रॉपर्टी फर्जी कंपनियों के मार्फत खरीदी जाती हैं, जो आम तौर पर कर चोरी का अड्डा बने देशों की होती हैं।
ये फर्जी कंपनियां अपने देश में टैक्स से बचने और गलत तरह से कमाए गए धन को बाहर भेजने के लिए अपने गोपनीय मालिकों की मदद लेती हैं।
इसका ब्रिटेन पर सीधा असर पड़ा है क्योंकि इससे घरों की कीमतों में नाटकीय बढ़ोत्तरी हुई है, जिससे घरेलू खरीदारों के लिए घर खरीदना बूते से बाहर की बात हो गया है।
विकासशील देश
लेकिन यह समस्या असल में वैश्विक स्तर की है। इन संपत्तियों की खरीद फरोख्त से जो धन अर्थव्यवस्था में आ रहा है वो विकासशील देशों से आ रहा है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, यह उभरती और कमजोर अर्थव्यवस्थाओं को होने वाले बहुत बड़े नुकसान को दिखाता है।
कालेधन पर नजर रखने वाली अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की तमाम रिपोर्टों का मानना है कि हर साल करीब एक खरब डॉलर विकासशील देशों से बाहर जाता है।
मदद, निवेश से ज्यादा काला धन
यह तथ्य है कि साल 2012 में वैश्विक स्तर पर कालेधन का प्रवाह 991.2 अरब डॉलर के ऐतिहासिक स्तर तक पहुंच गया था।
वॉशिंगटन की एक रिसर्च संस्था ग्लोबल फाइनेंशियल इंटीग्रिटी ने विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और सरकारों के जारी आंकड़ों का विश्लेषण किया।
संस्था ने 2003 से लेकर साल 2012 के बीच देश से बाहर जाने वाले धन के प्रवाह का अध्ययन किया और बताया कि ऐसे धन के प्रवाह में 10 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि हो रही है।
संस्था के मुताबिक, धन का बाहर जाना, विकासशील देशों को विकास के लिए मिलने वाली विदेशी सहायता और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से भी ज्यादा है।
कहां से आता है कालाधन?
वैश्विक अर्थव्यवस्था में शामिल होने वाला कालाधन मुख्य रूप से विकासशील देशों से आता है, लेकिन इसका वितरण बहुत असान होता है।
गैरकानूनी धन के मामले में एशिया सबसे अव्वल है। पिछले दस सालों में आने वाले कुल गैरकानूनी धन का 40 प्रतिशत इसी क्षेत्र से आया है।
कथित तौर पर विकाशसील यूरोपीय देश कहे जाने वाले रूस, तुर्की और पूर्वी यूरोप के अधिकांश देशों से आने वाले गैरकानूनी धन की वैश्विक कालाधन प्रवाह में हिस्सेदारी 21 प्रतिशत है।
लेकिन यह जरूरी नहीं कि जिस देश से सबसे अधिक धन बाहर जाता है, उसका असर भी उस पर सबसे ज्यादा हो।
ज्यादा नुकसान किसे?
विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर इस ‘गायब धन’ के वास्तविक असर को आंकने के लिए विशेषज्ञ इसकी तुलना देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) से करने का सुझाव देते हैं।
इस मायने में कालेधन का जितना प्रवाह है वो विकासशील देशों के कुल जीडीपी का 3.9 प्रतिशत है।
सब सहारन अफ्रीका और पूर्वी यूरोप के देश अपनी जीडीपी की तुलना में सबसे अधिक नुकसान उठाते हैं, इसलिए इन पर सबसे अधिक असर होता है।
गैरकानूनी ड्रग व्यापार सबसे मुनाफे वाला धंधा है, जो अंतरराष्ट्रीय संगठित अपराध से होने वाली कमाई का आधा होता है।