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मलेरिया मच्छरों का खात्मा करेगी ब्राजील की मक्खी
विजय गुप्ता/दिल्ली
Updated Sun, 06 Oct 2013 12:02 AM IST
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दुनिया के लिए चुनौती बने मलेरिया मच्छरों को ब्राजील की एक मक्खी के जरिए नियंत्रित किया जा सकता है। इस मक्खी की खोज भारतीय वैज्ञानिक संजय दोसाज ने की है।
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उनका दावा है कि ‘मेगालोप्ता’ नाम की इस मक्खी को प्रभावित क्षेत्रों में छोड़ दिया जाए तो न सिर्फ मलेरिया के मच्छर उस जगह को छोड़ने के लिए मजबूर हो जाएंगे बल्कि भोजन न मिलने से उनकी आबादी भी पूरी तरह से नष्ट हो जाएगी।
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इस तकनीक में खर्च भी कम है क्योंकि इसके लिए सिर्फ ‘मेगालोप्ता’ को ही विकसित करना है। उत्तर प्रदेश के झांसी में रहने वाले संजय दोसाज हालांकि यह काम शौकिया तौर पर ही करते हैं। इसके लिए उन्होंने ‘मेंस लाइफसाइंसेज’ नाम की संस्था बना रखी है।
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उनका कहना है कि दुनिया भर में प्रति वर्ष मलेरिया के लगभग तीस से पचास करोड़ केस दर्ज होते हैं और लगभग दस लाख लोग प्रतिवर्ष इसके कारण काल के गाल में समा जाते हैं। मलेरिया उन्मूलन पर अरबों रुपये प्रतिवर्ष खर्च के
बावजूद निष्कर्ष बहुत उत्साहजनक नहीं है।
क्योंकि जिन देशों में आंशिक कामयाबी मिली है। वहां भी मच्छर के रहते मलेरिया लौटने का खतरा बना हुआ है। ऐसे में जरूरत ऐसी तकनीक की ही है।
इसी लक्ष्य को ध्यान में रखकर संजय ने अध्ययन करते समय पाया कि किसी भी स्थान से किसी एक प्रजाति को स्थानांतरित अथवा समूल नष्ट किया जा सकता है।
संजय का कहना है कि ब्राजील और एक्वाडोर में पाई जाने वाली ‘मेगालोप्ता’ नाम की मक्खी इस काम को बखूबी कर सकती है। मलेरिया मच्छर और ‘मेगालोप्ता’ दोनों ही रात्रिकालीन कीट हैं।
नर और मादा का भोजन फूलों से रस पीना है।
मच्छर की मादा को अंडे देने के लिए इंसानी खून और संभोग की आवश्यकता होती है। इसी लिए वह इंसानों को काटती है।
जबकि नर मच्छर सिर्फ फूलों का रस पीता है और वह भोजन के लिए एक घंटे में एक से दो किलोमीटर की रफ्तार से उड़ते हुए एक रात में लगभग 12 किलोमीटर तक उड़ सकता है।
वहीं दूसरी ओर ‘मेगालोप्ता’ अपनी दृष्टि की सीमा के भीतर ही रहते हुए अपने घोंसले के निकट ही रहती है। इन्हीं विशेषताओं का लाभ लेते हुए यह नीति विकसित की गयी कि यदि एक शहर में मच्छरों की आबादी से कई गुना अधिक संख्या में ‘मेगालोप्ता’ की लाकर छोड़ दिया जाय तो वह सारे फूलों पर अपना कब्जा करते हुए नर मच्छरों को शहर छोड़ने पर मजबूर कर देगी।
मादा मच्छर भी भोजन की तलाश और दूसरी ओर व्यवहार्य अंडों के लिए संभोग की आवश्यकता के चलते या तो वहीं मर जाएंगे या नर के पीछे जाएंगे।
दोनों ही अवस्थाओं में उसके अंडे व्यवहार्य नहीं होंगे क्योंकि यदि वह यहीं रुकती है तो संभोग के अभाव में अंडे नहीं दे सकेगी और यदि नर के पीछे जाती है तो इंसानी खून के अभाव में अंडे व्यवहार्य नहीं होंगे।
ऐसी दशा में मच्छर समाप्त हो जाएंगे। इस तकनीक को अपनाकर डेंगू आदि जैसी और भी कई बीमारियों का सफाया करना संभव भी हो सकता है। सिर्फ एक बार ‘मेगालोप्ता’ की आबादी विकसित करना होगी। इसमें खर्च भी बहुत कम आएगा।