इन खूबियों ने मोदी को बनाया 'ब्रांड मोदी'
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किंशुक नाग ने नरेंद्र मोदी की जीवनी में लिखा है- आप उनसे प्रेम कर सकते हैं या उनसे घृणा कर सकते हैं। यह आपके अनुराग पर निर्भर करता है, लेकिन आप नरेंद्र मोदी को किसी भी सूरत में अनदेखा नहीं कर सकते।
नरेंद्र मोदी की शख्सियत ऐसी ही है। उन्होंने मित्रों की जितनी लंबी फेहरिस्त बनाई है, विरोधी भी उतने ही तैयार किए हैं। वह ऐसी शख्सियत हैं, जो अपने इर्दगिर्द की सभी चीजों का प्रभावित करते हैं, यह प्रभाव नकारात्मक भी हो सकता है, सकारात्मक भी।
लोकसभा चुनाव में उन्होंने तीन लाख किलोमीटर से अधिक का सफर तय किया। 400 से अधिक रैलियां की। 10 करोड़ से अधिक लोगों से संपर्क किया। मोदी ऊर्जावान हैं, करिश्माई हैं, वे भारतीय राजनीति में फिलहाल जीवित किंवदंति बन चुके हैं।
इंदिरा गांधी के बाद नरेंद्र मोदी
इतिहासविद रामचंद्र गुहा ने नरेंद्र मोदी के बारे में लिखा है, 'नरेंद्र मोदी के प्रशंसकों और आलोचकों, दोनों के लिए भरोसा करना मुश्किल होगा, लेकिन ये सच है कि भारत के सभी नए और पुराने नेताओं में नरेंद्र मोदी का व्यक्तित्व जिससे सबसे ज्यादा मेल खाता है, वह इंदिरा गांधी हैं। जैसे इंदिरा ने किया था, वैसे ही मोदी भी अपनी पार्टी, अपनी सरकार और मुल्क को अपने व्यक्तित्व के प्रभाव में रखना चाहते हैं।'
गुहा के मुताबिक, मोदी के लिए केवल 'मैं' की अहमियत है। इंदिरा और उनकी राजनीतिक शैली में जबर्दस्त समानता है। कहा जाता है इंदिरा की भांति मोदी भी अपने इर्द-गिर्द उसी नेता को ताकतवर बनाते हैं, जिसकी ताकत का उन्हें प्रभावित न करे।
भीड़ के बीच एक जादुई वक्ता
नरेंद्र मोदी ने आरोपों का इंतजार किया है। उन्होंने आलोचनाओं का निमंत्रण दिया। विरोधियों ने उन्हें मौत का सौदागर, हत्यारा, राक्षस और ना जाने-जाने क्या-क्या कहा। लेकिन मोदी की वाकपटुता का जादू ऐसा था कि उन्होंने आरोपों और अलोचनाओं को ही हथियार बनाकर विरोधियों की ओर फेंका।
विरोधी जवाब देने के बजाय जमीन पर औंधे मुंह पड़ नजर आए। मोदी ने 'शहजादा' का लगातार प्रयोग कर नेहरू-गांधी परिवार और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को कठघरे में खड़े कर दिया। वंशवाद की राजनीति पर कांग्रेस घिरी नजर आई।
गुजरात की चुनावी रैली में राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि मोदी ने वडोडरा के बराबर जमीन टाफियों के भाव में अडानी को दे दी। नरेंद मोदी ने आरोपों का जवाब देने के बजाय कहा कि बच्चे टाफियों की बात करते हैं। मोदी का ये कटाक्ष राहुल के आरोपों पर भारी पड़ गया।
मोदी की सख्त प्रशासक की छवि
मोदी की चुनावी रैलियों में विकास के बाद जो मुद्दा सबसे ज्यादा गूंजता रहा, वह था- गुड गर्वनेंस यानी सुशासन। नरेंद्र मोदी ने शासन के मुद्दे पर यूपीए सरकार पर लगातार हमला किया।
नरेंद्र मोदी ने अपनी कहानियों, मुहावरों और हावभाव से लगातार ये जाहिर किया की वे एक सख्त प्रशासक हैं। मोदी की जीत के बाद ये माना जाने लगा है कि प्रधानमंत्री कार्यालय एक बार देश में सत्ता के एक मात्र केंद्र के रूप में स्थापित हो जाएगा।
गुजरात की ब्यूरोक्रेशी के भीतर नरेंद्र मोदी अपने व्यावहारिक फैसलों के लिए सराहे जाते रहे हैं। प्रधानमंत्री के रूप में वह केंद्र के अधिकारियों को नई धार दे सकते हैं। मोदी ने 'गुड गवर्नेंस' के लिए अपनी सर्किन में टेक्नोक्रेट्स को भी जगह दी। उम्मीद है कि केंद्र में भी टेक्नोक्रेट्स का बड़ा रोल होगा।
कुशल राजनीतिज्ञ, मजबूत संगठनकर्ता
ये किसी चुनाव पोस्टर का जुमला लग सकता है लेकिन मोदी के बारे में ये दावा अब सच लगने लगा है। मोदी की राजनीतिक चतुराई की तारीफ विरोधी भी करने लगे हैं। उन्होंने संगठनकर्ता के रूप में अपनी छवि को लगातार मजबूत किया है।
मोदी के बारे में कहा जाता है कि वह जितनी पकड़ सरकार में रखते हैं, उतनी ही पकड़ संगठन में भी होती है। कहा जाता है कि चुनाव परिणाम के आने के बाद ही मोदी अगले चुनाव की तैयारियां शुरू कर देते हैं।
मोदी की चुनावी तैयारियां विधानसभा या लोकसभा की सीटों पर नहीं होती। मोदी बूथ के स्तर पर तैयारियां करते हैं। मोदी की यह रणनीति लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत का फार्मूला भी रही है।
पहनावों को भी अनदेखा नहीं कर सकते
मोदी के कुर्ते, घडियां और चप्पलों की चर्चा भी वैसे ही होती है, जैसे भाषणों की। मोदी का ये करिश्मा ही है कि जो बातें किसी नेता की कमजोरी बन सकती हैं, वह उनकी खूबी बन जाती है।
मोदी के बारे में कहा जाता है कि वे दिन में जितनी बार कैमरे की जद में आते हैं, नए कपड़े में होते हैं। ऐसा भी नहीं मोदी राजसी धमक दिखाने के लिए ऐसा करते हैं। वह खुद को राजसी कतई नहीं मानते, वे अपने कपड़ों के जरिए ऐसे नेता की छवि गढ़ने की कोशिश करते हैं, जो उत्साह से लबरेज हो, जो हर पल तरो-ताजा और ऊर्जामय दिखे।
मोदी खुद को एक ऐसा नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश करते हैं, जिसमें हर एक युवा अपने जैसी ऊर्जा महसूस करे।
वर्कोहॉलिक मोदी भी एक चुनौती है
संसद के सेंट्रल हॉल में टीडीपी नेता चंद्रा बाबू नायडू ने कहा, 'नरेंद्र मोदी ने एक दिन सुबह से दोपहर तक बिना कुछ खाए 5 रैलियां की। दोपहर बाद उन्होंने एक कप चाय मांगी। चंद्राबाबू ने एक दिन की बात की थी, लेकिन लोकसभा चुनावों का बिगुल बजने के बाद मोदी का हर दिन ऐसा ही रहा।
उन्होंने एक दिन में पांच से छह रैलियां की। उन्होंने देश के कोने-कोने में जनसभाएं की। भाजपा के मुताबिक, नरेंद्र मोदी ने चार्य पर चर्चा, 3डी सभाओं और रैलियों को मिलाकर 5827 कार्यक्रमों में भाग लिया।
भारतीय चुनावों में किसी भी नेता के लिए यह रिकॉर्ड था। यही वजह है कि वर्कोहॉलिक मोदी काम करने वालों के लिए एक प्रेरणा भी है और चुनौती भी।
मोदी में इमेज मेकओवर की कला
2002 कें दंगों के बाद नरेंद्र मोदी की छवि एक कट्टरपंथी नेता की बन गई। हालांकि कट्टर छवि का अनुवाद सभी ने अपने-अपने ढंग से किया। प्रशंसकों ने उन्हें कठोर और अडिग माना, विरोधियों ने अभिमानी और निर्दयी।
मीडिया समेत राजनीतिक दलों ने कई बार कहा कि मोदी गुजरात दंगों के लिए माफी मांगें। लेकिन मोदी नहीं पसीजे, उन्होंने माफी मांगने की जरूरत भी नहीं समझी। वही मोदी लोकसभा चुनावों की जीत के बाद संसद के सेंट्रल हॉल में भावुक हो उठे।
अटलजी को याद कर वह अपने आंसुओं की रोक नहीं पाए। मोदी के आंसुओं ने प्रंशसंकों को भी द्रवित कर दिया। मोदी के इमेज मेकओवर सभी को चौंका दिया है। सभी को लग रहा है कि कठोर मुख्यमंत्री भावुक प्रधानमंत्री में बदल चुका है।
प्रतीकों के प्रयोग के महारथी मोदी
लोकसभा चुनाव में जीत के बाद मोदी का संसद में पड़ा पहला कदम भी सुर्खियों मे रहा। वजह बस यह थी कि मोदी ने संसद में प्रवेश करने से पहले सीढ़ियों को सिर झुकाकर नमन किया। मोदी का ये नमन प्रशंसकों के दिलों को छू गया।
प्रतीकों की राजनीति का ये शानदार उदाहरण था। मोदी ने लोकसभा चुनावो में चुन-चुनकर प्रतीकों का इस्तेमाल किया। कभी लाला किला उनका मंच बना, कभी मंच की पृष्ठभूमि में राम मंदिर। विरोधी प्रतीकों का जवाब भी न दे पाए।
जीत के बाद भी उन्होंने प्रतीकों की यही बाजीगरी जारी रखी। मोदी की यह बाजीगर विरोधियों के दिलों को चाक करती गई, लेकिन प्रशंसक बलाइयां लेते रहे।
नरेंद्र मोदी को कभी हंसते देखा है?
लोकसभा चुनावों से पहले ये सवाल किसी से पूछा जाता तो शायद जवाब 'ना' होता। चंद दिनों पहले तक माना जाता था कि मोदी का 'सेंस ऑफ ह्यूमर' शून्य है। वह उन भारतीय नेताओं में थे, जिन्हें हंसते नहीं देखा गया।
मीडिया और सोशल मीडिया में भी ऐसी ही तस्वीरों को प्रचारित किया गया, जिसमें मोदी एक सख्त छवि के कठोर नेता के रूप में नजर आए। लेकिन पिछले दिनों गुजरात विधानसभा में आयोजित अपने ही विदाई समारोह में मोदी खिलखिला के हंस पड़े।
विधानसभा अध्यक्ष वजुभाई वाला ने जब ये कहा कि अब पीएमओ में खमन और ढोकला खाने को मिलेगा, मोदी अपनी हंसी नहीं रोक पाए। मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री बन चुके मोद की ये नई छवि थी। मोदी ने रूपांतरण कर लिया था। अब कठोर मोदी की नहीं बल्कि हंसमुख और सहृदय मोदी की जरूरत थी और वे समझ चुके थे।
मित्रों के लिए भी मोदी एक चुनौती है
नरेंद्र मोदी ने गुजरात में सत्ता संभालने के बाद विपक्षी दलों से अधिक जिन संगठनों को प्रभावहीन बनाया, वह आरएसएस और विहिप है। नरेंद्र मोदी विरोधियों से ज्यादा मित्रों के लिए चुनौती माने जाते हैं।
अपनी एजेंडे और योजनाओं में बिलकुल स्पष्ट मोदी आगे बढ़ते हैं तो रोड़ा बनने वालें मित्रों को भी रास्ते हटाने कोताही नहीं बरतते। गुजरात में शासन में उन्होंने संघ और विहिप के हस्तक्षेप को लगातार कम किया।
उन्हीं के मुख्यमंत्री रहते हुए गुजरात में कई मंदिरों को गिराया गया, विहिप ने जब इसका विरोध किया तो उन्होंने कान भी नहीं दिया। विहिप नेता प्रवीण तोगड़िया किसी जमाने में मोदी के करीबी नेताओं में थे, लेकिन आज वह मोदी के विरोधियों में है। ऐसा कैसे होता है, ये मोदी ही बता सकते हैं।
जनसंपर्क की कला में महिर मोदी
90 के दशक के अंत में भाजपा गुजरात में अंतर्कलह जूझ रही थी। भाजपा आलकमान ने उस समय मोदी को गुजरात में रखना ठीक नहीं समझ और उत्तर भारत के कई राज्यों को प्रभारी बना दिया। यह वह दौर था, जब मोदी ने अपनी अद्भुत जनसंपर्क कला का परिचय दिया।
उन्होंने पत्रकारों को मित्र बनाया। व्यापारियों, अधिकारियों और सामजिक संगठनों के भीतर अपनी पैठ बनाई। मोदी के बारे में कहा जाता है कि उन दिनों वह पत्रकरों से मिलने और बातचीत करने का कोई मौका नहीं चुकते।
उन्होंने उन संपर्को को इस्तेमाल अपने हितों को साधने के लिए भी किया। बाद में मोदी ने अपनी इसी कला का इस्तेमाल सोशल मीडिया पर किया और समकालीन राजनेताओं में सबसे आगे निकल गए।
तकनीकी के प्रयोग में आगे रहे
मोदी के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने इंटरेनेट के इस्तेमाल की आदत उस दौर में डाल ली थी, जब दूसरे नेता इसके बारे में सोच भी नहीं रहे थे। ऐसा ही उन्होंने सोशल मीडिया के बारे में किया।
वह भारत के उन गिनेचुने नेताओं में रहे, जिन्होंने समय रहते इसकी ताकत पहचान ली। उन्होंने सोशल मीडिया का इस्तेमाल अपने प्रंशसकों से जुडने के लिए भी किया और अपने कामकाज के प्रचार प्रसार के लिए भी किया।
मोदी अब फेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर सबसे ज्यादा पसंद किए जाने वाले भारतीय नेता बन चुके हैं। तकनीकी के मामले मोदी के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने हमेशा अपने समय से आगे सोच है।
रणनीति बनाने के माहिर हैं मोदी
2009 में एक कार्यक्रम मोदी से पूछा गया कि 2014 के लोकसभा चुनावों में आप भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे? उन्होंने सवाल के जवाब में चुप्पी साध ली और कहा हमारे नेता लालकृष्ण आडवाणी हैं और हम उन्हीं के नेतृत्व में आगे बढ़ेंगे।
भाजपा ने 2009 में मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया था। हालांकि मोदी अपनी बात पर कायम नहीं रहे, 2014 में वह खुद प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनें।
अपनी दावेदार पुख्ता करने के लिए उन्होंने न केवल लालकृष्ण आडवाणी की चुनौती को कमजोर किया, बल्कि भाजपा के केंद्रीय राजनीति में हावी नेताओं को भी कतर दिया। मोदी की रणनीति ऐसी रही कि न केवल ये नेता धराशायी हुए, उन्होंने भाजपा को बहुमत भी दिला दिया। इसीलिए भाजपा के भीतर मोदी को एक कुशल रणनीतिकार माना जाता है।
मोदी का जवाब मोदी ही है
मोदी की एक खासयित ये भी है कि वे विकल्प नहीं तैयार करते। किसी लकीर को छोटा करना हो तो बड़ी लकीर खींच दो, मोदी ने ये दर्शन सीखा नहीं बल्कि जिया है।
उन्होंने लगातार ऐसे मानदंड तैयार किए कि उनके प्रतियोगी भी पीछे छूटते गए। आज मोदी ने भारतीय राजनीति में जैसी लकीर खिंची है, उसका जवाब बस वे ही हैं। 30 सालों बाद भारत में किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिला है और ये मोदी ने किया है।
ये इतिहास कोई दोहरा पाएगा? आज अगर से सवाल किसी पूछा जाए तो शायद वह जवाब दे-मोदी दोहरा पाएंगे। बस यही ब्रांड मोदी है।