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ब्लड ग्रुप पॉजिटिव हो या निगेटिव, अब कोई फर्क नहीं

Sun, 14 Oct 2012 12:53 AM IST
बरेली/ब्यूरो
बरेली/ब्यूरो Updated Sun, 14 Oct 2012 12:53 AM IST
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Blood group is positive or negative not matter
एक ही ब्लड ग्रुप के दो लोगों के बीच प्लेटलेट्स लेने-देने के लिए निगेटिव और पॉजिटिव का अनमैच अब समस्या नहीं रही। यही नहीं अब सिर्फ प्लेटलेट्स अलग कर डोनर का बाकी रक्त उसके शरीर को लौटाया जा सकता है। ऐसे डोनर से मिले तीन सौ मिली प्लेटलेट्स से मरीज का प्लेटलेट्स काउंट एकमुश्त 50 हजार बढ़ जाता है।
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सेल सेपरेटर किट से डॉक्टरों की यह बड़ी मुश्किल आसान हुई है। बरेली मिशन अस्पताल के ब्लड बैंक में लगे इस अत्याधुनिक उपकरण से साढ़े चार महीने में ही करीब दो दर्जन लोगों को मौत के मुंह से बचाया जा सका है।
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शहर में हाल में ही एक निजी अस्पताल में भरती डेंगू पीड़ित शानू (17) का प्लेटलेट्स काउंट घटकर छह हजार रह गया था। उसे ब्लीडिंग भी होने लगी थी। उसका ब्लड ग्रुप ए निगेटिव था और इस ग्रुप का डोनर खोजने पर भी नहीं मिला। परेशान डॉक्टरों ने मिशन अस्पताल के ब्लड बैंक में संपर्क किया तो हल निकल आया।
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शानू के पिता का ब्लड ग्रुप ए पाजिटिव था। सेल सेपरेटर किट का इस्तेमाल कर घंटे भर में ही 300 मिली प्लेटलेट्स निकाले गए। इसे शानू को चढ़ाने के बाद उसका प्लेटलेट्स काउंट 56 हजार पहुंच गया। मिशन ब्लड बैंक प्रभारी डॉ. संगीता गुप्ता के अनुसार इस किट के कई और फायदे भी मिले हैं। दिया गया खून तत्काल डोनर को वापस मिल जाने से वह 48 घंटे बाद फिर रक्तदान के काबिल हो जाता है, इस विधि से खून की बर्बादी नहीं होती।

इस बैंक में ऑटोमैटिक कंपोनेंट एक्सट्रेक्टर नामक उपकरण के दो किट लगी हैं। इससे डोनर के खून से 90 फीसदी श्वेत रक्त कणिका और प्लाज्मा को निकाला जाता है। उसके बाद खून रिसीवर में चढ़ाने पर रिएक्शन की संभावना 0.1 फीसदी ही रहती है, जबकि सामान्य विधि से खून चढ़ाने पर साढ़े चार से छह फीसदी मामलों में यह खतरा रहता है।


इससे डायलिसिस, थैलेसेमिया और ब्लड ट्रांसप्लांट पर आधारित रोगियों को लंबे समय तक बचाया जा सकता है। डॉ. गुप्ता के अनुसार, बरेली में पहली बार ये किट प्रयोग में लाए गए हैं। इससे पहले ये दिल्ली के एम्स और अग्रणी निजी अस्पतालों के साथ यूपी में लखनऊ के एसजीपीजीआई के अलावा आगरा, मेरठ और गाजियाबाद के एक-एक अस्पताल में प्रयोग में लाए जा रहे हैं।
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