10 वजहें, भाजपा ने क्यों तोड़ी शिवसेना से दोस्ती?
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वो दस कारण जिनकी वजह से भाजपा ने शिवसेना से गठबंधन तोड़ना उचित समझा और पच्चीस साल पुराने गठबंधन को तोड़ कर अलग चुनाव लड़ने का फैसला किया।
1- भारतीय जनता पार्टी की राज्य इकाई मान रही है कि लोकसभा चुनाव के बाद पार्टी को राज्य में अपना विस्तार करने का पर्याप्त मौका है। भाजपा के नेता कार्यकर्ता चुनाव लड़ने के लिए लालायित हैं। इससे भाजपा को शिवसेना से अलग होने पर थोड़ा नुकसान जरूर होगा लेकिन आगे उसके लिए स्थिति अनुकूल होगी। नरेंद्र मोदी का पूरा प्रभाव चुनाव पर होगा।
2- भाजपा मान कर चल रही है कि शिवसेना के नेता उद्धव ठाकरे का शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे की तरह करिश्माई व्यक्तित्व नहीं है। वह भाजपा को बहुत नुकसान पहुंचाने की स्थिति में नहीं है। आगे चलकर शिवसेना का एक बड़ा आधार भाजपा से जुड़ सकता है। वोट का धुव्रीकरण नहीं होगा लेकिन मतदाता भाजपा की तरफ रुझान दिखाएंगे।
मनसे से नजदीकी भी अहम वजह
3- भाजपा विदर्भ के मसले पर खड़ी हो सकती है। शिवसेना के संबंधों के चलते भाजपा नेता अलग विदर्भ राज्य की मांग पर बुलंद आवाज नहीं कर पाते थे। अब भाजपा नेता अलग विदर्भ की बात खुल कर सकते हैं। इससे उन्हें इन क्षेत्रों में लोगों का समर्थन मिल सकता है।
4- भाजपा में केंद्र से लेकर राज्य स्तर तक शिवसेना के बजाय राज ठाकरे की मनसे से खासी नजदीकी रही है। लेकिन परिस्थितियों के चलते भाजपा को शिवसेना से संबंध रखने पड़े। इससे राज ठाकरे चाहकर भी भाजपा के नजदीक नहीं आ सके। अब भाजपा मनसे में निकटता बन सकती है। भाजपा के अंदर राज ठाकरे की शैली और प्रभाव को पसंद करने वाले नेताओं की अच्छी खासी संख्या है। ये नेता शुरू से राज ठाकरे की मनसे के साथ दोस्ती करने की बात करते रहे हैं।
बीजेपी का अपना अंकगणित
6- शिवसेना भाजपा के बीच की तनातनी को राकांपा यानी एनसीपी काफी गौर कर रही है। भाजपा के साथ कोई ऐसी युति बनने की संभावना से इंकार नहीं कर सकते। हालांकि राकांपा शिवसेना के पाले में जाने के लिए तैयार दिखते हैं।
7- भाजपा मान रही है कि उद्धव ठाकरे के साथ समझौता होने और मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करने पर भाजपा के हाथ से पहल निकल जाती। भाजपा इस स्थिति को स्वीकार करने की स्थिति में नहीं दिखी। भाजपा ने महसूस किया कि शिवसेना के अलग लड़ने पर वह अपनी ताकत खो देगी। इससे उसका आधार कमजोर होगा। इसका फायदा भाजपा को ही होना है।
एनसीपी पर रहेगी खास नजर
9- भाजपा राज्य में नेतृत्व तलाश रही है। भाजपा ने महसूस किया कि अगर शिवसेना को पहल दे दी जाती है तो फिर लंबे समय तक भाजपा को यहां दूसरे दल की भूमिका में ही रहना होगा। इस स्थिति से बाहर निकल कर भाजपा अपनी पहल करना चाहती है। उसे लगता है कि पूरे राज्य में अकेले जाने पर नेतृत्व और संगठन क्षमता बढ़ेगी।
10- भाजपा का मानना है कि इस स्थिति में उसकी छवि एक दृढ़ पार्टी के तौर पर दिखेगी, भाजपा इसके जरिए संदेश देना चाहती है कि भले ही वह राजनीतिक नुकसान उठाने को तैयार है, लेकिन वह समझौते पर बहुत झुक नहीं सकती।