महाराष्ट्र: सफल होगी भाजपा की 'चालाकी'?
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आमतौर पर माना जाता है कि यूपी और बिहार में चुनाव जाति और धर्म के मुद्दे पर लड़े जाते हैं, लेकिन इस बार महाराष्ट्र पर भी यही रंग चढ़ता दिख रहा है। दोनों प्रमुख गठबंधनों के टूटने की वजह से प्रदेश में इस बार मुकाबला पंचकोणीय हो गया है।
ऐसे में पार्टियां मतदाताओं को लुभाने के लिए जाति, धर्म और क्षेत्रवाद का मुद्दा जोरशोर से उछाल रही हैं। चुनाव प्रचार में हिंदू-मुसलिम, मराठी-गुजराती, उत्तर भारतीय-स्थानीय, विदर्भ-पश्चिम महाराष्ट्र, मराठवाड़ा-कोंकण आदि मुद्दे सिर चढ़कर बोल रहे हैं।
महाराष्ट्र में पहली बार जातिवाद, धर्म और क्षेत्रवाद का मुद्दा तूल पकड़ रहा है। शिवसेना-भाजपा और कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन टूटने के बाद राज्य का चुनावी परिदृश्य पूरी तरह बदल गया है। शिवसेना मराठी मुद्दे को भुनाने के लिए भावनाओं को उभार रही है। मराठियों को संदेश दिया जा रहा है कि भाजपा के गुजराती नेतृत्व ने दिवंगत शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के साथ विश्वासघात किया है। मनसे भी मराठी वोटरों के भरोसे है, लेकिन लोकसभा चुनाव को देखते हुए ऐसा नहीं लगता कि मनसे की ओर मराठियों का झुकाव बहुत ज्यादा होगा।
विदर्भ का मुद्दा भी महत्वपूर्ण
बदली परिस्थिति में भाजपा सिर्फ गुजरातियों की पार्टी बनकर रह गई है। मुंबई में मराठियों के बाद उत्तर भारतीयों को बड़ा वोट बैंक माना जाता है। अकेले चुनाव लड़ने के बाद भी भाजपा ने उत्तर भारतीयों को ऐसी सीटों से उम्मीदवारी दी है, जहां जीत नामुमकिन सा है। लोकसभा चुनाव में उत्तर भारतीय मतदाता नरेंद्र मोदी को देख रहे थे, लेकिन इस बार हालात अलग है और उत्तर भारतीय एक बार फिर से कांग्रेस की ओर देखने लगे है।
प्रचार में मुंबई के अलावा विदर्भ का मुद्दा भी काफी उछल रहा है। विदर्भ में मुख्य लड़ाई भाजपा और कांग्रेस में है, लेकिन यहां जातिवाद चरम पर है। भाजपा चूंकि अलग विदर्भ राज्य की पक्षधर है इसलिए शेष महाराष्ट्र में उसे राज्य को दो टुकड़े में करने वाली पार्टी के रूप में देखा जा रहा है। शिवसेना बार-बार विदर्भ का मुद्दा उठा रही है। एनसीपी मराठों की पार्टी कही जाती है और उसका पूरा फोकस पश्चिम महाराष्ट्र पर होता है।
इसलिए एनसीपी भी चुनाव में क्षेत्रवाद और जातिवाद के मुद्दे पर घिरती दिख रही है। हालांकि पार्टी में छगन भुजबल ओबीसी नेता हैं, जो भाजपा के सत्ता में आने पर पेशवाईराज का भय दिखाकर ओबीसी समाज को एकजुट कर रहे हैं। कांग्रेस इस बार भी मराठा, दलित और मुस्लिम मतों के भरोसे है।
शिवसेना के बिना सत्ता पाने की चाहत
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा जितनी ‘कूल’ नजर आ रही है, वास्तव में उतनी है नहीं। शिवसेना से गठबंधन तोड़ने की रणनीति भी भाजपा ने चालाकी से तैयार की थी। अब उसका इरादा प्रदेश में कम से कम उतनी सीटें पाने का है, जिससे शिवसेना के बगैर सत्ता पर काबिज हो सके।
शिवसेना से गठबंधन तोड़ने के बाद भाजपा राज्य में तीन छोटे दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ रही है। उसने 253 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए हैं। 288 सदस्यीय प्रदेश विधानसभा में बहुमत के लिए 145 का आंकड़ा आवश्यक है। फिलहाल चुनाव पूर्व सर्वे भाजपा को सबसे बड़ी पार्टी तो बता रहे हैं, लेकिन पूर्ण बहुमत नहीं दे रहे।
भाजपा नेता नितिन गडकरी ने शुक्रवार को कहा था कि चुनाव नतीजे आने के बाद शिवसेना से गठबंधन हो सकता है लेकिन सूत्रों के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र्र मोदी पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को समझा चुके हैं कि उन्हें इन चुनावों में भविष्य की जमीन तैयार करनी है। यानी चुनाव ऐसे लड़ना है कि आने वाले वक्त में भाजपा अकेले राज्य की सत्ता संभाल सके।
चुनाव की कमान अमित शाह के पास
महाराष्ट्र चुनाव की कमान अमित शाह के पास है और उनसे यहां वैसे ही चमत्कार की उम्मीद की जा रही है, जो उन्होंने लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में दिखाया था। भाजपा चुनाव में खुद को बड़े दिल वाले के रूप में पेश कर रही है। वह जता रही है कि शिवसेना को लेकर उसके मन में कड़वाहट नहीं है। यह चुनावी रणनीति है।
उधर, अधिक से अधिक सीटें पाने के लिए भाजपा ने प्रधानमंत्री समेत पार्टी के सभी बड़े नेताओं को मैदान में उतारने का फैसला किया है। इनमें नितिन गडकरी, अनंत कुमार, स्मृति ईरानी, प्रकाश जावड़ेकर, रावसाहेब दानवे जैसे मंत्री शामिल हैं। इन सभी को महाराष्ट्र के अलग-अलग हिस्सों की कमान सौंपी गई है। यहां ये जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं से बात भी कर रहे हैं। हालांकि भाजपा के लिए वे इलाके चुनौती बने हुए हैं, जहां उसने शिवसेना के गठबंधन के 25 बरसों में कभी उम्मीदवार खड़े नहीं किए।
मुंबई, ठाणे, कोंकण में चाहिए बड़ी जीत
इन चुनावों में जो क्षेत्र भाजपा का भविष्य तय करेंगे, उनमें मुंबई, ठाणे और कोंकण सबसे अहम हैं। 288 सीटों में से 75 यानी एक चौथाई से ज्यादा सीटें इन तीन इलाकों में हैं। मुंबई में विधानसभा की 36, ठाणे में 24 और कोंकण में 15 सीटें शामिल हैं। भाजपा ने इन तीनों इलाकों की जिम्मेदारी अनंत कुमार को सौंपी है। अमित शाह भी पूरे चुनाव के दौरान यहीं रहकर रणनीति बनाएंगे क्योंकि भाजपा के लिए ये सबसे बड़ी चुनौती है। इन जगहों पर शिवसेना मजबूत स्थिति में है। भाजपा का मानना है कि अगर यहां उसने शिवसेना को पीछे छोड़ दिया तो आधी लड़ाई जीत लेगी।