राज-उद्धव की रार में फंसी भाजपा मुश्किल में
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महाराष्ट्र में एनडीए के लिए भारतीय जनता पार्टी, शिवसेना और मनसे का अनुकूल तालमेल राज- उद्धव के आपसी इगो के कारण परवान नहीं चढ़ पाया। शिवसेना के नेता उद्धव ठाकरे के चलते भाजपा, राज ठाकरे के प्रति सॉफ्ट कॉर्नर रखते हुए भी उन्हें अपने से जोड़ नहीं पा रही है।
वहीं दूसरी तरफ एनडीए गठबंधन को मनसे के चलते राज्य़ की करीब सात-आठ सीटों पर मत विभाजन के नुकसान की आशंका बनी हुई है। एनडीए के लिए थोड़ी राहत यही है कि भाजपा के खिलाफ मनसे के उम्मीदवार मैदान में नहीं होंगे। इस नाते राज्य की 26 सीटों पर भाजपा अपने प्रतिद्धंद्धी गठबंधन कांग्रेस-राकांपा से सीधी लड़ाई लड़ने की स्थिति में होगी।
मार्च 2006 में शिवसेना से अलग होने के बाद राज ठाकरे की नीति, शिवसेना को कमजोर करने और उसके जनाधार को अपने साथ जोड़ने की रही है। महाराष्ट्र के जनमानस को प्रभावित करने राज ठाकरे ने तीखी राजनीति का सहारा लिया।
राज ठाकरे की राजनीति
उत्तर भारतीयों के प्रति थोड़ी नरम होती जा रही शिवसेना के विपरीत राज ने उत्तर भारतीय के प्रति खुला आक्रोश जताया। साथ ही स्थानीय मुद्दों को हवा दी। राज्य के सामाजिक ढांचे पर इसका जो भी असर पड़ा हो, लेकिन राज और उनकी मनसे का राजनीतिक आधार खड़ा हो गया।
राज्य भर में मनसे का चाहे छिटका हुआ आधार बना, लेकिन उसका असर इतना तो हुआ कि शिवसेना और भाजपा को हर जगह उससे नुकसान हुआ। पिछले लोकसभा चुनाव में मुंबई शहर की सीटों में भाजपा के वरिष्ठ नेता पूर्व केंद्रीय मंत्री राम नाईक और किरीट सौमैया की पराजय के पीछे मनसे की उपस्थिति को देखा गया। एनडीए के लिए जिन मतों को धुर्वीकरण हो सकता था, मनसे के उम्मीदवारों ने उस बिसात को बिछने नहीं दिया।
इसी तरह शिवसेना को भी छह-सात सीटों पर मनसे के कारण हार का मुंह देखना पड़ा। हालांकि मनसे का उम्मीदवार नहीं जीता, लेकिन भाजपा, शिवसेना की पराजय में मनसे नेता राज ठाकरे ने तब अपनी जीत देखी थी। और साथ ही यह संदेश भी दिया कि राज ठाकरे की ताकत के चलते भाजपा शिवसेना राज्य में अपने मंसूबे पूरे नहीं कर सकती।
राज-उद्धव के बीच सुलह के प्रयास
बाल ठाकरे के जरिए शिवसेना की बागडोर उद्धव को सौंपने के बाद से ही यह लड़ाई मातुश्री से होती हुई गलियारों तक आई। शिवसेना संगठन में बाल ठाकरे के बाद, राज ठाकरे को कौशल और तीखे तेवर वाला नेता कहा जाता था। लेकिन वर्चस्व की लड़ाई और उपेक्षा के चलते राज ठाकरे ने जब अलग होकर मनसे बनाई तो यही माना गया कि इसके जरिए वह शिवसेना के दुर्ग पर हमले करेंगे। उसे नुकसान पहुंचाएंगे।
लेकिन कुछ शुरुआती आहटों के बाद, कुछ नफा नुकसान के बाद सुलह समझौतों के लिए भी प्रयास होते रहे। उद्धव ठाकरे की बीमारी पर जब राज उन्हें देखने के लिए गए तो माना गया कि फिर एकजुट होने की पहल हो रही है। ऐसे कई प्रंसग आए।
लेकिन उतनी ही तीव्रता से अप्रिय प्रसंग और खंडन भी होते रहे। तीखी बयानवाजी भी होती रही। नरेंद्र मोदी से राज ठाकरे की मुलाकातों के सिलसिले और राज के जरिए मोदी की खुली प्रशंसा करने के बाद फिर लग रहा था कि शायद मनसे को एनडीए के साथ जोड़ लिया जाएगा। शिवसेना मनसे के आग्रह पर मांगी गई कुछ सीटों पर सहमत हो जाएगी। लेकिन शिवसेना ने इस पर कड़ा एतराज जताया है।
शिवसेना नहीं चाहती कि राज को हो फायदा
शिवसेना किसी भी तरह नहीं चाहती कि एनडीए की सम्मिलित ताकत से राज ठाकरे के लोग संसद में पहुंचे। जिस तरह मनसे ने नासिक महानगरपालिका पर कब्जा जमाया और कल्याण डोबींवली महानगरपालिका में शानदार आगाज किया, उससे शिवसेना मनसे के प्रति सचेत है।
बेशक मनसे मुंबई मनपा में किंग मेकर नहीं बनी, लेकिन उसकी ताकत को वह नजरअंदाज नहीं कर रही है। इससे उसे आगे अपने आधार के टूटने और राज को महत्व मिलने का आभास दिख रहा है। भाजपा के लिए यह एक पेंच था, लेकिन उसने शिवसेना की मंशा का सम्मान किया। भाजपा के लिए सबसे अच्छी रणनीति यही होती कि शिवसेना, मनसे का मिलाप हो जाता, लेकिन इसके दूर दूर तक संकेत नहीं है।
इस परिदृश्य में भाजपा के लिए संतोष इतना है कि राज ठाकरे उससे रूठे नहीं है। एक तरह की पर्दे के पीछे का सांमजस्य चल रहा है। इस मामले में यह भी कहा जा रहा था कि राज ठाकरे के चलते भाजपा को अपने उत्तर भारतीय वोटरों से नाराजगी उठानी पड़ सकती थी। लेकिन इसके दलील में अब भाजपा मंच से कहा जा रहा है कि उन्होंने राज ठाकरे से समर्थन नहीं मांगा, राज ठाकरे उन्हें अपनी इच्छा से समर्थन दे रहे हैं।
असमंजस में फंसी है भाजपा
महाराष्ट्र की 48 सीटों में 26 पर भाजपा और 22 पर शिवसेना चुनाव लड़ रही है। भाजपा की कोशिश के बावजूद अगर मनसे चुनाव से नहीं हटती है तो कम से कम इस बार भी पांच-छह सीटों पर वह शिवसेना को नुकसान पहुंचा सकती है। नासिक, दक्षिण मुंबई, दादर क्षेत्र की सीट पर मनसे के प्रत्याशी शिवसेना के लिए कांटा बन सकते हैं।
शिवसेना अपने नुकसान की उतनी परवाह नहीं कर रही, जितनी परवाह उसे राष्ट्रीय परिदृश्य में मनसे की भूमिका बढने से है। शिवसेना नेता उद्धव ठाकरे बिल्कुल नहीं चाहते कि एनडीए के संभावित सरकार बनने के पीछे मनसे के योगदान की चर्चा हो। भाजपा ने अंदरूनी तौर पर भले मनसे नेता से रिश्ते बनाए हों, लेकिन वह पुराने साथी शिवसेना को किसी भी तरह नाराज नहीं करना चाहती।
खासकर यह देखते हुए कि राकांपा भी कुछ समय पहले तक शिवसेना के बगैर भाजपा से एक प्रभावी गठबंधन की अपेक्षा कर रही थी। ऐसे समय राकांपा नेता शरद पवार भी एनडीए के लिए सकारात्मक टिप्पणी कर रहे थे। लेकिन भाजपा ने राकांपा की तुलना में शिवसेना को ही तरजीह दी। ऐसे समय में वह राज ठाकरे को दुलार तो रही है, मगर चाहकर भी फूल गुलदस्तों से स्वागत नहीं कर पा रही है।