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ज्यादा ही हाईटेक हो गए हैं भाजपा दिग्गज
हरीश लखेड़ा/नई दिल्ली
Updated Thu, 17 Oct 2013 08:57 PM IST
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भाजपा के दिग्गज कुछ ज्यादा ही हाईटेक हो गए हैं। पार्टी के दिग्गजों में से कोई ब्लॉग, कोई ट्विटर, तो कोई खुद की वेबसाइट से ही अब सार्वजनिक संवाद करता है। इन दिग्गजों ने आम कार्यकर्ता तो दूर मीडिया से भी दूरी बना ली है।
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दिग्गजों की इस बेरुखी से कार्यकर्ता फिर आशंकित है। उन्हें आशंका है कि जब वरिष्ठ नेताओं का अभी से यह हाल है तो 2014 में सत्ता में आने पर कहीं पिछली बार की तरह इतिहास न दोहराने लगे। तब अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के कई मंत्रियों ने कार्यकर्ताओं के लिए अपने दरवाजे बंद कर दिए थे।
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पार्टी के एक नेता का कहना था कि यह सच है कि अटल सरकार के बेहतर कामकाज के बावजूद 2004 के चुनाव में पार्टी की हार की एक बड़ी वजह कार्यकर्ताओं का नाराज होना ही था। तब नाराज कार्यकर्ता घर बैठ गया था।
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भाजपा में यह भी कहा जाता है कि कांग्रेस में जहां कार्यकर्ताओं का ‘खयाल’ रखा जाता है, वहीं सत्ता में आने पर भाजपा नेता अपने कार्यकर्ताओं को भुला देते हैं।
उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार की एक बड़ी वजह वहां के मुख्यमंत्रियों का आम कार्यकर्ताओं से दूरी बना लेना भी था।
बहरहाल, 2014 के सियासी जंग के लिए तैयार हो रही भाजपा के ‘सेनापति’ नरेंद्र मोदी से बात शुरू करते हैं। उन्हें जून में गोवा सम्मेलन में पार्टी ने चुनाव अभियान समिति की कमान सौंपी थी, तब से वे कई दफा दिल्ली आए लेकिन मीडिया से दूर ही रहे हैं।
वे रैलियों अथवा ट्विटर के जरिये ही अपनी बात कहते हैं। अलबत्ता, पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह अब भी सर्वसुलभ हैं। हालांकि वे भी अब फेसबुक और ट्विटर पर आ चुके हैं। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने तो मीडिया से नहीं मिलने का ‘द्रोपदी प्रण’ लिया है और अब ‘ट्विटर’ ही उनका मीडिया है।
राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली कभी कभार मीडिया का दरबार तो लगाते हैं, लेकिन अपनी बात कहने के लिए वे लेख लिख देते हैं। उन्होंने अपनी वेबसाइट भी बनवा ली है। पार्टी के पितामह लालकृष्ण आडवाणी भी मीडिया से कटे रहते हैं लेकिन वे नियमित ब्लॉक लिखते हैं।
हालांकि पार्टी के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी और वेंकैया नायडू सर्वसुलभ हैं। खास बात यह है कि जिस तरह से भाजपा को दिल्ली तख्त निकट दिख रहा है, उसी रफ्तार से पार्टी मुख्यालय में असर भी दिखने लगा है।
पार्टी मुख्यालय की नई इमारत में आम कार्यकर्ता तो दूर मीडिया का प्रवेश भी आसानी से नहीं होता है। इसी वजह से कार्यकर्ताओं में यह आशंका धर रही है कि सत्ता में आने पर कहीं पुराने बेरुखे दिन न लौट आएं।